राज्य
05-Feb-2026


* सात दिवसीय आदिवासी हस्तकला, आहार और वनौषधि मेले ने शहरी जनमानस को लोकजीवन से जोड़ा अहमदाबाद (ईएमएस)| शहर में साबरमती नदी के किनारे स्थित आधुनिक रिवरफ्रंट एक अलग ही ऊर्जा से जीवंत हो उठा, जहाँ कंक्रीट के जंगल के बीच प्रकृति की गोद में पली-बढ़ी आदिवासी संस्कृति और कला का अद्भुत संगम देखने को मिला। हाल ही में आदिवासी विकास विभाग के अंतर्गत गुजरात ट्राइबल रिसर्च एंड ट्रेनिंग सोसाइटी (जीटीआरटीएस) द्वारा वल्लभ सदन, रिवरफ्रंट पर 28 जनवरी से 03 फरवरी 2026 तक सात दिवसीय “पारंपरिक आदिवासी हस्तकला, आहार और वनौषधि मेला” का सफल आयोजन किया गया। यह मेला केवल उत्पादों की बिक्री तक सीमित नहीं था, बल्कि एक सशक्त आदिवासी समाज की प्रेरक गाथा प्रस्तुत कर रहा था। ऊर्जावान और जनसेवक आदिवासी मंत्री नरेश पटेल के करकमलों से उद्घाटित इस मेले ने शहरी नागरिकों को सीधे आदिवासी जीवनशैली से जोड़ दिया। डांग के घने जंगलों से लेकर सापुतारा की पहाड़ियों तक, राज्य के 13 जिलों से आए कलाकारों के लिए यह मेला आजीविका का महत्वपूर्ण केंद्र बना। मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल के मार्गदर्शन में आयोजित इस मेले में कुल 75 स्टॉल लगाए गए, जिनमें 42 आदिवासी हस्तकला, 17 वनौषधि चिकित्सा प्रणाली और 16 पारंपरिक आहार से जुड़े स्टॉल शामिल थे। इसमें आदिवासी कारीगरों और वैदु भगतों सहित कुल 112 कलाकारों ने भाग लिया। मात्र सात दिनों में शहरी नागरिकों ने लगभग 15 लाख रुपये की खरीदारी कर आदिवासी भाइयों-बहनों की मेहनत को सराहा और उन्हें आर्थिक रूप से और सशक्त बनने के लिए प्रोत्साहित किया। यह वास्तव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘वोकल फॉर लोकल’ मंत्र को साकार करता है। मेले का सबसे प्रेरणादायक हिस्सा रहा मंत्री नरेश पटेल का उद्बोधन। उन्होंने पुस्तकीय ज्ञान देने के बजाय अपने जीवन के अनुभव साझा किए। छोटे से पटाखा व्यवसाय से शुरुआत कर सफल व्यापारी बनने तक की यात्रा बताते हुए उन्होंने आदिवासी कारीगरों को “ब्रांडिंग” का महत्व समझाया। उन्होंने कहा, “व्यापार कठिन नहीं है, बस भरोसा और विश्वास जीतना होता है। अब हमें अपनी प्राकृतिक संपदा को एक ब्रांड बनाना है।” उनके इन शब्दों ने 112 से अधिक कारीगरों में नया उत्साह भर दिया। ज्ञान और स्वास्थ्य का संदेश देने वाले वैदु भगतों की परंपरा इस मेले का विशेष आकर्षण रही। आधुनिक दवाओं से परेशान शहरी नागरिकों के लिए वनौषधि स्टॉल प्रमुख केंद्र बने। साथ ही आदिवासी सांस्कृतिक विरासत को दर्शाते इस मेले में हर शाम संगीतमय वातावरण बनता रहा। गुजरात की प्रसिद्ध नृत्य टीमों द्वारा राठवा जनजाति का होली और घेर नृत्य, भील जनजाति का तलवार नृत्य, गरासिया भील का होली और घेर नृत्य, गामित जनजाति का ढोल और सगाई चांदला नृत्य, कुनबी और कोंकणा का कहाड़िया नृत्य, वसावा जनजाति का मेवासी नृत्य, चौधरी जनजाति का डोवळु नृत्य तथा डूंगरी गरासिया जनजाति का ढोल और होली नृत्य प्रस्तुत किए गए। इसके साथ ही विशाल एलईडी स्क्रीन पर आदिवासी स्वतंत्रता सेनानियों की गाथाओं और संस्कृति पर आधारित डॉक्यूमेंट्री दिखाई गई, जिसने नई पीढ़ी को इतिहास से जोड़ा। जीटीआरटीएस द्वारा केवल बिक्री ही नहीं, बल्कि कारीगरों को आकर्षक पैकेजिंग, मार्केटिंग, ब्रांडिंग और डिजिटल युग से जुड़ने की क्षमता विकसित करने का प्रशिक्षण भी दिया गया। मेले में भाग लेने वाले सभी आदिवासी कलाकारों को आने-जाने का किराया, रहने-खाने की निःशुल्क सुविधा तथा मुफ्त स्टॉल उपलब्ध कराए गए। आदिवासी समुदाय के सर्वांगीण विकास के माध्यम से विकसित भारत, आत्मनिर्भर भारत, वोकल फॉर लोकल और हर घर स्वदेशी जैसे अभियानों के साथ आदिवासी समाज भी अब “विकसित भारत@2047” के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। अहमदाबाद के रिवरफ्रंट पर आयोजित यह मेला केवल एक आयोजन नहीं था, बल्कि आदिवासी अस्मिता का उत्सव था। शहरी नागरिकों के उत्साह और आदिवासी कारीगरों की कला के संगम ने यह सिद्ध कर दिया कि भारत की जड़ें मजबूत हैं और भविष्य उज्ज्वल है। उल्लेखनीय है कि जीटीआरटीएस द्वारा वर्ष 2015-16 में पहली बार “पारंपरिक आदिवासी हस्तकला और वनौषधि बिक्री-प्रदर्शन मेला” आयोजित किया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य आदिवासी समुदाय की प्राचीन हस्तकला, पारंपरिक आहार, वनौषधीय ज्ञान और विविध सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण एवं संवर्धन करना तथा कारीगरों और वैदु भगतों को आत्मनिर्भर बनाना है। वर्ष 2015-16 से 2025-26 तक जीटीआरटीएस द्वारा राज्य के विभिन्न स्थानों पर कुल 21 मेलों का आयोजन किया गया, जिनमें 2,597 हस्तकला कलाकारों, वैदु भगतों और आहार उत्पादकों ने भाग लिया। इसके अतिरिक्त राज्य सरकार के अन्य विभागों द्वारा आयोजित 13 मेलों में 302 कलाकार शामिल हुए। इन मेलों के माध्यम से पिछले 10 वर्षों में आदिवासी कलाकारों और उत्पादकों को लगभग 2.91 करोड़ रुपये की आय हुई है तथा 1 करोड़ रुपये से अधिक के हस्तकला ऑर्डर भी प्राप्त हुए हैं। वर्तमान वर्ष 2025-26 में राज्य के पांच स्थानों पर ऐसे मेलों का आयोजन किया गया है, जिनमें मानसून फेस्टिवल – सापुतारा, भादरवी पूर्णिमा – अंबाजी, अहमदाबाद हाट – वस्त्रापुर, वीर नर्मद दक्षिण गुजरात विश्वविद्यालय – सूरत तथा राष्ट्रीय आदिवासी उद्योग मेला – सूरत शामिल हैं। मेले में भाग लेने वाले सभी आदिवासी कलाकारों को प्रमाणपत्र देकर सम्मानित भी किया गया। सतीश/05 फरवरी