कर्मबोध सेकर्मक्षय की ओर बढ़ो : मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज जबलपुर (ईएमएस)। मनुष्य के जीवन की सबसे बड़ी विचित्रता यही है कि वह कर्म के फल से तो बचना चाहता है,पर कर्म से बचने की कोशिश नहीं करता उपरोक्त उदगार मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान के छंटवे दिवस प्रातःकालीन धर्मसभा में व्यक्त किये मुनि श्री ने चार बातें कर्म का बोध,कर्म का बंध, कर्म का भोग, और कर्म का क्षय की बात करते हुये कहा कि सभी को इस बात का बोध हो जाये कि मेरी आत्मा में कर्म एक ऐसा तत्व है जो मेरी चेतना को परतंत्र बना रहा है तो उसका जीवन परिवर्तित हो जाये?जब हम गहराई से अनुभव करते है, तो हमें कर्म का आभास होता है, हमारे जीवन में जो भी विषमता हैं उसके मूल में कर्म ही छिपा होता है, मुनि श्री ने कहा कि कर्म का बोध मात्र शास्त्रों के पड़ने से ही नहीं आता औरों को देखकर सड़क चलते भी हम कर्म का बोध कर सकते हैं, सड़क चलते हमें अनेक व्यक्ति ऐसे दिखते है जो दिव्यांग, विकृतांग, अनाथ, अपंग बीमार विक्षिप्त और विकृत अवस्था में है, तो उन्हें देखकर कभी आपको ऐसा लगा कि इनकी जगह में होता तो मेरा क्या होता? संसार की विचित्रता को देखकर जो उसकी जड़में झांकते हैं वे ही कर्म का बोध कर सकते हैं,और जिन्हें कर्म का बोध होता है वही कर्मका क्षय करने में समर्थ हो सकते हैं। मुनि श्री ने कहा कि अपने अपने अंतर्मन में उतर के देखो कि क्या यथार्थ में मुझे मेरे कर्म की सत्ता का बोध है? क्या कर्म मेरे जीवन का नियंत्रक और संचालक है? कर्म मेरी समस्त वृत्तियों और प्रवृत्तियों का निर्धारक है? ऐसा बोध अंतर्मन में जगते ही जीवन की दिशा बदल जाती है। ऐसे ही हम अपने मन से, अपने वचनों से, अपने शरीर से प्रवृत्तियां करते है, उन प्रवृत्तियों के निमित्त से हमारी चेतना में एक विशेष प्रकार का वाइब्रेशन होता है। उसी निमित्त से हमारी आत्मा के साथ जुड़े हुए जो परमाणु हैं वह हमारी ओर आकर्षित होकर कर्म के रूप में हमारी आत्मा से एकमेक हो जाते हैं। इसका नाम ही कर्म का बंध है। जैसा हमारा भाव, जैसे हमारे विचार, जैसी हमारी प्रवृत्ति, और वैसे कर्म के संस्कार हमारी चेतना में जुड़ते जाते हैं, हम सोचे कि यह कर्म हमारे जीवन में कैसे आ गया? अरे बही तो आया है,जो तुमने किया है। कर्म बंधते समय किसी को नहीं लगता कि मेरे जीवन में भी कुछ है जो बंध रहा है, व्यक्ति कदाचित अपराध से तो डर जाता है, क्योंकि उसे उसकी सजा दिखती है, लेकिन पाप करने से नहीं डरता क्योंकि उसे पाप का बोध ही नहीं है, उसे लगता ही नहीं कि में जो पाप में कर रहा हुं उसका फल भी मुझे ही मिलेगा। यदि आपअपने जीवन को अच्छा बनाना चाहते हो तो अपने भाव विचार और व्यवहार को अच्छा बनाए संसार के जितने भी संयोग है वे सब कर्म के निमित्त और नैमितिक संबंध है। इसमें किसी दूसरे का कर्तृत्व नहीं होता, हम कोसते हैं इसने ऐसा कर दिया, उसने वैसा कर दिया। इस वजह से ऐसा हो गया। उस वजह से वैसा हो गया। हकीकत में वह कोई और नहीं मेरा कर्म ही है उन्होंने महासती अंजना का उदाहरण दिया और कहा कि उसके ऊपर कर्म का उदय आया लेकिन उसने वो कर्म को भोगे नहीं, कर्म को काटा क्या उसने अपने पति या ससुराल वाले को? गाली दी वह निर्दोष थी फिर भी उसे लांछित किया गया लेकिन अंजना ने किसी को दोष नहीं दिया क्योंकि उसे कर्म का बोध था कि इनका क्या कसूर?यह तो मेरे कर्म का ही खेल है, कर्म यदि खेल दिखाना चाहता है तो मैं उसके लिए राजी हूं। चलो जिधर तुझे ले चलना है मैं चलूंगी। और एक अबला होकर के भी उसने हिम्मत नहीं हारी पेट में तद्भव मोक्षगामी कामदेव हनुमान है,ऐसे महापुरुष जिसके पेट में पल रहे है कर्म उसे भी ऐसा खेल खिला देता है। दूसरा होता तो डिप्रेशन में आ जाता और थोड़ा तेज होता तो कोर्ट में पहुंच जाता और थोड़ी कमजोर होता तो फांसी का फंदा लगा के लटक जाती। लेकिन वह अंजना ज्ञानी और पराक्रमी तथा आत्म बोध से संपन्न थी तभी तोकर्म बोरिया बिस्तर बांध के जाने को बाध्य हो गया इस अवसर पर मुनि श्री संधान सागर महाराज सहित समस्त क्षुल्लक महाराज मंचासीन थे। प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी और सुवोध कामरेड ने बताया प्रातः6;30 बजे से सभी मांगलिक क्रियाऐं संपन्न हुई मुनि श्री के मुखारविंद से शांति मंत्रों के साथ शांतिधारा संपन्न हुई। विधानाचार्य बाल ब्र. अशोक भैया, बा. ब्र.अभय भैया के निर्देशन मेंअमित बास्तु,पंडित सुदर्शन शास्त्री, सोनल शास्त्री ने संपन्न कराया संचालन अमित पड़रिया ने किया। सुनील साहू / मोनिका / 05 फरवरी 2026/ 06.26