प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वतंत्र भारत के सर्वाधिक लोकप्रिय और प्रभावशाली नेता के रूप में स्थापित हो गये हैं, उनके नाम पर भारतीय जनता पार्टी आसानी से चुनाव की वैतरणी पार कर जाती है। कांग्रेस नेता एवं लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को लगा होगा कि नरेंद्र मोदी की शक्ति ईमानदारी है, इसलिए उन्होंने राफेल में भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाया और गौतम अडानी के बहाने जोरदार हमले किये, उनके कई आरोप उच्चतम न्यायालय तक गये हैं, जहां आरोपों में कोई दम नहीं निकला, साथ ही आम जनता का भाव भी नरेंद्र मोदी के प्रति नहीं बदला। चीन से तनाव के समय जमीन पर कब्जा करने का आरोप लगाते हुये नरेंद्र मोदी को कमजोर प्रधानमंत्री सिद्ध करने का प्रयास किया पर, आम जनता पर कोई असर नहीं हुआ। पाकिस्तान से संघर्ष विराम को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को राहुल गांधी ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दबाव में बताया पर, आम जनता ने उनकी बातों पर विश्वास नहीं किया। अब राहुल गांधी को लगता है कि नरेंद्र मोदी पर आम जनता, उनके स-शक्त निर्णयों को लेकर अटूट विश्वास करती है, इस छवि को आघात पहुँचाने के उद्देश्य से ही राहुल गांधी पूर्व सेनाध्यक्ष मनोज मुकुंद नरवणे की अ-प्रकाशित पुस्तक के अंश को मुद्दा बनाने का प्रयास कर रहे हैं, साथ ही स्वयं को निडर और स-शक्त दर्शाने के लिये उद्दंडता पूर्ण व्यवहार करते हुये भी दिखाई दे रहे हैं लेकिन, उन्हें इस बात का अहसास भी नहीं है कि उनकी निरर्थक जिद और उद्दंडता से, उनकी ही छवि खराब हो रही है, साथ ही पुस्तकों के हवाले से ही अब भाजपा भी गड़े मुर्दे उखाड़ेगी, जिससे नेहरू-गांधी खानदान के कु-कृत्यों की दुर्गंध पुनः ताजा हो सकती है, इसी विषय पर चर्चा कर रहे हैं बीपी गौतम... यह है ताजा प्रकरण संसद का बजट सत्र हंगामें की भेंट चढ़ता हुआ दिखाई दे रहा है। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने भारतीय सेना के पूर्व अध्यक्ष मनोज मुकुंद नरवणे की तथा-कथित अ-प्रकाशित पुस्तक का उल्लेख करते हुए दावा किया कि चीन की सेना भारत की सीमा में घुस रही थी, उस समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कोई स्पष्ट निर्णय नहीं लिया। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने लोकसभा में राहुल गांधी द्वारा सदन में तथा-कथित पुस्तक के कोट करने पर आपत्ति जताते हुए कहा कि सदन के नियमों के विरुद्ध है। राजनाथ सिंह ने कहा कि मैं चाहता हूं कि लोकसभा में विपक्ष के नेता सदन के समक्ष वह पुस्तक प्रस्तुत करें, जिसका वे हवाला दे रहे हैं, क्योंकि जिस पुस्तक का वे उल्लेख कर रहे हैं, वह प्रकाशित नहीं हुई है। राजनाथ सिंह ने लोकसभा अध्यक्ष से कहा कि राहुल गांधी को सदन में बिना तथ्य के बोलने की इजाजत न मिले, साथ ही गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि राहुल गांधी बिना प्रामाणिकता के बात न करें, वह एक मैगजीन की रिपोर्ट पढ़ रहे हैं। मैगजीन में कुछ भी लिखा जा सकता है, रक्षा मंत्री की बात का भरोसा करें, राहुल को किसने बताया कि चीनी टैंक आये थे, चर्चा राष्ट्रपति के अभिभाषण पर हो रही है। अमित शाह ने कहा कि विवाद राहुल गांधी ने समाप्त कर दिया है, उन्होंने खुद कहा कि पुस्तक प्रकाशित नहीं हुई है, उसका सदन में जिक्र कैसे हो सकता है। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने राहुल गांधी को कई बार टोका और सदन के नियमों का हवाला देते हुए रूलिंग दी कि अ-प्रकाशित सामग्री को सदन में उद्धरित करना नियमों के विरुद्ध है, इसके बावजूद राहुल गांधी अपनी बात पर अड़े रहे, जिससे हंगामा और बढ़ गया। राहुल ने कहा कि आप ही बता दीजिए कि मैं क्या बोलूं, सत्ता पक्ष ने इसे सदन की मर्यादा के विरुद्ध बताया, जबकि विपक्ष का कहना था कि चीन से जुड़े तथ्य अत्यंत महत्वपूर्ण हैं और चर्चा रोकी जा रही है। असलियत में भाजपा सांसद तेजस्वी सूर्या के भाषण के बाद राहुल ने बोलना शुरू किया था, उन्होंने कहा कि तेजस्वी ने कांग्रेस पार्टी के विरुद्ध आरोप लगाए और हमारी देशभक्ति पर सवाल उठाए, इस पर राहुल ने पूर्व आर्मी चीफ नरवणे की आत्मकथा को कोट करना शुरू किया, राहुल ने कहा कि नरवणे की आत्मकथा एक मैग्जीन में छपी है, इसके बाद राहुल ने मनोज मुकुंद नरवणे की आत्मकथा को कोट करना शुरू किया कि आप समझेंगे कि कौन है देशभक्त, वो कहते हैं कि चीनी टैंक भारतीय पोजशीन में कैलाश रेंज के कुछ सौ मीटर ही दूर थे। ओम बिरला ने भी सदन के नियम- 349 का उल्लेख करते हुए कहा कि अखबार की कटिंग या, अ-प्रकाशित पुस्तकों पर चर्चा करने की परंपरा नहीं है, सदन की कार्यवाही नियमों और प्रक्रियाओं के अनुसार चलती है, इसके बाद सोमवार से ही सदन में हंगामा शुरू हो गया और फिर राहुल गांधी सदन के बाहर भी मुद्दे को लगातार उठा रहे हैं और सदन में न बोलने देने का आरोप लगा रहे हैं। यह कहता है नियम- 349 लोकसभा की कार्यवाही सुचारु रूप से चलाने के लिये कई तरह के नियम बनाये गए हैं, जिनका प्रत्येक सांसद को पालन करना होता है, ऐसा ही एक नियम- 349 है, इस नियम के अंतर्गत सदन में किसी भी चित्र, पत्र, अ-प्रकाशित पुस्तक या, समाचार पत्र का प्रदर्शन करने पर रोक है, इस नियम के अंतर्गत किसी भी सदस्य के बोलते समय गलत तरीके से या, शोर से बीच में बोलने से नहीं रोका जा सकता है, बोलने वाले किसी सदस्य के बीच से नहीं गुजरा जा सकता है, जब कोई दूसरा सदस्य बोल रहा हो तो, कार्यवाही में रुकावट नहीं डाल सकते हैं, सीटी नहीं बजा सकते और कमेंट्री नहीं कर सकते हैं, सदन में नारे नहीं लगा सकते हैं, इसी तरह संसद भवन परिसर में भी कोई भी ऐसा साहित्य, सवाल-जवाब, पैम्फलेट, प्रेस नोट, लीफलेट आदि नहीं बांटे जा सकते हैं। पुस्तक लिखने को सैन्य अफसरों के लिए हैं कड़े नियम मनोज मुकुंद नरवणे 2019 से 2022 तक भारतीय सेना के अध्यक्ष रहे थे, इन्होंने फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी नाम से पुस्तक लिखी है, इस पुस्तक में उन्होंने अपने कैरियर, नेतृत्व और 2020 में भारत-चीन सीमा पर लद्दाख में हुए तनाव के बारे में भी लिखा है लेकिन, पुस्तक अभी तक विधिवत प्रकाशित नहीं हुई है। असलियत में सैन्य अधिकारियों द्वारा पुस्तक लिखने पर कई नियम हैं। अगर, किसी पुस्तक में संवेदनशील जानकारी है तो, उसके लिये विशेष नियम बनाये गये हैं। सेवारत अधिकारियों के लिये Army Act, Official Secrets Act और Service Conduct Regulations के अंतर्गत कई प्रतिबंध होते हैं, इसलिए कोई भी सैन्य अधिकारी बिना केंद्र सरकार की अनुमति के सेवा से जुड़ी जानकारी, राजनीतिक मुद्दे या, गोपनीय बातें पुस्तक, लेख या, भाषण में नहीं बता सकता है, ऐसा करने पर दंडित किया जा सकता है। सेवानिवृत्त अधिकारियों के लिये जून 2021 में सेंट्रल सिविल सर्विसेज (पेंशन) रूल्स में संशोधन किया गया है, जिनमें बताया गया है कि खुफिया या, सुरक्षा से जुड़े विभागों में काम करने वाले सेवानिवृत्त अधिकारी बिना पूर्व अनुमति के अपनी सेवा से जुड़ी जानकारी प्रकाशित नहीं कर सकते है, रक्षा सेवाओं में भी pre-publication clearance व्यवस्था लागू होती है। रक्षा सेवाओं पर नियम सीधे नहीं बल्कि, समान सिद्धांत के रूप में लागू होते हैं। पूर्व सेना प्रमुख जैसे उच्च पद के अधिकारी गोपनीय जानकारी रखते हैं, ऐसे में उनकी पुस्तक की प्री-पब्लिकेशन सिक्योरिटी क्लियरेंस यानी, पूर्व समीक्षा बेहद आवश्यक होती है। रक्षा मंत्रालय और भारतीय सेना पुस्तक की लाइन-बाय-लाइन जांच करती है। अगर, पुस्तक में संवेदनशील बातें जैसे, सीमा विवाद, ऑपरेशन या, नीतियों से संबंधित जानकारी है तो, सरकार बदलाव की मांग कर सकती है या, प्रकाशित करने की अनुमति नहीं देती है, इसी प्रक्रिया में मनोज मुकुंद नरवणे की पुस्तक है, उनकी पुस्तक 2024 से रक्षा मंत्रालय की समीक्षा में है और प्रकाशक से कहा गया है कि समीक्षा पूरी होने तक पुस्तक के अंश या, सॉफ्ट कॉपी किसी को न दें, इस पर मनोज मुकुंद नरवणे ने अक्टूबर 2025 में कहा था कि पुस्तक लिखना उनका काम था, अनुमति लेना प्रकाशक का। गत वर्ष अक्टूबर में मनोज मुकुंद नरवणे एक लिटरेचर फेस्टिवल में हिमाचल प्रदेश के कसौली गये थे, जहां उन्होंने कहा था कि मुझे लगता है कि यह मैच्योर हो रही है, पुरानी शराब की तरह, जितनी देर लगेगी, यह ज्यादा से ज्यादा विंटेज होगी, ज्यादा कीमत वाली। अ-प्रकाशित पुस्तक का उल्लेख नहीं कर सकते अ-प्रकाशित पुस्तक कानूनी रूप से आम नागरिकों के लिए उपलब्ध नहीं होती है। प्रकाशन से पहले पुस्तक की पांडुलिपि लेखक, प्रकाशक और समीक्षा करने वाले अधिकारी तक सीमित रहती है, ऐसे में कोई भी आम आदमी, पत्रकार या, राजनीतिज्ञ पुस्तक को कानूनी रूप से नहीं पढ़ सकते हैं। अगर, पुस्तक का कोई अंश लीक हो गया है और उस हिस्से को कोई पढ़ता है या, शेयर करता है तो, यह गोपनीयता का उल्लंघन माना जा सकता है, इसीलिये लोकसभा में अ-प्रकाशित पुस्तक का अंश पढ़ने की अनुमति राहुल गांधी को नहीं मिली। समाचार एजेंसी ने लीक किये थे पुस्तक के अंश नियम के विरुद्ध एक समाचार एजेंसी ने मनोज मुकुंद नरवणे की पुस्तक के अंश प्रकाशित किये थे। एजेंसी के समाचार में पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर रेचिन ला पर्वत दर्रे पर चीन की सेना और टैंकों का उल्लेख था, इन अंशों में बताया गया था कि जब चीन की ओर से यह नापाक हरकत की जा रही थी, उस दौरान मनोज मुकुंद नरवणे ने चीन-भारत की सेना के बीच हुई तनाव की स्थिति पर रक्षा मंत्री, विदेश मंत्री, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और रक्षा कर्मचारियों के प्रमुख से बातचीत की थी। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के साथ फोन पर बातचीत के बाद दिमाग में कई अलग-अलग विचार दौड़ रहे थे। उन्होंने रक्षा मंत्री को स्थिति की गंभीरता की जानकारी दी, उन्होंने कहा कि उस दौरान पीएम से भी बात की थी। उन्होंने कहा था कि यह पूरी तरह से एक सैन्य निर्णय है, जो उचित समझो, वो करो, साथ ही उन्होंने कहा कि मुझे अपनी इच्छानुसार कार्य करने की पूर्ण स्वतंत्रता के साथ एक कड़ा फैसला लेने की जिम्मेदारी दी गई थी, उस दिन को याद करते हुए उन्होंने लिखा है कि इसके बाद मैंने एक गहरी सांस ली और कुछ मिनटों के लिए चुप-चाप बैठा रहा। दीवार घड़ी की टिक-टिक को छोड़कर सब कुछ शांत था। उन्होंने लिखा कि मैं आर्मी हाउस में था, एक दीवार पर जम्मू-कश्मीर और लद्दाख का नक्शा था, दूसरी दीवार पर पूर्वी कमान का, वे अचिह्नित नक्शे थे लेकिन, जैसे ही मैंने उन्हें देखा, मैं प्रत्येक इकाई के स्थान की कल्पना कर सकता था, हम हर तरह से तैयार थे लेकिन, क्या मैं वास्तव में युद्ध शुरू करना चाहता था? यह सवाल मन में था। अध्ययन किये बिना बोले राहुल गांधी सदन में गलवां घाटी का उल्लेख करते हुये राहुल गांधी ने शोर-शराबे के बीच कहा कि चीन के टैंक कैलाश रिज पर हमारी पोजिशन से सिर्फ कुछ 100 मीटर ही दूर थे, इस दौरान राहुल गांधी ने मनोज मुकुंद नरवणे को सेना प्रमुख भी कहा, इससे स्पष्ट है कि राहुल गांधी ने स्वयं ही गहन अध्ययन नहीं किया है, क्योंकि कैलाश रिज लद्दाख में है और वह डोकलाम से अलग क्षेत्र है, साथ ही मनोज मुकुंद नरवणे डोकलाम तनाव के समय सेना प्रमुख भी नहीं थे, इस दौरान सेनाध्यक्ष बिपिन रावत थे। मनोज मुकुंद नरवणे के कार्यकाल में भारत और चीन के बीच पूर्वी लद्दाख में तीन अलग-अलग हिस्सों में संघर्ष हुआ था, इनमें कैलाश रिज का रेजांग ला एक हिस्सा था। डोकलाम सिक्किम के पास भारत, भूटान और चीन के बीच का एक ट्राई-जंक्शन है, एक सपाट और ऊंचा पठार है। कैलाश रिज पूर्वी लद्दाख में स्थित है, जो पैंगोंग सो झील के दक्षिण से शुरू होकर रेजांग ला और रेचिन ला जैसे दर्रों तक फैली पहाड़ियों की एक रिज है। यह हैं भारत-चीन के बीच विवाद के कारण भारत और चीन के विवाद के पीछे की बात करें तो, डोकलाम विवाद भूटान और चीन के बीच है। भारत भूटान के दावे का समर्थन करता है, क्योंकि यह भारत की सुरक्षा (चिकन नेक कॉरिडोर) के लिए बेहद संवेदनशील क्षेत्र है। 2017 में चीन के निर्माण संबंधी प्रयासों को रोकने के लिए भारत ने क्षेत्र में सेना तैनात कर दी थी, जिसको लेकर दोनों देशों के बीच 73 दिनों तक तनाव रहा था, फिर चीन ने अपनी सेना को वापस बुला लिया था, इस दौरान भारतीय सैनिकों ने शारीरिक रूप से क्षेत्र को ब्लॉक किया था। कैलाश रिज विवाद भारत और चीन के बीच है, यह वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) के निकट है और लद्दाख सेक्टर का हिस्सा है, यहां दोनों देश सीमा को लेकर बातचीत कर रहे हैं। भारत और चीन के बीच जून 2020 में गलवां घाटी में संघर्ष हुआ था, जिसमें दोनों देशों के सैनिकों की जान गई थी। चीन ने कई और क्षेत्रों में घुसपैठ का प्रयास किया था। जून-जुलाई के दौरान चीनी सेना ने कैलाश रेंज के पास कब्जा करने को अपने टैंक और सैन्य टुकड़ी भेजी थी। अगस्त 2020 में भारतीय सेना ने एक सरप्राइज ऑपरेशन के अंतर्गत कैलाश रिज की ऊंचाइयों पर कब्जा कर लिया था, इससे भारतीय सेना चीनी सेना के कैंपों के ठीक ऊपर बैठ गई थी, जिससे चीन दबाव में आ गया था। सभापति ने आठ सांसद निलंबित किये सदन में मंगलवार को अमर्यादित व्यवहार करने पर कांग्रेस के गुरदीप सिंह औजला, मणिकम टैगोर, अमरिंदर सिंह राजा वडिंग, किरण कुमार रेड्डी, हिबी ईडन, डीन कुरियाकोस, प्रशांत पडोले और माकपा के एस वेंकटेशन शेष अवधि के लिये निष्कासित कर दिए गये, इसके अलावा राहुल गांधी ने सदन में बोलना जारी रखा तो, अध्यक्ष ने कई अन्य सदस्यों को बोलने के लिए आमंत्रित किया, इस पर राहुल गांधी के समर्थन में विपक्ष के तीन सांसद नरेश उत्तम पटेल, शताब्दी राय और डीएम खातिर आनंद ने बोलने से मना कर दिया, इसके बाद विपक्ष की ओर से जोरदार हंगामा शुरू हो गया, जिससे सदन की कार्यवाही बाधित हो गई। मुझे बोलने नहीं दिया जा रहा है: राहुल राहुल गांधी ने पत्रकारों से कहा कि पता नहीं सरकार क्यों डर रही है, मोदी सरकार सच छुपा रही है, राष्ट्रीय सुरक्षा पर चर्चा जरूरी है। मैं सुरक्षा के मुद्दे पर सदन में बोलना चाहता था, पूर्व सेना प्रमुख ने राजनाथ सिंह से क्या कहा था, पता नहीं सरकार क्यों डरी हुई है, मैं पूर्व सेना प्रमुख की बात बताना चाहता था, नरवणे जी ने प्रधानमंत्री के बारे में, राजनाथ के बारे में एक आर्टिकल में लिखा है, मैं वो बोल रहा हूं लेकिन, मुझे बोलने नहीं दिया जा रहा है, चीन हमारे सामने आ रहा था तब 56 इंच की छाती को क्या हुआ था? राहुल ने कहा कि मैं सदन में बोलना चाहता हूं, मुद्दा वही है, जो प्रधानमंत्री और राजनाथ सिंह जी ने कहा, जमीन ली गई या नहीं, यह एक अलग सवाल है, हम उस पर बाद में बात करेंगे लेकिन, उससे पहले, देश के नेता को दिशा-निर्देश देने चाहिए, देश के नेता को फैसले लेने से पीछे नहीं हटना चाहिए और फैसले दूसरों के कंधों पर नहीं छोड़ने चाहिए, प्रधानमंत्री ने यही किया है। राहुल गांधी ने कहा कि मुझे बोलने नहीं दिया जा रहा है, मुझे सिर्फ दो-तीन लाइनें बोलनी हैं, यह राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला है, यह पूर्व सेना प्रमुख के शब्द हैं और यह वह बात-चीत है, जो उन्होंने राजनाथ सिंह जी और प्रधानमंत्री मोदी से की है, मैं बस इतना कहना चाहता हूं कि मैं सदन में वही कहना चाहता हूं, जो पूर्व सेना प्रमुख ने लिखा है और राजनाथ सिंह और प्रधानमंत्री मोदी ने उन्हें क्या आदेश दिए थे। राहुल ने लोकसभा अध्यक्ष को पत्र लिखा राहुल गांधी ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र लिखा है, जिसमें उन्होंने स्पष्ट किया है कि राष्ट्रपति के अभिभाषण पर बोलने से उन्हें रोकना लोकतंत्र के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है और राष्ट्रीय सुरक्षा पर चर्चा को रोकने का प्रयास है। पत्र में लिखा है कि कल जब मैं राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा के दौरान बोल रहा था तो, आपने मुझे उस पत्रिका की प्रमाणिकता सत्यापित करने को कहा, जिसका मैं हवाला देना चाहता था। मैंने आज अपने भाषण की शुरुआत में दस्तावेज को प्रमाणित कर दिया। परंपरा के अनुसार एक सदस्य, जो किसी दस्तावेज का हवाला देना चाहता है, उसे उसका प्रमाणिकरण करना होता है, इस प्रक्रिया के पूरा होने के बाद स्पीकर सदस्य को दस्तावेज का हवाला देने की अनुमति देते हैं, इसके बाद इसका जवाब सरकार की जिम्मेदारी होती है और अध्यक्ष का कर्तव्य समाप्त हो जाता है। मुझे लोकसभा में बोलने से रोकना केवल इस परंपरा का उल्लंघन नहीं है बल्कि, यह गंभीर चिंता का विषय है कि विपक्ष के नेता के रूप में मुझे राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण मामलों पर बोलने से रोकने का जान-बूझ कर प्रयास किया गया। राष्ट्रपति के अभिभाषण में राष्ट्रीय सुरक्षा एक मुख्य विषय था, जिस पर संसद में चर्चा होना आवश्यक है। राहुल गांधी ने स्पीकर को याद दिलाया कि संसद में सभी सदस्यों के अधिकारों की रक्षा करना, उनकी संवैधानिक और संसदीय जिम्मेदारी है। उन्होंने लिखा कि विपक्ष के नेता और हर सदस्य को बोलने का अधिकार लोकतंत्र का अभिन्न हिस्सा है। राहुल गांधी ने लिखा है कि इस तरह के अधिकारों से वंचित किए जाने की वजह से संसदीय इतिहास में पहली बार ऐसी स्थिति उत्पन्न हुई, जब सरकार के कहने पर स्पीकर ने विपक्ष के नेता को राष्ट्रपति के अभिभाषण पर बोलने से रोका। उन्होंने इसे लोकतंत्र पर कलंक बताते हुए कड़ा विरोध दर्ज कराया। राहुल ने बुधवार को सदन के बाहर पुस्तक दिखाई राहुल गांधी ने सोमवार और मंगलवार की तरह ही बुधवार को भी मनोज मुकुंद नरवणे की अ-प्रकाशित पुस्तक का मुद्दा उठाया। बुधवार को राहुल गांधी ने संसद के बाहर मीडिया के सामने मनोज मुकुंद नरवणे की पुस्तक को दिखाया। राहुल गांधी ने मीडिया से कहा कि मुझे नहीं लगता कि प्रधानमंत्री आज लोकसभा में आने की हिम्मत करेंगे, क्योंकि अगर वे आए तो, मैं उन्हें यह किताब सौंप दूंगा। अगर, प्रधानमंत्री आते हैं तो, मैं स्वयं जाकर उन्हें यह किताब दूंगा, ताकि वे इसे पढ़ सकें और देश को सच्चाई का पता चल सके। हंगामे के कारण टल गया प्रधानमंत्री का संबोधन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी राष्ट्रपति के अभिभाषण पर बुधवार शाम पांच बजे बोलने वाले थे लेकिन, हालात असामान्य होने पर सदन की कार्यवाही स्थगित कर दी, इस पर भाजपा सांसद मनोज तिवारी ने आरोप लगाया कि यह विरोध पहले से तय योजना के तहत किया गया था। उनका दावा है कि महिला सांसद प्रधानमंत्री की सीट के आस-पास घेराव जैसी स्थिति बना रही थीं। उन्होंने कहा कि स्थिति डराने वाली थी और संसदीय कार्य मंत्री कंवल जीत सिंह ढिल्लों की तत्परता से हालात काबू में आए, वहीं विपक्ष ने इसे लोकतांत्रिक विरोध बताया। मनोज तिवारी ने कहा कि शाम करीब पांच बजे जब सदन फिर से शुरू हुआ और प्रधानमंत्री के जवाब की उम्मीद थी तभी विपक्ष की कुछ महिला सांसद ट्रेजरी बेंच की सीटों के पास पहुंच गईं, इनमें वर्षा गायकवाड़ और ज्योतिमणि शामिल थीं। उन्होंने डू व्हॉट इज राइट लिखा बड़ा बैनर पकड़ रखा था। यह विरोध एक दिन पहले निलंबित किए गए आठ विपक्षी सांसदों के समर्थन में बताया गया। महिला सांसदों ने प्रधानमंत्री की सीट के आस-पास खड़े होकर विरोध जताया, उस समय पीठासीन सभापति संध्या राय सदन चला रही थीं, उन्होंने व्यवस्था बनाए रखने की अपील की लेकिन, हंगामा जारी रहा। ट्रेजरी बेंच के पास विरोध जारी रहने पर कार्यवाही स्थगित कर दी गई, इसके बाद में कई केंद्रीय मंत्रियों के समझाने पर महिला सांसद वहां से हटीं लेकिन, तब तक प्रधानमंत्री का संबोधन नहीं हो सका और दिन की कार्यवाही समाप्त कर दी गई, इस मुद्दे पर राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री पर सीधा हमला बोलते हुए एक्स पर लिखा कि पीएम मोदी सच्चाई का सामना करने से डर रहे हैं, इसलिए सदन में नहीं आए। निशिकांत दुबे ने खोली नेहरू-गांधी खानदान की पोल राहुल गांधी द्वारा बजट सत्र के दौरान मनोज मुकुंद नरवणे की अ-प्रकाशित पुस्तक के अंश को मुद्दा बनाया गया है, इसके जवाब में भाजपा ने भी पुस्तकों के हवाले से ही पलटवार किया है। भाजपा सांसद निशिकांत दुबे कई प्रकाशित और प्रतिबंधित पुस्तकों के कवर लेकर सदन पहुंचे और फिर उन्होंने कांग्रेस पर इतिहास छिपाने का आरोप लगाया। निशिकांत दुबे सदन में जब किताबों का हवाला देकर बोल रहे थे तब सभापति ने उन्हें बैठने के लिए कहा लेकिन, वे अपनी बात रखने पर अड़े रहे, इस दौरान विपक्षी सांसदों ने भी विरोध शुरू कर दिया। शोर-शराबा बढ़ने पर सदन की कार्यवाही रोकनी पड़ी। निशिकांत दुबे ने मीडिया से कई पुस्तकों के नामों का उल्लेख करते हुए कहा कि इन पुस्तकों में कांग्रेस शासन, आपातकाल और कथित विदेशी प्रभाव से जुड़े गंभीर आरोप दर्ज हैं, उनका कहना था कि कई पुस्तकों पर कांग्रेस सरकार के समय प्रतिबंध लगाया गया था और अब उन पर खुली चर्चा होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि मेरा स्पीकर साहब से यह भी अनुरोध है कि आप जो छपी हुई किताब है, उस पर ही चर्चा करा लीजिए। संसद में चर्चा हो जाएगी तो, गांधी-नेहरू परिवार की जो मक्कारी है, वो सबके सामने आ जाएगी। 50 के दशक में चीन हमसे पीछे हुआ करता था लेकिन, वो कैसे आगे निकल गया, उसके पूरे इतिहास पर चर्चा होनी चाहिए इस पर प्रियंका गांधी वाड्रा ने कहा कि कांग्रेस की ओर से सवाल उठाया गया कि अगर राहुल गांधी को किसी किताब का हवाला देने से रोका गया तो, भाजपा सांसद कैसे किताबों को कोट कर सकते हैं। प्रियंका गांधी ने आपत्ति जताते हुए समान नियम लागू करने की मांग की, इस पर निशिकांत दुबे ने जवाब दिया कि फर्क साफ है। राहुल गांधी ने अ-प्रकाशित किताब का जिक्र किया, जबकि उन्होंने सिर्फ प्रकाशित और दर्ज किताबों की बात रखी। राहुल गांधी की उद्दंडता का वीडियो वायरल राहुल गांधी की जिद से बजट सत्र हंगामे की भेंट चढ़ने वाला है। सदन बाहर भी राहुल गांधी की उद्दंडता चर्चा का विषय बनी हुई है। कांग्रेस सांसद प्रदर्शन कर रहे थे, इस दौरान दौरान केंद्रीय राज्यमंत्री रवनीत सिंह बिट्टू निकल कर जा रहे थे तभी राहुल गांधी ने उनकी ओर इशारा करते हुये कहा कि यह रहा गद्दार, इसका चेहरा देखो, उनसे हाथ मिलाने का प्रयास किया और कहा कि हैलो भाई, मेरे गद्दार दोस्त… चिंता मत करो, तुम वापस कांग्रेस में आ जाओगे। राहुल गांधी की अभद्रता पर रवनीत सिंह बिट्टू ने भी तत्काल प्रतिक्रिया दी, उन्होंने राहुल गांधी से हाथ मिलाने से मना करते हुए पलटवार किया कि देश के दुश्मन, इसके बाद दोनों नेताओं के बीच कुछ देर तक तीखी बहस होती दिखाई दी, इस बातचीत का वीडियो सोशल साइट्स पर वायरल होने के बाद राहुल गांधी की फजीहत हो रही है। राहुल गांधी के आरोप में नहीं है कोई दम आतंकी घटना के बाद पाकिस्तान से भारत का तनाव बढ़ गया था, इस दौरान एनएससी ने निर्णय लिया था कि सेना को छूट दे दी जाये। हमला कब करना है, कैसे करना है, कितना करना है, यह सब सेना ही तय करे, इस निर्णय के बारे में मीडिया में जोर-शोर से बताया गया, यही सर्व-दलीय बैठक में बताया गया और यही बात संसद को बताई गई थी, इस निर्णय पर किसी ने सवाल नहीं उठाया था, साथ ही सभी ने निर्णय सही बताया था, इसी तरह का निर्णय चीन के मामले में भी लिया गया, जिसके बारे में पीएम के हवाले से रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने उस समय के सेनाध्यक्ष मनोज मुकुंद नरवणे को अवगत कराया, इसी तरह का दावा किया जा रहा है अर्थात्, निर्णय का आशय था कि वो गोली चलाये, तोप चलाये, टैंक चलाये, लाठी चलाये या, लाउडस्पीकर से चीख कर गाली दे या, हमले की प्रतीक्षा करे, जैसा हमला हो, वैसी प्रतिक्रिया दे, कुल मिला कर निर्णय लेने का अधिकार दे दिया गया था, संपूर्ण शक्ति दे दी गई थी, इस बात को राहुल गांधी नकारात्मक भाव से प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहे हैं। युद्ध कैसे करना है और कितना करना है, इसका निर्णय सेना को ही लेना होता है, राजनैतिक निर्णय हाँ या, न में ही होता है, इसलिए राहुल गांधी की जिद से बजट सत्र बर्बाद हो सकता है, इससे अधिक कुछ नहीं होगा। मैंने प्रधानमंत्री से सदन में न आने का आग्रह किया था: बिरला संसद के बजट सत्र के दौरान हंगामे के कारण पीएम नरेंद्र मोदी बुधवार को लोकसभा में नहीं बोले, इस पर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने गंभीर और अहम बयान दिया है, उन्होंने कहा कि जिस तरह का माहौल, उस दिन लोकसभा में बना, उसमें कोई भी अ-प्रिय और अ-प्रत्याशित घटना घट सकती थी, ऐसा व्यवहार संसद की गरिमा और लोकतांत्रिक मर्यादाओं के बिल्कुल विपरीत था, उन्होंने सदन को बताया कि लोकसभा के इतिहास में पहली बार उन्होंने इस तरह का आचरण देखा है, कुछ सदस्यों ने न केवल सदन के भीतर बल्कि, अध्यक्ष के कार्यालय में भी जिस प्रकार का व्यवहार किया, वह संसदीय परंपराओं के अनुरूप नहीं था, यह संसदीय व्यवस्था पर काला धब्बा है, अब तक राजनीतिक मतभेदों को कभी भी अध्यक्ष के कार्यालय तक नहीं ले जाया गया, मतभेद लोकतंत्र का हिस्सा हैं लेकिन, सदन को सुचारू रूप से चलाने में सभी सांसदों का सहयोग आवश्यक है, उन्होंने खुलासा किया कि जब प्रधानमंत्री को राष्ट्रपति के अभिभाषण पर जवाब देना था तब उन्हें पुख्ता जानकारी मिली थी कि कांग्रेस के कुछ सदस्य प्रधानमंत्री के आसन तक पहुंचने की कोशिश कर सकते हैं, उन्होंने स्वयं सदन में ऐसे दृश्य देखे, जिससे स्थिति और गंभीर हो गई थी, यदि ऐसा होता तो, यह न केवल अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण होता बल्कि, देश की लोकतांत्रिक परंपराओं को भी गहरा आघात पहुंचता, इसी आशंका को देखते हुए उन्होंने एहतियातन प्रधानमंत्री से सदन में न आने का अनुरोध किया, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनके आग्रह को स्वीकार किया और सदन में नहीं आये, इस पर उन्होंने प्रधानमंत्री का आभार जताते हुए कहा कि इससे एक बड़े अ-प्रिय दृश्य को टालने में मदद मिली और सदन की गरिमा बनी रही। (लेखक, दिल्ली से प्रकाशित हिंदी साप्ताहिक गौतम संदेश के संपादक हैं) ईएमएस/06फरवरी2026