मौजूदा वक्त में विकसित देशों के साथ ही प्रमुख विकासशील देशों में जिस तरह के घटनाक्रम देखने को मिल रहे हैं, उससे दुनियां में एक बड़े बदलाव की आहट सुनाई दे रही है। मनमाने ढंग से देशों पर अपने नियमों को लादना और न मानने पर कठोर से कठोर कार्यवाही करना, सामान्य लगने लगा है। न्याय दिलाने या जुल्म को खत्म करने की बजाय शक्ति का उपयोग अपने आधिपत्य को बढ़ाने के लिए किया जाने लगा है। इस तरह से इक्कीसवीं सदी का तीसरा दशक दुनियां की तस्वीर बदलने को आतुर नजर आ रहा है। वैश्विक राजनीति एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी दिख रही है। यही नहीं लंबे समय तक अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का नेतृत्व करने वाला अमेरिका अब धीरे-धीरे कई बहुपक्षीय मंचों और वैश्विक संस्थानों से पीछे हटता नजर आया है। इसके विपरीत, चीन इस खाली होते कूटनीतिक मैदान में न केवल सक्रिय हुआ है, बल्कि स्वयं को एक वैकल्पिक नेतृत्वकर्ता के रूप में स्थापित करने की कोशिश भी कर रहा है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि भविष्य का वैश्विक सुपर पावर कौन होगा, अमेरिका, रुस, चीन या कोई और उभरती ताकत? अमेरिका में दूसरी बार बने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक वर्ष के कार्यकाल में 66 बहुपक्षीय संगठनों से बाहर निकलने की घोषणा करके सभी को चौंकाने का काम किया है। इससे वैश्विक राजनीति में एक बड़ा शून्य पैदा हो गया है। जलवायु परिवर्तन, श्रम अधिकार और प्रवासन जैसे मुद्दों को ‘राष्ट्रीय हितों के विरुद्ध’ बताकर उनसे दूरी बनाना अमेरिका की उस परंपरागत भूमिका से हटना है, जिसमें वह वैश्विक सार्वजनिक वस्तुओं के संरक्षक की भूमिका निभाता चला आ रहा था। फिलहाल इस बदलाव का लाभ चीन को मिला है, जिसने कूटनीतिक स्तर पर अपनी सक्रियता बढ़ा दी है। बीजिंग में विदेशी नेताओं की मेजबानी के दौरान राष्ट्रपति शी जिनपिंग का यह कहना, कि मौजूदा अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था भारी दबाव में है और समानता आधारित प्रणाली की जरूरत है, चीन की महत्वाकांक्षा को स्पष्ट करता है। वैसे चीन इस दिशा में लंबे समय से काम करता चला आया है। खास बात यह है कि चीन का उभार केवल बयानबाजी तक सीमित नहीं रहा है। अंतर्राष्ट्रीय सर्वेक्षणों में यह धारणा मजबूत हुई है कि आने वाले दशकों में चीन का वैश्विक प्रभाव तेजी से बढ़ेगा। ऐसे में अमेरिका और चीन के बीच शक्ति का जो अंतर कभी बहुत व्यापक था, वह अब सिमट रहा है। हालांकि सैन्य क्षमता, तकनीकी नवाचार और सॉफ्ट पावर के लिहाज से अमेरिका अब भी अग्रणी है, लेकिन चीन आर्थिक और कूटनीतिक मोर्चे पर उसकी बराबरी बल्कि कई मामलों में तो आगे बढ़ता दिखा है। इस वैश्विक रणनीति में ‘ग्लोबल साउथ’ की भूमिका बेहद अहम है। एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के विकासशील देशों के साथ चीन ने बीते एक दशक में गहरे संबंध बनाए हैं। वर्ष 2013 में शुरू किया गया बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) इसी का सशक्त उदाहरण है, जिसके तहत चीन ने बुनियादी ढांचे में बड़े पैमाने पर निवेश कर रखा है। आज जब पश्चिमी देश चीन को रणनीतिक रूप से घेरने का प्रयास कर रहे हैं, तब यही विकासशील देश उसके लिए राजनीतिक और कूटनीतिक समर्थन का आधार बनते दिख रहे हैं। आर्थिक रूप से भी चीन की स्थिति मजबूत बनी हुई है, 2025 में पांच प्रतिशत की विकास दर और रिकॉर्ड व्यापार अधिशेष इसकी पुष्टि करते हैं। बावजूद इसके अमेरिका के सामने चीन का यह रास्ता जोखिमों से मुक्त नहीं है। अमेरिका टैरिफ-टैरिफ खेल रहा है, जबकि कई देशों में बीआरआई परियोजनाओं से जुड़े कर्ज संकट ने चीन को अपनी निवेश नीति पर पुनर्विचार के लिए मजबूर कर दिया है। यही कारण है कि अब वह बड़े और जोखिम वाले प्रोजेक्ट्स के बजाय छोटे, सुरक्षित और रणनीतिक निवेशों पर ध्यान दे रहा है। इसके साथ ही रूस और उत्तर कोरिया जैसे देशों के साथ उसकी बढ़ती नजदीकी ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय में चिंता बढ़ाई है। यह साझेदारी साझा लोकतांत्रिक मूल्यों पर नहीं, बल्कि अमेरिका-विरोध जैसे तात्कालिक हितों पर आधारित प्रतीत होती है, जिसका असर संयुक्त राष्ट्र में समन्वित मतदान के रूप में दिखता है। यहां महत्वपूर्ण यह भी है कि चीन पूरी वैश्विक व्यवस्था पर वर्चस्व स्थापित करने की जल्दबाजी में नहीं दिखता। फिलहाल बीजिंग की प्राथमिकता अपनी घरेलू राजनीतिक स्थिरता और कम्युनिस्ट पार्टी की सत्ता को सुरक्षित रखना है। इस दिशा में भी उसने मौजूदा वक्त में अनेक सख्त फैसले लिए हैं और अनेक जिम्मेदारों को सजा तक देने से पीछे नहीं हटा है। वह केवल उन्हीं अंतरराष्ट्रीय संस्थानों में नेतृत्वकारी भूमिका निभाता है, जहां उसके प्रत्यक्ष राष्ट्रीय सुरक्षा हित जुड़े हों। असल में चीन का लक्ष्य वैश्विक प्रभुत्व से अधिक एशिया-प्रशांत क्षेत्र में अमेरिकी प्रभाव को सीमित करना है, जिसकी झलक दक्षिण चीन सागर में बढ़ती सैन्य गतिविधियों से भी मिल जाती है। अंततः आज की दुनिया एक एकध्रुवीय व्यवस्था से बहुध्रुवीय संतुलन की ओर बढ़ रही है। अमेरिका और चीन के बीच यह प्रतिस्पर्धा केवल शक्ति की नहीं, बल्कि वैश्विक व्यवस्था की दिशा तय करने की भी है। आने वाले वर्षों में यह स्पष्ट होगा कि दुनिया किसी एक सुपर पावर के नेतृत्व को स्वीकार करती है या साझा, संतुलित और बहुपक्षीय व्यवस्था की ओर कदम बढ़ाती है। ईएमएस / 06 फरवरी 26