लेख
07-Feb-2026
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साहित्य की कई विधाओं के माहिर महेंद्र मयंक के लेखन भी विविधताओं से भरे पड़े हैं। उन्होंने अपने साहित्यिक कर्म की शुरुआत काव्य रचना से की, फिर कहानी लेखन में अपना हाथ आजमाया, उसके बाद नाटक लेखन की दुनिया को भी उन्होंने नहीं छोड़ा और फिर एक महत्वपूर्ण उपन्यास अरुणा भी हम पाठकों के लिए छोड़ गए। इसके अलावा जीवन के संघर्ष पथ पर चलते हुए उन्होंने फोटोग्राफी को अपने जीवन का माध्यम बनाया और फिर सरकारी फोटोग्राफर भी बने। असल में महेंद्रा मयंक का रचना संसार उन बातों से शुरू होता है, जहांँ साहित्यकार खामोश हो जाता है। तत्कालीन समाज की विद्रूपताओं और राजनीतिक गड़बड़ियों के खिलाफ उनके मन में अंदर तक वेदना है और उनकी वेदना, उनकी रचनाओं में प्रस्तुत होती हैं। वीर रस के कवि के रूप में ख्यात मयंक जी की रचनाएँ कभी दुश्मन मुल्कों को अपनी ताकत का एहसास कराती हैं, तो कभी उनके सामने दहाड़ती हुई प्रतीत होती हैं। दूसरी तरफ, वे उन दुश्मनों को भी अपनी रचनाओं के माध्यम से धमकाते हुए नजर आते हैं, जो भारत को, भारत की व्यवस्था को और भारत की एकता-अखंडता को खतरे में डालने की कोशिश करते हैं। कवि को ऐसी आजादी मिलनी चाहिए थी, जो देश में बेहतरी का आलम पैदा कर सकता। इसलिए वे अपनी रचना मेरी आवाज सुनो में लिखते हैं। आजादी क्या खाक मिली है / मिलकर बंदर बांट रहा है / जिसमें सीने में गोली खाई‌ / उसके दिल को तोड़ रहा है / देश की चिंता नहीं किसी को / शहर गांव में खूनी बसा / बम बारूद का ढेर लगा है / विकृत हो गई मनोदशा। मयंक जी की काव्य कृति मेरी आवाज सुनो पर डॉ तेज नारायण कुशवाहा लिखते हैं कि इस कृति की सभी कविताओं का केंद्रीय भाव गिरते हुए मानवीय मूल्यों की रक्षा करना है। कवि इसलिए आक्रोश में दिखता है, क्योंकि आजादी का प्रतिफल, जो देश को मिलना चाहिए था। वह मिला नहीं। इसलिए उनमें असंतोष है। विरोध है और लड़ने की ऊर्जा भी है। बिहार और भागलपुर के ख्याति प्राप्त व्यंग्यकार रामावतार राही उनके बारे में लिखते हैं कि हंसमुख चेहरा, विशाल हृदय, मिलनसार, कर्म के प्रति वफादार, ईमानदार व्यक्तित्व के धनी श्री महेंद्र जी अपने धारदार खुल्लम-खुल्ला व्यंग्य रचना के माध्यम से जन-जन के हृदय में छा जाने में काफी सफल रहे हैं और यही उनकी असली विशिष्टता है। देश की दुर्दशा पर वे अपनी कविता गणतंत्र में लिखते हैं। मुट्ठी में गणतंत्र का कानून/ न्यायालय भी अब बिकता है / खूनी अपराधी घोटाला कर / कसम सदन में खाता है। उड़ा रहे गणतंत्र की धज्जी / सांसद संसद में बिकता है / लोकतंत्र में सभी माफ है / राम बना सब मिलता है। धृतराष्ट्र की आंँखों में पट्टी / द्रोपदी सभा में चिल्लाती है/ दुर्योधन सदन में जश्न मनाता/ लोकतंत्र में जनता रोती है। जाति धर्म के बँटवारे पर/ खंजर घर-घर मिलता है/ शिवालय में चोरी होती/ यूँ राष्ट्रधर्म भी निभता है। विक्रमशिला हिंदी विद्यापीठ के कुल सचिव डॉ देवेंद्र नाथ साह उन पर लिखते हैं कि कवि मयंक ने कविता के माध्यम से अलगाववादियों, आतंकवादियों और नक्सलियों की ओर इशारा करते हुए खुले शब्दों-छंदों से वर्तमान शासन व्यवस्था पर आक्रोश जाहिर किया है और चीन को ललकारा है। हिमालय को तुम मत छेड़ो/ चट्टानों में होगा तेरा दफन/ मौत तुम्हारी दस्तक देती/ नहीं मिलेगा तुम्हें कफन। पुनः वे आगे कहते हैं कि पहली किरण की लाली छाई/ वीर शिरोमणि की ललकार/ हिम्मत है तो चढ़कर देखो/ भारत के हैं वीर तैयार। अपने जीवन काल में महेंद्र मयंक ने जीवन के विविध अलग-अलग मायनों को बड़ी ही शिद्दत से देखा और अनुभव किया। इस पर वरिष्ठ कथाकार रंजन लिखते हैं कि जीवन में इतने उतार-चढ़ाव और देश की विभिन्न संस्कृतियों को देखने-समझने के बाद इन्होंने जीवन के कितने अनुभवों को देखा होगा। यह सहज ही समझा जा सकता है और ऐसा व्यक्ति जब अभिव्यक्ति पर उतारू हो जाए, तो उसके शब्द कैसे तीखे, कैसे सच्चे और कितने सहज होंगे। उनकी रचनाओं में देखा जा सकता है। महेंद्र प्रसाद गुप्ता यानी महेंद्र मयंक का जन्म 10 जुलाई 1949 को मधेपुरा जिला के पुरैनी गणेशपुर में हुआ था। राजनीति शास्त्र में बीए की डिग्री प्राप्त करने के बाद उन्होंने जीवन यापन के लिए अनेक काम किये। बाद में फोटोग्राफी उनका मुख्य पेशा हो गया। भागलपुर में फोटोग्राफी करते हुए उन्होंने खलीफा बाग चमड़ा गोदाम लेने में अपना मकान बनाया और यहीं स्थायी रूप से रहने लगे। 1984 में उन्होंने संयुक्त कृषि प्रमंडल भागलपुर शाखा में फोटोग्राफर के रूप में पद पर योगदान दिया और 2009 को सेवानिवृत हुए। भागलपुर समेत देश के अनेक मंचों पर उन्होंने अपनी वीर-रस की रचनाओं का पाठ किया और लोगों के बीच राष्ट्रीय चेतना का संचार किया। उन्हें अनेक सम्मान प्राप्त हुए। बिहार के हिंदी साहित्य का इतिहास में महेंद्र मयंक के साहित्यिक अवदानों की चर्चा करते हुए सम्पादक दयानंद जायसवाल लिखते हैं कि अपने नाटक संग्रह मुंशीलाल का कुआं में मयंक जी ने नाटक की बदलती हुई रूपरेखा को बड़े परिनिष्ठित रूप में सूक्ष्म सूक्ष्मांकनों के साथ प्रस्तुत किया है। ये सादगी की प्रतिमूर्ति, साहित्य साधकों में निर्मल हृदय मनस्विता के प्रतिनिधि संवाहक हैं। महेंद्र मयंक द्वारा लिखित उपन्यास अरुणा स्त्रियों की मनोदशा, उनके मन में चल रही कुंठा, विचारों का द्वंद, जीवन का जद्दोजहद और इन सब के बीच खुद को खड़ा रखने के लिए संघर्ष और यहांँ तक की कुछ अवांछित स्थितियों को भी बड़ी ही कुशलता से अपना साहित्यिक रंग दिया है। इस उपन्यास पर संस्कृत और हिंदी के उद्भट्ट विद्वान प्रोफेसर डॉ राघवेंद्र नारायण आर्य लिखते हैं कि अरुणा में उपन्यासकार श्री महेंद्र मयंक जी ने एक पढ़ी-लिखी नारी की जीवन शैली पर प्रकाश प्रक्षेपित किया है। सामाजिकता के फलते-फूलते अरमानों के ताने-बाने बुनने वाली नवविवाहिता, रुपगर्विता है, चंद्रवदना है, मनोरमा है और है मनोहरा। परंतु, समाज में व्याप्त घोर निर्धनता, विवशता को पाकर अपने को यंत्रणाओं में निगडित होते देख घुटन अनुभव करती है। तभी तो सुखमय पारिवारिक जीवन जीने के लिए कुपथ के आचरण को भी अंगीकार करती है। अरुणा उपन्यास पर डॉ नारायण आगे लिखते हैं कि उपन्यास में जगह-जगह वासना का उन्मुक्त उभयपक्षीय तांडव है। यद्यपि भारतीय संस्कृति विहित आदर्श नार्योचित सीमा के अतिक्रमण से आपातत: दुष्परिणामों की शिकार होती है, तभी तो उसके सारे अरमान अंत में धराशायी हो चूर-चूर हो जाते हैं। परंतु, अब क्या- अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत ! अरुणा अपनी आँखों के सामने जमीन, मकान, धन-वैभव पुत्र-पुत्री, प्राणोपम पति को छुटते देखती है। पुरुषों की कामुकता और विषय भोग की अतिरिक्त लालसा के पथ पर चलकर अवांछित भोग विलास का सहारा लेती है और तो और अपने कंचन सी कोमल काया को असमय रोगों से ग्रसित देखकर असहाय हो मृत्यु को वरन करती है। साहित्यकार महेंद्र मयंक का असमय चला जाना, साहित्यिक जगत में एक बड़ा शून्य पैदा करता है। वह अपनी लेखनी, अपने कृतित्व और अपनी बेहतरीन स्मृतियों के लिए साहित्यिक जगत में सदा याद किये जाते रहेंगे। ( लेखक आकाशवाणी भागलपुर में नैमित्तिक उद्घोषक रह चुके है) ईएमएस/07/02/2026