लेख
07-Feb-2026
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वैसे तो राजनीति का अभिप्राय राजकाज चलाने वाली नीति से है। इसका एकमात्र मकसद समतामूलक सुसभ्य समाज का निर्माण करना और देश के चहुंमुखी विकास में योगदान देना है। लेकिन दुर्भाग्य से अपने देश में राजनीति का स्तर लगातार गिरता जा रहा है। यह क्षरण कहां जाकर थमेगा, पुख्ता तौर पर कोई नहीं कह सकता। यह गिरावट एक दिन में नहीं आयी है। आजादी के बाद हमारे संविधान निर्माताओं और नीति नियंताओं ने काफी सोच-विचार कर समाज और देश के विकास का सपना देखा था। तब हमारी गिनती एक लुटे-पिटे गरीब देशों में होती थी। आज हम विश्व की चौथी बड़ी अर्थव्यवस्था वाला देश होने का दावा करते हैं, लेकिन नैतिक तौर पर तेजी से पाताल की ओर गिरते जा रहे हैं। पिछले दिनों संसद के भीतर- बाहर जो कुछ भी घटित हुआ, उससे हमारा लोकतंत्र और ज्यादा शर्मसार हुआ है। संसद के बाहर लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष ने एक केन्द्रीय मंत्री को ‘गद्दार दोस्त’ कहकर पुकारा तो बदले में मंत्री ने उन्हें ‘देश का दुश्मन’ कह दिया। दोनों नेता कभी एक ही पार्टी में साथ रह चुके हैं। दोनों के पुरखों का देश के विकास में योगदान रहा है। बात इतने में थम जाती तो गनीमत थी। लोगबाग मान लेते कि हमउम्र होने के कारण दोनों ने मजाक में कुछ बोल दिया। बात बराबर। लेकिन यह क्या ? संसद में इस बात को लेकर बतंगड़ बना दिया गया। इसे समुदाय विशेष की अस्मिता से जोड़ दिया गया, खूब हंगामा हुआ। एक बड़बोले सांसद ने तो नेता प्रतिपक्ष को ‘फटीचर’ तक कह दिया। बेशक, तीनों ही शब्द माननीयों की गरिमा को गिराते हैं। ऐसा नहीं होना चाहिए था, लेकिन हो गया। अब दूसरी घटना। लगभग 22 वर्षों बाद संसद में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर प्रधानमंत्री धन्यवाद प्रस्ताव पर लोकसभा में अपनी बात नहीं रख सके। इससे पहले 10 जून 2004 को तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह को तब के विपक्ष (अब सरकार में) के विरोध के कारण संसद में बोलने नहीं दिया गया था। दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश के लिए दोनों ही घटनाएं शर्मसार करनेवाली हैं। लेकिन बात इतनी ही नहीं है। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला ने यह बयान देकर सनसनी फैला दी कि प्रधानमंत्री तो संसद में आकर अपनी बात कहने को इच्छुक थे, उन्हें मैंने ही सदन में आने से रोक दिया, क्योंकि उनके साथ कुछ अप्रत्याशित घटना घट सकती थी। सवाल उठता है कि क्या भारतीय लोकतंत्र के मंदिर संसद में हमारे प्रधानमंत्री असुरक्षित हैं ? अगर, वाकई यह बात सही है तो बहुत ही दुखदाई है। प्रधानमंत्री को किससे सुरक्षा का खतरा है ? संसद में तो जनता द्वारा चुने गए सांसद बैठते हैं। उनकी सुरक्षा के लिए लोकसभा अध्यक्ष के बुलाने पर मार्शल आते हैं। लोकसभा अध्यक्ष को इसका खुलासा करना चाहिए। घटना की नामजद एफआईआर करानी चाहिए और नामजद व्यक्ति अगर संसद का सदस्य है तो उसकी सदस्यता रद्द करनी चाहिए। ... और अगर यह बात सही नहीं है तो लोकसभा अध्यक्ष को अपने कहे के लिए देश से तत्काल माफी मांगनी चाहिए। अगर, देश के प्रधानमंत्री अपनी ही संसद में असुरक्षित हैं तो फिर देश में सुरक्षित कौन है ? गृहमंत्री क्या कर रहे हैं ? हमारी सुरक्षा एजेंसियां किसके आदेश का इंतजार कर रही हैं ? दरअसल, लोकसभा में प्रधानमंत्री के आगमन से पहले विपक्ष की कुछ महिला सांसद वेल में पहुंच गयी थीं, कुछ प्रधानमंत्री के बैठने के स्थान के बाहर खड़ी थीं। उनके हाथ में तख्ती थी। यह कोई नई बात नहीं है। अपनी बात मनवाने अथवा अध्यक्ष का ध्यान आकर्षित करने के लिए सांसद अकसर वेल में पहुंचते रहते हैं। वे अपनी बात की तख्ती लिये विरोध भी करते रहे हैं। इससे वे अपराधी नहीं बन जाते। सांसद भी जनता के चुने हुए प्रतिनिधि होते हैं और प्रधानमंत्री भी पूरे देश के हैं। इसी तरह लोकसभा अध्यक्ष भी पूरे सदन के अभिभावक होते हैं। याद कीजिए सोमनाथ चटर्जी को। 2004 से 2009 तक वह लोकसभा के अध्यक्ष थे। लोकसभा अध्यक्ष बनते ही उन्होंने यह कहते हुए अपनी पार्टी से इस्तीफा दे दिया था कि अब वह सांसदों के संरक्षक हैं। दल विशेष का सदस्य होकर वह ऐसा नहीं कर सकते। क्या ओम बिड़ला जी सोमनाथ चटर्जी का अनुसरण करेंगे ? हालांकि, दूसरे दिन प्रधानमंत्री ने राज्यसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर जवाब दिया। प्रधानमंत्री ने एक दिन पहले लोकसभा की घटना का जिक्र तो किया लेकिन अपनी जान पर खतरा नहीं बताया। कहा कि, लोकसभा में एक बड़ी दर्दनाक घटना घटी। मंगलवार को आसन पर कागज फेंका गया। तब पीठासीन अध्यक्ष असम के एक सांसद थे। क्या यह असम का अपमान नहीं है ? बुधवार को भी आसन पर कागज फेंके गए। उस समय आसन पर आंध्रप्रदेश के एक दलित सदस्य पीठासीन थे। यह दलितों का अपमान नहीं है ? प्रधानमंत्री ने नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी का जिक्र करते हुए कहा कि कांग्रेस के एक युवराज ने इसी सदन के एक माननीय सदस्य को गद्दार तक कह दिया। क्या यह सिक्खों और सिक्ख गुरुओं का अपमान नहीं है ? उन्होंने राज्यसभा सांसद सदानंद मास्टर का जिक्र करते हुए कहा कि केरल के कट्टरपंथियों ने भरी जवानी में विचारधारा से असहमत होने के कारण उनके दोनों पैर काट दिए थे लेकिन उनके मन में किसी के प्रति कटुता नहीं है। उन्होंने कहा कि मुहब्बत की तथाकथित दुकान चलाने वाले लोग मोदी की कब्र खोदना चाहते हैं। मुझे कहने दीजिए कि ऊपर लिखित घटनाएं राजनीति के गिरते स्तर के चुनिन्दा उदाहरण मात्र हैं। पिछले कई वर्षों से देश में मिल-बैठकर देश की समस्याओं महंगाई, बेरोजगारी, कानून व्यवस्था, महिला सुरक्षा, शिक्षा, स्वास्थ्य और सिंचाई आदि पर राजनीतिक दलों में कोई बात नहीं हो रही है। सत्ता पक्ष हो या विपक्ष दोनों की चिंता सिर्फ और सिर्फ चुनाव जीतने की रह गयी है। जनता की सेवा सुविधा हासिल करने का हथकंडा बन गया है। नागरिकों का कोई पुरसाहाल नहीं है। लोकतंत्र खतरे में है। प्रधानमंत्री का समूचा उद्बोधन राष्ट्रपति के अभिभाषण पर कम चुनावी राजनीति पर ज्यादा केन्द्रित रहा। आनेवाले दिनों में असम, पश्चिम बंगाल और केरल में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। इसीलिए उन्हें उन राज्यों के अपमान और सदानंद मास्टर के कटे पैर की चिंता थी। काश, प्रधानमंत्री दादरी के अखलाक की हत्या पर भी दो शब्द बोल दिए होते। आखिर वह समूचे देश के प्रधानमंत्री हैं। (यह लेखक के व्य‎‎‎क्तिगत ‎विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अ‎निवार्य नहीं है) .../ 7 फरवरी /2026