राष्ट्रीय
07-Feb-2026


सुप्रीम कोर्ट ने नए सिरे से निर्णय के लिए हाईकोर्ट को वापस भेज मामला नई दिल्ली,(ईएमएस)। सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया है जिसमें दो नाबालिग बच्चों की कस्टडी उनकी मां को सौंपी थी। कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट ने बाल कल्याण सिद्धांत को लागू करते समय अहम परिस्थितियों पर विचार नहीं किया। मामले को चार महीने के अंदर नए सिरे से विचार के लिए वापस भेज दिया। कोर्ट ने काउंसलिंग और मध्यस्थता के उन सुझावों का भी हवाला दिया जिनसे पता चलता है कि बच्चों ने पिता के साथ सहजता जताई थी और उनके साथ जाने की इच्छा जताई थी। बेंच ने कहा कि हाईकोर्ट का संकीर्ण दृष्टिकोण अपनाना और कल्याण को आसपास की परिस्थितियों से अलग करके देखना कानूनी रूप से गलत पाया। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक जस्टिस पंकज मित्तल और जस्टिस एसवीएन भट्टी की पीठ ने टिप्पणी की-मध्यस्थता रिपोर्ट के मुताबिक दोनों बच्चों ने अपने पिता के साथ जाने की इच्छा जताई। कतर में ये बच्चे जन्मे थे, वहां की यादें इन बच्चों को बहुत कम थी। इसके बाद भी वह वहां पर पिता के साथ रहने और घूमने की इच्छा जताई। यह मामला कतर में जन्मे और पले-बढ़े दो नाबालिग लड़कों से संबंधित है, जहां उनके माता-पिता दोनों रहते थे। दोनों माता-पिता भारत के नागरिक हैं। बच्चों का पिता कतर में इंजीनियर है। दोनों ने 2015 में श्रीनगर में शादी की थी। हालांकि, वैवाहिक विवाद के बाद कतर की एक अदालत ने बच्चों की कस्टडी मां को सौंप दी, जबकि पिता को अभिभावक का दर्जा प्राप्त रहा। बाद में कथित तौर पर पिता की सहमति, मूल पासपोर्ट और कतर की अदालत की पूर्व अनुमति के बिना मां शैक्षणिक सत्र के दौरान बच्चों को श्रीनगर ले आई। इसके बाद भारत में अभिभावक एवं आश्रित अधिनियम के तहत कार्यवाही और बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की गई। श्रीनगर स्थित पारिवारिक न्यायालय ने अभिरक्षा पिता को सौंप दी, लेकिन हाईकोर्ट ने उस निर्णय को पलट दिया और कस्टडी मां को वापस सौंप दी। पीठ ने कहा कि जब बच्चों से खासतौर पर पूछा गया कि कतर में उनकी देखभाल कौन करेगा, तो बड़े बच्चे ने कहा कि उनके पिता की उपस्थिति ही पर्याप्त होगी और उनकी देखभाल के लिए कोई न कोई अवश्य ही उपलब्ध होगा। दोनों बच्चे अपनी मां के बिना रहने की संभावना से सहज प्रतीत हुए। छोटा बच्चा बार-बार अपने पिता के साथ जाने की इच्छा जताता रहा और बातचीत के दौरान भी परेशान था। पीठ ने यह भी देखा कि दोनों बच्चे केवल अंग्रेजी बोलते हैं और स्थानीय बच्चों से बातचीत करने में उन्हें कठिनाई होती है। हाईकोर्ट ने विवादित आदेश पारित करते समय इन सब पहलुओं को अनदेखा कर दिया। हालांकि, ये पहलू स्वयं हिरासत निर्धारण का एकमात्र कारण नहीं हो सकते हैं, फिर भी ये जरुरी और प्रासंगिक कारक हैं, और इनका सामूहिक प्रभाव कम से कम हिरासत व्यवस्था निर्धारित करने के लिए प्रासंगिक था। ऐसे में पिता की अपील को स्वीकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि हालांकि, बच्चे का कल्याण सर्वोपरि है, यह कस्टडी तय करने में इकलौता फैक्टर नहीं है। माता-पिता का आचरण, शैक्षिक स्थिरता, वित्तीय क्षमता, जीवन परिस्थितियां और मौजूदा अदालती आदेश सभी प्रासंगिक विचारणीय बिंदु हैं। पीठ ने पाया कि हाईकोर्ट प्रमुख घटनाक्रमों को ध्यान में रखने में विफल रहा। इसके बाद पीठ ने 8 सितंबर, 2025 के विवादित फैसले को रद्द कर दिया और मामले को कानून के अनुसार नए सिरे से निर्णय के लिए हाईकोर्ट को वापस भेज दिया। सिराज/ईएमएस 07फरवरी26 --------------------------------