पूंजीवादी देश अमेरिका जो दुनिया के देशों को समृद्धि और लोकतंत्र का पाठ पढ़ाता है वह अपने ही नागरिकों को दो टाइम का भोजन नहीं दे पा रहा है। अमेरिका का मध्यम वर्ग गरीब हो रहा है। सारी दुनिया में अमेरिका की जो तस्वीर दिखाई जाती है, ठीक उसके विपरीत हालिया सर्वे मे एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जिसने अमेरिका की कलई खोल कर रख दी है। आमतौर पर चमकदार इमारतों, शेयर बाज़ार और वैश्विक ताक़त की आड़ में अमेरिका अपनी वास्तविकता को छिपा देता है। सर्वे के अनुसार अमेरिका की करीब 74 प्रतिशत आबादी रोज़ी-रोटी के गंभीर संकट से जूझ रही है। यह संकट केवल गरीबों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि मिडिल क्लास और युवा वर्ग पर इसकी सबसे बड़ी मार पड़ी है। अमेरिका में हालात ये हैं, लोग बिजली, गैस, पानी जैसी बुनियादी जरूरत के मासिक बिल तक अदा नहीं कर पा रहे हैं। किराना, किराया और स्वास्थ्य खर्च लगातार बढ़ते जा रहे हैं। सर्वे के अनुसार 10 में से 9 अमेरिकी मानते हैं, पूरा अमेरिका “कॉस्ट ऑफ लिविंग क्राइसिस” में फंस गया है। सर्वे में 10 में से 8 लोगों ने माना है, पिछले एक साल में महंगाई तेजी के साथ बढ़ी है। जिसके कारण उनका नियमित जीवन बुरी तरह से प्रभावित हुआ है। पिछले 1 साल में जिस तरह से सरकार की नीतियां हैं, उसने आम आदमी का जीवन दूभर कर दिया है। सबसे चिंताजनक स्थिति अमेरिका मे युवाओं की है। महंगाई और बेरोजगारी के चलते युवा वर्ग में गुस्सा, असंतोष और निराशा तेज़ी से बढ़ती जा रही है। अमेरिका का मध्यम वर्ग टैक्स रिफंड से जो राशि मिलती थी उसका उपयोग छुट्टियों, मनोरंजन या ख़रीदारी के लिए करता था। अब टैक्स रिफंड से जो राशि मिलती है, उसका उपयोग पेट भरने और कर्ज़ चुकाने के लिए करना पड़ रहा है। सर्वे के अनुसार 73 प्रतिशत लोगों ने माना है, टैक्स रिफंड अब जीवन यापन के लिए ज़्यादा ज़रूरी हो गया है। 60 प्रतिशत लोगों ने रिफंड जल्दी देने की बात कही है। टैक्स रिफंड में देरी होने से खर्च चलाना मुश्किल हो जाता है। जेन-जी के लिए यह संकट और भी गहरा है। करीब 74 प्रतिशत युवा रिफंड नहीं मिलने पर आपात ज़रूरतें भी पूरा नहीं कर पा रहे हैं। अमेरिका के इस आर्थिक दबाव का सीधा असर सभी वर्गों पर देखने को मिल रहा है। अमेरिका से आंतरिक पलायन शुरू हो गया है। लोग एक शहर से दूसरे शहर, एक राज्य से दूसरे राज्य यहां तक कि यूरोपीय देशों में भाग रहे हैं। जहां वह वर्षों से रह रहे थे, वहां अब उनका गुज़ारा संभव नहीं हो पा रहा। सर्वे बताता है कि जेन-जी के लगभग 50 प्रतिशत युवा तथा कुल आबादी के 38 प्रतिशत अमेरिकी नागरिक आर्थिक कारणों से ठिकाना बदल चुके हैं। यह पलायन की स्थिति उन्हें जड़ों से काटने की प्रक्रिया मानी जा रही है। विडंबना यह है, जिन राज्यों को “अफोर्डेबल अमेरिका” कहा जाता है, उनमे मिसिसिपी, अलबामा और ओक्लाहोमा के 60 प्रतिशत लोग मानते हैं। वह किसी तरह से अपना खर्च चला पा रहे हैं। अमेरिका के सबसे सस्ते राज्यों की बड़ी आबादी आर्थिक संकट से जूझ रही है। यह स्थिति इस बात का सूचक है कि अमेरिका गहरे आर्थिक संकट में फंस गया है। पिछले एक साल में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा जिस तरह के निर्णय लिए जा रहे हैं, उसके बाद अमेरिका में बदहाली बढ़ती जा रही है। इसका असर सामाजिक स्तर पर बड़े पैमाने पर दिखने लगा है। युवाओं को अपना भविष्य अंधकार में दिख रहा है। इससे उनमें गुस्सा, नशा और सामाजिक तनाव बढ़ रहा है। अमेरिका में युवाओं की बहुत बड़ी संख्या अब अपराध की ओर भी जाती हुई दिख रही है। यह वही अमेरिका है, जहां सड़कों पर समृद्धि दिखती है। पूंजीवादियों के ऐशो आराम और अय्याशी को देखकर लगता है, अमेरिका बहुत धनवान है। अमेरिका में रहने वाले लोग बहुत प्रसन्न हैं, लेकिन अमेरिका की स्थिति ठीक इसके विपरीत है। नागरिकों के मन में असुरक्षा और भय पनप रहा है। अमेरिका एक ऐसे मोड़ पर आकर खड़ा हो गया है, जहां उसकी चमकदार छवि और ज़मीनी हकीकत के बीच की खाई गहरी होती जा रही है। अमेरिका में 74 प्रतिशत आबादी के सामने रोज़ी-रोटी का संकट होना अमेरिका के लिए गंभीर चेतावनी है। अमेरिका खुद को दुनिया का नेतृत्वकर्ता मानता है, लेकिन अमेरिका लगातार कर्ज के संकट में फंसता चला जा रहा है। सारी दुनिया में दादागिरी करने के चक्कर में लगातार अपने ही बनाए गए मकड जाल में फंसता जा रहा है। जिसके कारण अब अमेरिका को हर तरफ से चुनौती मिल रही है। यह अमेरिका के उस आर्थिक मॉडल की कहानी है। जो अपने फायदे के लिए किसी भी स्तर तक जाकर अपनी दादागिरी कायम रखना चाहता है। लेकिन अब यही दादागिरी अमेरिका के अस्तित्व के लिए संकट बन गया है। गलत नीतियों के कारण जिस तरह से सोवियत रूस का विघटन हुआ था लगभग वही स्थिति अब अमेरिका की होती हुई दिख रही है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जिस तरह से गरीबों और मध्यम वर्ग को उनके हाल पर छोड़ दिया है। जिस तरह से अमेरिका में अपराध बढ़ रहे हैं। अमेरिका की सरकार पर बढ़ता कर्ज अब अमेरिका के ऊपर भारी पड़ने लगा है। रही सही कसर डॉलर का जो वैश्विक अस्तित्व था अब उसे चुनौती मिल रही है। जिसके कारण आने वाले समय में अमेरिका विघटन की ओर बढ़ रहा है। अमेरिकी पूंजीवादी व्यवस्था को वैश्विक चुनौती मिलना शुरू हो गई है। विश्व में अमेरिका अलग-थलग पड़ता चला जा रहा है। अमेरिका में जिस तरह की स्थितियां बन गई हैं। उससे पूंजीवाद के खिलाफ आंतरिक विद्रोह की संभावना बढ़ती चली जा रही है। अमेरिका का यह संकट सारी दुनिया के देशों को एक सबक के रूप में देखना होगा। वैश्विक व्यापार संधि लागू होने के बाद जिस तरह से कर्ज की अर्थव्यवस्था के सहारे दुनिया के देशों ने चलना शुरू किया था, अब कर्ज की जगह बचत ही एकमात्र सहारा होगा। यह सबक तो लिया ही जा सकता है। ईएमएस / 10 फरवरी 26