अंतर्राष्ट्रीय
11-Feb-2026
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वॉशिंगटन (ईएमएस)। धरती से बाहर मानव प्रजनन का मुद्दा अब केवल सिद्धांत नहीं, बल्कि एक वास्तविक और गंभीर चुनौती बनकर उभर रहा है। असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी (एआरटी) जैसे ऑटोमेटेड आईवीएफ और क्रायोप्रिज़र्वेशन पहले से कहीं अधिक उन्नत और सुलभ हो चुकी हैं। यह स्थिति इस सवाल को और भी अहम बनाती है कि क्या महिलाएं अंतरिक्ष में सुरक्षित रूप से गर्भधारण या बच्चे को जन्म दे सकती हैं? इंटरनेशनल आईवीएफ इनिशिएटिव इंक के क्लिनिकल एम्ब्रियोलॉजिस्ट गाइल्स पामर के अनुसार, 1969 की चंद्रमा लैंडिंग और आईवीएफ तकनीक में आए क्रांतिकारी बदलाव अब एक साझा दिशा की ओर बढ़ते दिख रहे हैं। लेकिन अंतरिक्ष यात्रा से जुड़े प्रजनन जोखिमों—जैसे कॉस्मिक रेडिएशन, सूक्ष्म गुरुत्वाकर्षण और अनियोजित गर्भधारण के लिए अभी तक कोई इंडस्ट्री-ग्रेड दिशानिर्देश मौजूद नहीं हैं। यह नई रिपोर्ट प्रजनन स्वास्थ्य, एयरोस्पेस मेडिसिन और बायोएथिक्स के नौ विशेषज्ञों ने मिलकर तैयार किया। इसका उद्देश्य अंतरिक्ष में बच्चे पैदा करने को बढ़ावा देना नहीं, बल्कि उन वैज्ञानिक और नीतिगत खामियों को उजागर करना है जिन्हें अनदेखा किया गया तो भविष्य में गंभीर परिणाम हो सकते हैं। अंतरिक्ष प्रजनन के लिए बेहद प्रतिकूल वातावरण प्रदान करता है। माइक्रोग्रैविटी मासिक चक्र को प्रभावित कर सकती है, जबकि कॉस्मिक रेडिएशन कोशिकाओं में स्थायी क्षति और कैंसर के खतरे को बढ़ा देता है। जानवरों पर किए गए प्रयोग बताते हैं कि अंतरिक्ष का प्रभाव महिला प्रजनन क्षमता के लिए हानिकारक हो सकता है, लेकिन मानव शरीर पर लंबी अवधि के प्रभावों को लेकर बेहद सीमित आंकड़े उपलब्ध हैं खासकर पुरुष प्रजनन पर। स्टडी इसे “ज्ञान में सबसे बड़ा अंतर” बताती है। हालांकि स्पेस शटल के ज़माने में महिला अंतरिक्ष यात्रियों की गर्भधारण दर धरती के समान पाई गई, लेकिन आईएसएस और भविष्य के मंगल मिशनों की अवधि देखते हुए नए शोध और प्रोटोकॉल आवश्यक हो गए हैं। उन्नत एआरटी तकनीकें अंतरिक्ष की परिस्थितियों में उपयोगी साबित हो सकती हैं। अंडाणु और शुक्राणु फ्रीजिंग, एम्ब्रियो कल्चर और जेनेटिक स्क्रीनिंग जैसी प्रक्रियाएं अब ऑटोमेटेड और पोर्टेबल हो चुकी हैं, जो स्पेस मिशन की सीमाओं के अनुरूप हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि ये तकनीकें चरम परिस्थितियों में भी सफल रहती हैं। यही वह कारण है कि कक्षा में आईवीएफ भविष्य में “संभावित” माना जा रहा है। सबसे बड़ी चुनौती नीति और नैतिकता की है। अंतरिक्ष में अनियोजित गर्भधारण, रेडिएशन-जनित बांझपन, जेनेटिक स्क्रीनिंग की नैतिकता और मेडिकल जानकारी साझा करने की प्रक्रिया इन सभी पर कोई स्पष्ट नियम मौजूद नहीं हैं। स्टडी चेतावनी देती है कि यदि नीतियां पीछे रह गईं तो “गवर्नेंस डिनाइड” की स्थिति पैदा हो सकती है, यानी बिना नियमों के नई प्रथाएं स्वतः लागू हो जाएंगी। सुदामा/ईएमएस 11 फरवरी 2026