भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत उसका संविधान है, जिसने समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व के आदर्शों को राष्ट्र जीवन का आधार बनाया। बावजूद इसके समय-समय पर जाति-संप्रदाय और धर्म के नाम पर भेदभाव किए जाने और हिंसा एवं मावलिंचिंग जैसी कष्टप्रद घटनाएं जब सामने आती हैं तो बेहद अफसोस होता है। ऐसी घटनाएं यह संकेत देती हैं कि संवैधानिक मूल्यों और सामाजिक व्यवहार के बीच अब भी एक गहरी खाई मौजूद है। इस खाई को पाटने की बजाय और चौड़ी करने का कुत्सित कार्य गंदी राजनीति करने वाले तथाकथित नेता करते देखे जाते हैं। हर चुनाव से पहले इस पर चर्चा होती है और बदस्तूर घटनाएं भी होती हैं, इसलिए सभी कटघरे में खड़े होते हैं, फिर चाहे वह सत्ता पक्ष हो या विपक्ष। बहरहाल राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे द्वारा उठाया गया जातिगत भेदभाव का मुद्दा इसी खाई की ओर ध्यान आकर्षित करता है। इस संदर्भ में विपक्ष की चिंता न केवल उचित है, बल्कि लोकतांत्रिक विमर्श का आवश्यक हिस्सा भी है। ओडिशा के एक आंगनवाड़ी केंद्र में दलित महिला द्वारा भोजन बनाए जाने के कारण बच्चों के बहिष्कार की घटना केवल एक स्थानीय विवाद नहीं मानी जा सकती। यह उस मानसिकता का प्रतीक है, जो आधुनिक भारत के विकास और प्रगति के दावों को चुनौती देती है। आंगनवाड़ी केंद्र देश के सबसे संवेदनशील सामाजिक संस्थानों में से हैं, जहां बच्चों के पोषण, स्वास्थ्य और प्रारंभिक शिक्षा की नींव रखी जाती है। यदि वहीं जातिगत पूर्वाग्रह के आधार पर बहिष्कार जैसी स्थिति उत्पन्न होती है, तो यह न केवल एक कर्मचारी का अपमान है, बल्कि उन बच्चों के अधिकारों का भी हनन है, जिन्हें समान अवसर और पोषण मिलना चाहिए। यहां यह नहीं भूलना चाहिए कि संविधान का अनुच्छेद 14 सभी को कानून के समक्ष समानता का अधिकार देता है। अनुच्छेद 15 धर्म, जाति, लिंग आदि के आधार पर भेदभाव को निषिद्ध करता है, जबकि अनुच्छेद 17 अस्पृश्यता के उन्मूलन की स्पष्ट घोषणा करता है। इसके अतिरिक्त अनुच्छेद 21(क) शिक्षा के अधिकार को सुनिश्चित करता है और अनुच्छेद 47 राज्य को पोषण स्तर और जनस्वास्थ्य सुधारने की जिम्मेदारी सौंपता है। यदि जातिगत सोच के कारण पोषण कार्यक्रमों का बहिष्कार होता है, तो यह इन संवैधानिक प्रावधानों की भावना के विपरीत है। अत: ऐसे तमाम मामलों और घटित हुईं घटनाओं की जितनी निंदा की जाए कम होगी। राज्यसभा में कांग्रेस पार्टी अध्यक्ष खड़गे ने इस संबंध में जिन अन्य घटनाओं का उल्लेख किया उनमें मध्य प्रदेश में आदिवासी मजदूर के साथ अमानवीय व्यवहार, गुजरात में दलित कर्मचारी की आत्महत्या और चंडीगढ़ में संस्थागत भेदभाव जैसी घटनाएं भी शामिल हैं। ये मामले दर्शाते हैं कि समस्या केवल सामाजिक स्तर तक सीमित नहीं है। यदि संस्थागत ढांचे में भी पूर्वाग्रह मौजूद हैं, तो यह स्थिति और अधिक गंभीर हो जाती है। अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम जैसे कठोर कानूनों का अस्तित्व तभी सार्थक है, जब उनका प्रभावी और निष्पक्ष क्रियान्वयन हो। यह भी सच है कि जातिगत भेदभाव का मुद्दा अक्सर राजनीतिक बहस का हिस्सा बन जाता है। सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप होते हैं, जिससे मूल समस्या कभी-कभी राजनीतिक शोर में दब जाती है। किंतु इसका अर्थ यह नहीं कि मुद्दे की गंभीरता कम हो जाती है। लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका केवल आलोचना करना नहीं, बल्कि सरकार और समाज को आईना दिखाना भी है। यदि विपक्ष सामाजिक न्याय के प्रश्न को उठाता है, तो उसे केवल राजनीतिक चश्मे से देखने के बजाय व्यापक सामाजिक संदर्भ में समझा जाना चाहिए। सरकार की जिम्मेदारी बनती है कि वह ऐसी घटनाओं को अलग-थलग घटनाएं कहकर टालने के बजाय उनकी जड़ तक पहुंचे। त्वरित और निष्पक्ष जांच, दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई और पीड़ितों की सुरक्षा सुनिश्चित करना आवश्यक है। साथ ही, सामाजिक जागरूकता अभियान चलाकर यह संदेश देना भी उतना ही जरूरी है कि जातिगत भेदभाव न केवल अवैध है, बल्कि नैतिक रूप से भी अस्वीकार्य है। विशेष रूप से आंगनवाड़ी, विद्यालय और अन्य शैक्षणिक संस्थानों में समानता और सम्मान के मूल्यों को व्यवहार में उतारने की जरूरत है। सामाजिक न्याय केवल विधायी प्रावधानों से स्थापित नहीं होता; वह समाज की मानसिकता में परिवर्तन से आता है। जब तक समाज के हर वर्ग में यह भावना विकसित नहीं होगी कि सम्मान और अधिकार जन्म से नहीं, बल्कि अच्छे मानव होने के नाते मिलते हैं, तब तक कठोर कानूनों की आवश्यकता बनी रहेगी। बच्चों के सामने यदि समानता का व्यवहार प्रस्तुत किया जाएगा, तभी वे भविष्य में भेदभाव से मुक्त समाज का निर्माण कर सकेंगे। ऐसे में जातिगत ही नहीं बल्कि किसी भी प्रकार का भेदभाव जो समाज और समुदाय को तोड़ने का काम करता है वाला प्रश्न किसी एक दल या विचारधारा का नहीं, बल्कि भारतीय समाज की आत्मा का प्रश्न है। विपक्ष की चिंता इसलिए वाजिब है क्योंकि वह संविधान में निहित उस मूल भावना की याद दिलाती है, जिसे हम अक्सर भाषणों में दोहराते हैं पर व्यवहार में भूल जाते हैं। आवश्यकता इस बात की है कि सामाजिक न्याय को राजनीतिक नारे से आगे बढ़ाकर राष्ट्रीय संकल्प बनाया जाए। तभी हम सही मायने में उस भारत की ओर बढ़ सकेंगे, जिसका सपना आाजादी के दीवानों और संविधान निर्माताओं ने देखा था। ईएमएस / 12 फरवरी 26