बांग्लादेश आज अपने इतिहास के एक अत्यंत संवेदनशील मोड़ पर खड़ा है। तेरहवें आम चुनाव के लिए हो रहा मतदान केवल सत्ता परिवर्तन की प्रक्रिया नहीं है बल्कि यह उस दिशा का निर्धारण भी है जिस ओर यह दक्षिण एशियाई राष्ट्र आगे बढ़ेगा। पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के देश छोड़ने और भारत में शरण लेने के बाद यह पहला राष्ट्रीय चुनाव है। ऐसे समय में जब राजनीतिक परिदृश्य अस्थिर है और समाज में अविश्वास गहराया हुआ है तब यह चुनाव लोकतंत्र की परीक्षा भी है और सामाजिक सौहार्द की भी। देश के लगभग बारह करोड़ अस्सी लाख मतदाता आज अपने मताधिकार का प्रयोग कर रहे हैं। मतदान के लिए सफेद मतपत्र नई सरकार के चयन हेतु है जबकि पिंक मतपत्र के माध्यम से जुलाई नेशनल चार्टर नामक संवैधानिक संशोधन पर भी जनमत लिया जा रहा है। इस दोहरे मतदान ने चुनाव को और अधिक निर्णायक बना दिया है। एक ओर सरकार चुनने की प्रक्रिया है तो दूसरी ओर संविधान की आत्मा में परिवर्तन का प्रस्ताव है। ऐसे में यह चुनाव केवल राजनीतिक दलों के बीच प्रतिस्पर्धा नहीं बल्कि राष्ट्र की विचारधारा की दिशा तय करने वाला जनमत संग्रह बन गया है। चुनावी माहौल में डर और असुरक्षा की भावना स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही है। विशेषकर हिंदू समुदाय के बीच भविष्य को लेकर गहरी चिंता है। पिछले कुछ महीनों में हुई घटनाओं ने इस आशंका को और बढ़ाया है। विभिन्न जिलों में मंदिरों पर हमले हुए हैं दुकानों में आगजनी हुई है और समुदाय विशेष के लोगों को निशाना बनाए जाने की खबरें सामने आई हैं। रंगपुर में सुसेन चंद्र सरकार की हत्या ने पूरे क्षेत्र को झकझोर दिया। खुलना में मंदिर में तोड़फोड़ की गई। चटगांव में दीपक साहा की दुकान को लूटा गया और आग के हवाले कर दिया गया। लालमोनिरहाट में एक शिक्षक के परिवार पर हमला हुआ। बरिसाल में गौरव दास को चुनावी रैली के बाद चाकू मारा गया। इन घटनाओं ने चुनाव को केवल राजनीतिक नहीं बल्कि सामाजिक सुरक्षा का मुद्दा बना दिया है। राजनीतिक परिदृश्य में भी बड़ा बदलाव आया है। लंबे समय तक सत्ता में रही अवामी लीग इस चुनाव में मुख्य दावेदार के रूप में नहीं दिख रही। मैदान में मुख्य रूप से बांग्लादेश राष्ट्रवादी पार्टी और जमात ए इस्लामी के नेतृत्व वाला गठबंधन है। बीएनपी का नेतृत्व पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया के बेटे तारिक रहमान के हाथों में है। अधिकांश सर्वेक्षणों में बीएनपी को बढ़त मिलती दिखाई दे रही है। दूसरी ओर जमात ए इस्लामी एक व्यापक गठबंधन के साथ चुनाव मैदान में है जिसमें नवगठित नेशनल सिटिजन पार्टी भी शामिल है। इस गठबंधन की वैचारिक दिशा को लेकर समाज में बहस तेज है क्योंकि जमात लंबे समय तक प्रतिबंधित रही और उस पर कट्टरपंथी एजेंडा चलाने के आरोप लगते रहे हैं। हिंदू समुदाय के कई लोग खुद को राजनीतिक रूप से असहाय महसूस कर रहे हैं। उनका मानना है कि मुख्य दलों में कोई भी स्पष्ट रूप से उदारवादी या मध्यममार्गी दृष्टिकोण लेकर सामने नहीं आया है। कुछ मतदाता बीएनपी को अपेक्षाकृत सुरक्षित विकल्प मान रहे हैं जबकि जमात के प्रभाव को लेकर आशंका व्यक्त कर रहे हैं। ढाका के एक मतदाता ने कहा कि वे ऐसे दल को वोट देंगे जो देश को धार्मिक कट्टरता की ओर न ले जाए। यह भावना केवल एक व्यक्ति की नहीं बल्कि उस वर्ग की है जो स्थिरता और समान अधिकारों की गारंटी चाहता है। चुनाव आयोग ने सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए हैं। लगभग डेढ़ लाख से अधिक पुलिस और सुरक्षा कर्मियों को तैनात किया गया है। करीब एक लाख सैनिक भी विभिन्न क्षेत्रों में तैनात हैं। देश के आधे से अधिक मतदान केंद्रों को संवेदनशील घोषित किया गया है। अधिकांश निर्वाचन क्षेत्रों में सुरक्षा कैमरे लगाए गए हैं। एक क्षेत्र में उम्मीदवार की मृत्यु के कारण मतदान स्थगित कर दिया गया है। इन व्यवस्थाओं से स्पष्ट है कि प्रशासन संभावित हिंसा को लेकर सतर्क है। चुनाव प्रचार के दौरान हुई हिंसक घटनाएं स्थिति की गंभीरता को दर्शाती हैं। दिसंबर से फरवरी के बीच राजनीतिक झड़पों में कई लोगों की जान गई और सैकड़ों घायल हुए। मानवाधिकार संगठनों ने पिछले डेढ़ वर्ष में राजनीतिक हिंसा में बड़ी संख्या में लोगों के मारे जाने और हजारों के घायल होने की जानकारी दी है। यह आंकड़े लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर गहरे सवाल खड़े करते हैं। यदि चुनाव हिंसा की छाया में होगा तो उसकी वैधता पर भी प्रश्न उठेंगे। इस बार का चुनाव एक वैचारिक संघर्ष भी है। क्या बांग्लादेश अपने संविधान की मूल भावना धर्मनिरपेक्षता और बहुलतावाद को बनाए रखेगा या धार्मिक पहचान को राजनीतिक शक्ति के रूप में स्वीकार करेगा। पिंक मतपत्र के माध्यम से प्रस्तावित संवैधानिक संशोधन इसी दिशा का संकेत देगा। यदि मतदाता बड़े पैमाने पर संशोधन का समर्थन करते हैं तो देश की राजनीतिक संरचना में दीर्घकालिक परिवर्तन संभव है। यदि वे इसे अस्वीकार करते हैं तो यह वर्तमान व्यवस्था पर भरोसे का संकेत होगा। अंतरराष्ट्रीय समुदाय भी इस चुनाव पर नजर रखे हुए है। दक्षिण एशिया में स्थिरता के लिए बांग्लादेश की भूमिका महत्वपूर्ण है। भारत के साथ उसके संबंध रणनीतिक और आर्थिक दृष्टि से अहम हैं। शेख हसीना के भारत में रहने के कारण यह चुनाव द्विपक्षीय संबंधों के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण हो गया है। नई सरकार की नीतियां क्षेत्रीय संतुलन को प्रभावित कर सकती हैं। आम मतदाता के लिए यह चुनाव केवल राजनीतिक बहस का विषय नहीं बल्कि रोजमर्रा के जीवन से जुड़ा प्रश्न है। आर्थिक चुनौतियां बेरोजगारी महंगाई और सामाजिक असुरक्षा लोगों की प्राथमिक चिंताएं हैं। यदि नई सरकार इन मुद्दों पर ठोस कदम उठाने में विफल रहती है तो असंतोष और बढ़ सकता है। इसलिए मतदाता केवल विचारधारा नहीं बल्कि शासन क्षमता को भी परख रहे हैं। बांग्लादेश ने अपने स्वतंत्रता संघर्ष से लेकर अब तक कई उतार चढ़ाव देखे हैं। सैन्य शासन से लोकतंत्र की ओर वापसी और फिर राजनीतिक ध्रुवीकरण का दौर देश की यात्रा का हिस्सा रहा है। आज का चुनाव उसी यात्रा का नया अध्याय है। यह तय करेगा कि देश समावेशी लोकतंत्र की राह पर आगे बढ़ेगा या वैचारिक टकराव की ओर जाएगा। मतदान के परिणाम चाहे जो भी हों एक बात स्पष्ट है कि बांग्लादेश के सामने सबसे बड़ी चुनौती सामाजिक विश्वास की पुनर्स्थापना है। यदि राजनीतिक दल चुनाव के बाद भी संवाद और सहमति की राजनीति अपनाते हैं तो लोकतंत्र मजबूत होगा। यदि प्रतिशोध और विभाजन की राजनीति हावी रही तो अस्थिरता बढ़ सकती है। इसलिए यह चुनाव केवल सरकार बदलने का अवसर नहीं बल्कि राष्ट्रीय आत्ममंथन का क्षण है। लोकतंत्र की असली शक्ति मतपेटी में नहीं बल्कि मतदाता के विश्वास में निहित होती है। बांग्लादेश के नागरिक आज उसी विश्वास की परीक्षा दे रहे हैं। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि जनता ने किस दिशा को चुना है। परंतु यह निश्चित है कि यह चुनाव इतिहास में उस मोड़ के रूप में दर्ज होगा जब राष्ट्र ने स्वयं से पूछा कि वह कैसा भविष्य चाहता है? (L 103 जलवंत टाऊनशिप पूणा बॉम्बे मार्केट रोड, नियर नन्दालय हवेली सूरत मो 99749 40324 वरिष्ठ पत्रकार साहित्यकार स्तम्भकार) ईएमएस / 12 फरवरी 26