लेख
15-Feb-2026
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- 300 सरकारी स्कूल भवनों की मरम्मत जनभागीदारी से - इस पहल की जरूरत पूरे देश में पुलिस का कोई जवान दीवार पर पुताई कर रहा है तो हाॅक फोर्स के किसी जवान के हाथ में प्लास्टर करने वाली करनी है। जो अफसर नक्सलियों की घेराबंदी करने और काउंटर फायर का हुक्म देते थे वो अपने उन्हीं जवानों को पेयजल लाईन दुरुस्त करने, मिस्त्री से ठीक से काम करवाने की समझाइश देते दिखते हैं। जी हां.........ये नजारा मध्यप्रदेश के बालाघाट जिले के नक्सल प्रभावित रहे गांवों के सरकारी स्कूलों का है। उकवा, बैहर, लांजी, किरनापुर आदि क्षेत्रों के नक्सलप्रभावित रहे गांवों में स्थित सरकारी स्कूलों की हालत बद से बदतर हो गई है। नक्सलियों के भय से यहां ना तो निर्माण कार्य हो रहे थे और ना ही पुराने स्कूलों की मरम्मत हो पा रही थी। बड़ी मुश्किल से शिक्षक पहुंचते थे और शिक्षक आ भी गए थे बच्चे नहीं आते थे। मध्यप्रदेश के बालाघाट जिले के माथे से नक्सलियों का कलंक मिटते ही पुलिस कप्तान आदित्य मिश्रा ने सुदूर गांवों के सरकारी स्कूलों के मरम्मत का बीड़ा उठाया है। उन्होंने इसके लिए जिले के उद्योगपति, डाॅक्टर, शिक्षाविद, बिल्डर्स और अन्य प्रतिष्ठित लोगों का सहयोग लिया है। ऐसे लोगोें ने अपनी आर्थिक क्षमता के अनुसार स्कूलों को गोद लिया है। यानि स्कूल में आने वाले खर्च गोद लेने वाला उठाएगा। बताया जा रहा है कि एक स्कूल की मरम्मत के लिए करीब सवा लाख रुपये का खर्च आ रहा है। निगरानी, देख रेख का काम पुलिस विभाग के अधिकारी कर रहे हैं। इस काम में पुलिस विभाग और हाॅक फोर्स के जवान भी श्रमदान कर रहे हैं। बालाघाट की इस पहल को यदि पूरे मध्यप्रदेश में अमलीजामा पहनाया जाए तो जर्जर स्कूल भवनों की हालत सुधर जाएगी। और ना सिर्फ मध्यप्रदेश बल्कि देश भर में इस पहल से शिक्षा के क्षेत्र में नई क्रांति आ सकती है। मध्य प्रदेश का बाालाघाट जिला कभी नक्सलियों की आरामगाह या पनाहगाह रहा है। इस जिले की सीामाएं छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र से लगती हैं। यही वजह है कि नक्सली जब भी सीमावर्ती राज्यों में कहीं किसी बड़ी घटना को अंजाम देते तो वो बालाघाट के जंगलों में आकर छिप जाते थे। वो यहां खुद को महफूज समझते थे। यहां छिपने और आराम करने के अलावा नक्सली बांस कूप, बांस डिपो, महाराष्ट्र सरकार की यात्री बस जलाने, निर्माण कार्य में लगे डम्पर जलाने,पुलिस जवानों पर गोली बारी करने, लैंड माईन बिछाकर विस्फोट करने, पुलिस मुखबिरी के शक में गांव वालों की हत्या करने सहित दर्जनों वारदातों को अंजाम दे चुके हैं। बालाघाट जिला तब राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आया था जब तत्कालीन वन एवं परिवहन मंत्री लिखीराम कावरे की उनके घर में नक्सलियों ने हत्या कर दी थी। उस वक्त मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह थे। नक्सल उन्मूलन के दौरान कई बार पुलिस जवानों और माओवादियों के बीच कई मर्तबा एनकाउंटर हुए। दर्जनों बार तो नक्सली घने जंगलों की आड़ लेकर भाग खड़े हुए। खैर साढ़े तीन दशक बाद बालाघाट जिला नक्सलमुक्त घोषित हो गया लेकिन नक्सलप्रभावित रहे सुदूर गांवों में विकास करना, जरूरी निर्माण कार्य कराना, बिजली-पानी-सड़क जैसी बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराना अभी भी चुनौती है। उम्मीद तो यही की जा रही है कि अब आदिवासी ग्रामीण अंचलों में तेजी से विकास कार्य होंगे। बालाघाट मध्य प्रदेश-छत्तीसगढ़-महाराष्ट्र की सीमाओं पर स्थित है। यहां नक्सलउन्मूलन के लिए नक्सल ऑपरेशनों के लिए एमपी पुलिस ने डीआरजी और हॉक फोर्स का गठन किया गया। हॉक फोर्स का मुख्यालय भोपाल से बालाघाट के कनकी में शिफ्ट किया गया। डीआरजी, हॉक फोर्स, सीआरपीएफ और कोबरा फोर्स की नक्सलियों के खात्मे में अहम भूमिका रही। दशकों से बालाघाट में जमे नक्सलियों पर नकेल लगाना इतना भी आसान नहीं था। अव्वल तो ये जिला घने जंगलों, पहाड़ों और दर्रों से घिरा हुआ है। दूसरा, इसकी सीमाएं छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र से लगती हैं। नक्सल उन्मूलन के लिए सुरक्षाबलों द्वारा एक साल में दो हजार से ज्यादा सर्चिंग ऑपरेशन चलाए गए। एमएमसी जोन में सबसे ज्यादा हैं। वहीं छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव और खैरागढ़ में ढाई सौ से ज्यादा और महाराष्ट्र के गोंदिया में डेढ़ दर्जन से ज्यादा ऑपरेशन चलाए गए। जब मध्यप्रदेश में सर्चिंग तेज होती तो नक्सली छत्तीसगढ़ या महाराष्ट्र के सीमावर्ती इलाकों में भाग जाते और जब वहां सर्चिंग तेज होती तो वो बालाघाट आ जाते। जब सुरक्षा बलों ने नक्सलियों को उनके ही क्षेत्र में घेर लिया तो उनके सामने सरेंडर करने या जान देने के अलावा कोई विकल्प ही नहीं बचा। जब नक्सली, पुलिस का गोली का शिकार बनने लगे तो आत्मसमर्पण करने का सिलसिला तेज हो गया। कभी बालाघाट तो कभी छग में नक्सली आत्मसमर्पण करने लगे। करीब साढ़े तीन दशकों तक बालाघाट जिले सहित सीमावर्ती जिलों में दहशत फैलाने वाले नक्सल संगठन का पूरी तरह खात्मा हो गया। दरअसल, भारत में नक्सलवाद के जड़ से खात्मे की डेडलाइन 31 मार्च 2025 है, जबकि मध्य प्रदेश ने नक्सल मुक्त होने का लक्ष्य 26 जनवरी 2026 था। निर्धारित समय से पहले ही 11 दिसंबर 2025 को एमएमसी जोन के अंतिम सक्रिय नक्सली दीपक उर्फ सुधाकर और रोहित उर्फ मंगलू ने बालाघाट में सरेंडर कर दिया। 56 वर्षीय दीपक बालाघाट के पालाघोंदी और 36 वर्षीय रोहित बीजापुर (छत्तीसगढ़) के फतेनार का रहने वाला है। इनके सरेंडर के बाद सीएम डॉ. मोहन यादव ने एमपी के नक्सल मुक्त होने की घोषणा की। यहां बता दें कि बालाघाट जिले में साल 1990 में नक्सलियों ने अपनी मौजूदगी दर्ज कराई थी। इसके बाद माओवादियों की दहशत बढ़ती गई। साल 1991 में नक्सलियों ने थाना बहेला क्षेत्रान्तर्गत सीतापाला में ब्लास्ट किया था इसमें 9 पुलिसकर्मी शहीद हो गए थे। बालाघाट जिले के सीतापाला थाना में नक्सलियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई थी। इसके बाद नक्सलवाद बालाघाट से मंडला और डिंडोरी तक फैल गया। मालूम हो कि नक्सल विरोधी अभियान में 38 पुलिसकर्मी शहीद हुए। 57 आम नागरिक भी जनशहीद हुए। इस दौरान 45 नक्सली मुठभेड़ में मारे गए और 28 हार्डकोर नक्सली गिरफ्तार किया गए। इस दौरान सुरक्षाबलों के जवानों और आम लोगों सहित 105 लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी। नक्सलविरोधी अभियान में हॉक फोर्स, सीआरपीएफ, कोबरा फोर्स, पुलिस जवान के दो हजार से अधिक जवानों ने मोर्चा संभाला। नक्सलउन्मूलन में सबसे बड़ा योगदान हाॅक फोर्स का रहा। पुलिस अधीक्षक आदित्य मिश्रा के ही ज़हन में ये बात आई कि बालाघाट जिला नक्सलमुक्त तो हो गया लेकिन अभी विकास की चुनौती बाकी है। पुलिस कप्तान आदित्य मिश्रा 2018 बैच के आईपीएस हैं। उन्हें दो बार वीरता पदक से सम्मानित किया जा चुका है। इसके अलावा वे तब चर्चा में आए थे जब उन्होंने कविता सुनाई थी। सितंबर 2020 में पीएम नरेंद्र मोदी ने आईपीएस अधिकारियों के एक कार्यक्रम में ऑनलाइन शिरकत की थी। पीएम मोदी ने आईपीएस अधिकारियों से चर्चा की थी। इस दौरान आदित्य मिश्रा इंदौर में तैनात थे। उन्होंने वर्चुअल मीट में पीएम मोदी के सामने एक कविता सुनाई थी। इस कविता का शीर्षक था मैं खाकी हूं। बालाघाट जिले में बतौर अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक (बैहर) और एएसपी (नक्सल ऑपरेशन) रह चुके हैं। एएसपी रहते हुए आदित्य मिश्रा ने बालाघाट के बहुचर्चित डबल मनी मामले में खासी सक्रियता दिखाई थी। वे इंदौर में डीसीपी, राजगढ़ जिले में एसपी, इंदौर में पुलिस उपायुक्त पद पर भी रह चुके हैं। आइपीएस मिश्रा मप्र पुलिस के नक्सल विरोधी अभियान के तहत हॉक फोर्स के स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप (एसओजी) में रहे। मिश्रा ने देखा किनक्सलप्रभावित गांवों में ना तो बुनियादी सुविधाएं हैं और ना ही शिक्षा-स्वास्थ्य जैसी सहुलियत। इन क्षेत्रों के सरकारी स्कूलों के भवन इतने जर्जर हैं कि बच्चे यहां बैठ भी नहीं सकते। किसी भवन की छत टपक रही है तो कहीं दरवाजे ही नहीं है। इसके अलावा इन स्कूलों में शिक्षक भी नियमित नहीं पहुंचते थे। नक्सलियों की दहशत के कारण बच्चे जाते नहीं थे या उनके परिजन उन्हें स्कूल ही नहीं भेजते थे। मिश्रा, शिक्षा की अहमियत बखूबी जानते हैं लिहाजा उन्होंने ऐसे स्कूलों को चिन्हित किया। इसके बाद शहर के रसूखदार लोगों जैसे डॉक्टर, बिजनेसमैन, शिक्षाविद, बिल्डर्स, समाजसेवियों की मीटिंग ली। उन्होंने गुजारिश की कि वो ऐसे स्कूलों को गोद लें और उनकी मरम्मत की जिम्मेदारी उठाएं। एसपी की इस पहल का स्वागत करते हुए इन लोगों ने स्कूलों को गोद लिया। एक शाला भवन की मरम्मत में करीब सवा लाख का खर्च आ रहा है। इसके अलावा, इस काम में पुलिस विभाग, हाॅक फोर्स, सीआरपीएफ के अधिकारी और जवान भी मदद कर रहे हैं। ये अफसर और जवान मरम्मत कार्य की निगरानी करने, राॅ मटेरियल संबंधित शाला तक पहुंचाने का काम करते हैं। हाॅक फोर्स के जवान तो खुद ही स्कूल की पुताई, पलस्टर, दरवाजों की रिपेयरिंग, छत की रिपेयरिंग आदि का काम कर रहे हैं। इसके अलावा स्कूलों तक बच्चों को लाने के लिए गांव वालों से संवाद किया जा रहा है, शालाओं में सांस्कृतिक कार्यक्रम और अन्य आयोजन किए जा रहे हैं। बच्चों को पढ़ने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। यहां बता दें कि पुलिस कप्तान की इस पहल पर एक सोसायटी बनाई गई है जिसमें शहर के दानदाता, बिजनसमेन, समाजसेवी शामिल हैं। इस सोसायटी ने तीन सैकड़ा स्कूल भवनों की मरम्मत का बीड़़ा उठाया है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने हाल ही में पुलिस लाईन बालाघाट में 60 जवानों को आउट आफ टर्न प्रमोशन समारोह में “सीएम टू सोसायटी” सत्र के अंतर्गत विद्यान्जलि से जुड़े दानदाताओं एवं चेंजमेकरों से भेंट की थी। विद्यान्जलि पहल के अंतर्गत जिले के नक्स ल प्रभावित क्षेत्र के 300 शासकीय स्कूलों के कायाकल्पम का संकल्प लिया गया है, जिनमें से 100 स्कूलों का कार्य पूर्ण हो चुका है। यह पहल समाज, प्रशासन और पुलिस के संयुक्त प्रयासों से आगे बढ़ रही है और शिक्षा के क्षेत्र में ठोस बदलाव ला रही है। कार्यक्रम में विद्यान्जलि सोसायटी के पदाधिकारियों सहित सभी दानदाता एवं चेंजमेकर उपस्थित रहे। मुख्यमंत्री ने सभी से संवाद करते हुए उनके योगदान की सराहना की और इसे “जन-भागीदारी से जन-परिवर्तन” का आदर्श मॉडल बताया। इस अवसर पर मुख्यमंत्री डॉ. यादव द्वारा ‘विद्यान्जलि’ पहल पर आधारित पुस्तक का भी लोकार्पण किया गया। पुस्तक में समाज की सामूहिक शक्ति और शिक्षा के प्रति समर्पण की प्रेरक यात्रा को दर्शाया गया है। ये पहल बालाघाट जिले के लिए ही नहीं बल्कि पूरे प्रदेश और देश के लिए मिसाल है। जैसा बालाघाट में हो रहा है यदि ऐसा हर जिले में हो तो सारे सरकारी स्कूलों की हालत बदल जाएगी और फिर ग्रामीणों के हालात बदलने में देर नहीं लगेगी.....। मुस्ताअली बोहरा/15फरवरी2026