विश्व के दो सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश अमेरिका और भारत आज केवल राजनीतिक एवं व्यापारिक साझेदार नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों को नये तरीके से परिभाषित करने के केंद्र बन रहे हैं। इस कारण अमेरिका और भारत की संघीय लोकतांत्रिक एवं प्रशासकीय व्यवस्था को लेकर बड़े सवाल उठने लगे हैं। बदलते वैश्विक परिदृश्य में तकनीकी क्रांति, आर्थिक प्रतिस्पर्धा और सामाजिक विविधताओं के बीच इन दोनों देशों ने संविधान और लोकतंत्र की नई व्याख्या करने की शुरुआत कर दी है, जो शासक आधारित है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में सत्ता का विकेंद्रीकरण एवं जवाबदेही तय होती है। भारत में पिछले कई वर्षों से सत्ता का केंद्रीकरण होता जा रहा है। अमेरिका में भी दूसरी बार राष्ट्रपति बनने के बाद से डोनाल्ड ट्रंप जिस तरह से निर्णय ले रहे हैं, उससे भी शासन व्यवस्था में ट्रम्प का एकाधिकार अमेरिका में बढ़ता जा रहा है। अमेरिका के जो राज्य हैं, उनकी दूरी केंद्रीय सत्ता से बढ़ती चली जा रही है। नई व्याख्या परंपरागत मूल्यों को बनाए रखते हुए समयानुकूल बदलाव के लिए लोकतांत्रिक पद्धति एवं सत्ता का विकेंद्रीकरण पूर्व की तरह बना रहेगा, तभी लोकतांत्रिक व्यवस्थाएं मजबूत रहेंगी। भारत का संविधान विविधता में एकता का प्रतीक है। भारत में विभिन्न भाषा, धर्म, संस्कृति और परंपराओं की असंख्य धाराएँ संविधान एवं लोकतांत्रिक प्रक्रिया में समाहित हैं। वहीं अमेरिका का संविधान व्यक्तिगत स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की आज़ादी, मानव अधिकारों की रक्षा एवं संघीय व्यवस्था प्रदान करता है। दोनों देशों ने अपने-अपने ऐतिहासिक अनुभवों से लोकतंत्र को मजबूत किया था। अमेरिका ने स्वतंत्रता संग्राम और नागरिक अधिकार आंदोलनों से, वहीं भारत ने स्वतंत्रता आंदोलन और सामाजिक न्याय के लिए भारतीय संविधान तैयार किया था। भारतीय संविधान ने लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं और न्यायिक तंत्र को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। आज विश्व में लोकतांत्रिक मूल्यों को लेकर कई चुनौतियों का सामना अमेरिका और भारत दोनों को ही करना पड़ रहा है। चाहे वह, सत्ता के केंद्रीयकरण का मामला हो या फेक न्यूज़ का प्रसार हो। वैधानिक संस्थाओं पर सत्ता का बढ़ता दबाव लोकतंत्र और न्याय तंत्र दोनों को ही प्रभावित कर रहा है। मानव अधिकारों को लेकर वह स्वतंत्रता अब नहीं मिलती, जैसे कुछ समय पहले देखने को मिलती थी। ऐसे समय में भारत और अमेरिका में सत्ता पक्ष द्वारा लोकतंत्र को नए सिरे से परिभाषित किया जा रहा है। यह परिभाषा केवल चुनावी प्रक्रिया और सत्ता तक सीमित नहीं है। अमेरिका और भारत में शासन व्यवस्था की पारदर्शिता, जवाबदेही, डिजिटल अधिकारों और नागरिक अधिकारों को लेकर तनाव के दौर से गुजर रहा है। वर्तमान स्थिति को देखते हुए यह कहा जा रहा है, अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका मे जो निर्णय ले रहे हैं, उनमें वे अमेरिकन कानूनो को नजर अंदाज कर रहे हैं। राज्य और केंद्र के बीच में भी मतभेद बढ़ते चले जा रहे हैं। यही स्थिति भारत में भी देखने को मिल रही है। डिजिटल युग में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच संतुलन एक बड़ी चुनौती है। भारत और अमेरिका दोनों ने तकनीकी कंपनियों के नियमन, डेटा सुरक्षा और साइबर सुरक्षा के क्षेत्र में ट्रेड डील के माध्यम से नई पहल की है। इससे स्पष्ट है, वैश्विक व्यापार संधि के बाद जिस तरह के वैश्विक नियम और कानून बनाए गए थे उनसे हटकर अमेरिका अपने व्यापारिक समझौते करना चाहता है। भारत एवं अन्य देशों पर अमेरिका जो दबाव बना रहा है, उसके कारण वैश्विक स्तर पर अभी तक जो डॉलर की स्वीकार्यता थी, वैश्विक व्यापार में अमेरिका और डॉलर का जो वर्चस्व था, अब उसे चुनौती मिलना शुरू हो गई है। जिसके कारण संपूर्ण दुनिया के देशों में लोकतंत्र और तानाशाही व्यवस्था को लेकर चर्चा होने लगी है। लोकतंत्र अब केवल संसद, सरकार, कार्यपालिका और न्यायालय तक सीमित नहीं रहा। संविधान की भावना मानव अधिकार और लोकतांत्रिक व्यवस्था को डिजिटल तकनीकि के साथ जवाबदेही तय करना समय की मांग बन चुकी है। वर्तमान संदर्भ में सामाजिक न्याय और समान अवसर को लेकर लोकतंत्र की नई परिभाषा में बदलाव की जरूरत है। अमेरिका में नस्लीय समानता और भारत में सामाजिक भाषा एवं धार्मिक समावेश में संवैधानिक एवं लोकतांत्रिक अधिकार में सभी को समान अवसर और गरिमा सुनिश्चित करने कुछ बदलाव जरूरी हैं। पिछले कुछ वर्षों से सत्ता पाने के लिये अमेरिका और भारत में धार्मिक ध्रुवीकरण बढ़ता जा रहा है। उसके कारण लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं को अपने-अपने ढंग से ढालने के जो प्रयास हो रहे हैं, वह लोकतांत्रिक व्यवस्था एवं मानव अधिकारों को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचा रहे हैं। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत और अमेरिका की भूमिका महत्वपूर्ण है। इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में सहयोग, वैश्विक शांति, सामाजिक सोहार्द्र, धार्मिक और आर्थिक स्थिरता के प्रयास, लोकतंत्र की वैश्विक जिम्मेदारी का प्रतीक है। अमेरिका के खिलाफ वैश्विक स्तर पर जिस तरह का विरोध पनप रहा है। उसने कई तरह की चुनौतियां पैदा कर दी हैं। ट्रम्प ने धार्मिक धुव्रीकरण को बढ़ाकर सत्ता पर पकड़ मजबूत करने का प्रयास किया है। कुछ इसी तरह की स्थिति भारत में भी है। जिसके कारण दोनों ही लोकतांत्रिक देशों की चर्चा होने लगी है। अमेरिका और भारत का लोकतंत्र सारी दुनिया के लिए अभी तक एक मार्गदर्शक के रूप में काम करता था। पिछले कुछ वर्षों में मानव अधिकार, सरकार के निर्णय और न्यायपालिका की भूमिका सरकारी दबाव में होने से कई तरह की विसंगतियां सामने आने लगी हैं। अमेरिका और भारत में गरीबी और अमीरी के बीच में असमानता बढ़ रही है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा टैरिफ़-बार के जरिये अमेरिका का एकाधिकार बनाने की जो चेष्टा की जा रही है, उसके कारण वैश्विक तनाव बड़ी तेजी के साथ बढ़ रहा है। वैश्विक व्यापार संधि होने के बाद भी सभी देश विकल्प की तलाश कर रहे हैं। जिस तरह से प्रतिबंध और टैरिफ की राजनीति अमेरिका से शुरू हुई है, उसने लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं को कमजोर करने का काम किया है। पिछले कुछ वर्षों में अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की जो भूमिका पहिले थी, वह भी देखने को नहीं मिल रही है। ऐसी स्थिति में अमेरिका और भारत को वैश्विक शांति को बनाये रखने के लिए अपनी भूमिका पर विचार करना होगा। विशेष रूप से समाज में अमीरों और गरीबों के बीच में जो खाई बढ़ रही है। सारी दुनिया के देशों का कर्ज बढ़ा है। सारी दुनिया में पिछले 20 वर्षों में तेजी के साथ महंगाई बढ़ी है, रोजगार के अवसर कम होते जा रहे हैं। ऐसी स्थिति में अमीरी और गरीबी के बीच में संतुलन बनाए रखने तथा लोकतांत्रिक व्यवस्था एवं मानव अधिकारों की महत्वपूर्ण भूमिका अमेरिका और भारत जैसे देशों की है। जहां आज भी लोकतांत्रिक व्यवस्था अस्तित्व में है। ईएमएस / 15 फरवरी 26