15-Feb-2026
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ढाका,(ईएमएस)। बांग्लादेश में तारिक रहमान के नेतृत्व वाली बीएनपी (बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी) की ऐतिहासिक जीत ने दक्षिण एशिया के शक्ति संतुलन को एक नाजुक मोड़ पर ला दिया है। शेख हसीना के भारत-परस्त युग के अंत के बाद, अब दुनिया की निगाहें इस पर हैं कि क्या नया बांग्लादेश भारत का सच्चा दोस्त बना रहेगा या फिर वह पाकिस्तान और चीन के रणनीतिक प्रभाव में आकर भारत विरोधी रुख अपनाएगा। भारत की प्रैगमैटिक पहल और मधुर संकेत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 13 फरवरी 2026 को चुनावी नतीजों के तुरंत बाद तारिक रहमान को बधाई देकर कूटनीतिक परिपक्वता का परिचय दिया है। भारत ने स्पष्ट संदेश दिया है कि वह एक लोकतांत्रिक, प्रगतिशील और समावेशी बांग्लादेश का समर्थन करता है। भारत के लिए यह संबंध केवल पड़ोस की बात नहीं, बल्कि अस्तित्व से जुड़ा है। पूर्वोत्तर राज्यों की स्थिरता के लिए ढाका का सहयोग अनिवार्य है। वहीं 10 अरब डॉलर का व्यापार और कपड़ा उद्योग के लिए कच्चे कपास की आपूर्ति भारत से जुड़ी है। इतना ही नहीं चुनाव के बाद हिंदुओं और अन्य अल्पसंख्यकों पर हमले न हों, यह दिल्ली की प्राथमिकता है। 2. तारिक रहमान का रुख: बांग्लादेश फर्स्ट की नीति जबकि तारिक रहमान ने अब तक जो संकेत दिए हैं, वे उनकी पिछली भारत-विरोधी छवि के उलट काफी व्यावहारिक नजर आती हैं। उन्होंने मंचों से भारत के हितों के सम्मान की बात कही है। भारत के लिहाज से सबसे बड़ी राहत यह है कि कट्टरपंथी संगठन जमात-ए-इस्लामी इस बार सरकार का हिस्सा नहीं है। इससे पाकिस्तान के जरिए पूर्वोत्तर भारत में अशांति फैलाने की आशंका कम हुई है। रहमान जानते हैं कि देश को आर्थिक संकट से निकालने के लिए भारत के साथ व्यापारिक संतुलन और कनेक्टिविटी (परिवहन) के समझौतों को जारी रखना उनकी मजबूरी और जरूरत दोनों है। 3. पाकिस्तान और चीन का फैक्टर भारत की मुख्य चिंता ढाका का इस्लामाबाद और बीजिंग की ओर संभावित झुकाव है। चीन ने पहले ही मोंगला पोर्ट के आधुनिकीकरण जैसे प्रोजेक्ट्स के जरिए अपनी मौजूदगी दर्ज कराई है। यदि रहमान की सरकार पाकिस्तान के साथ रक्षा सौदों या सीधी उड़ानों को बढ़ाती है, तो यह भारत के लिए रणनीतिक घेराबंदी जैसा होगा। हसीना के दौर में रिश्ते दोस्ती पर टिके थे, लेकिन रहमान के दौर में ये लेन-देन पर आधारित होगा। रहमान ने संकेत दिया है कि वे जल बंटवारे जैसे मुद्दों पर भारत के साथ कड़ा मोलभाव कर सकते है। हसीना का भारत में होना नई सरकार के लिए एक चुभता हुआ मुद्दा बना रहेगा, जिसे सुलझाना दिल्ली के लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी। फिलहाल के संकेत बताते हैं कि तारिक रहमान संतुलन का रास्ता अपनाएंगे। वे न तो पूरी तरह भारत को गले लगाएंगे और न ही पाकिस्तान की गोद में बैठने वाले है। उनकी प्राथमिकता बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था और अपनी सत्ता को स्थिर करना है। दिल्ली के लिए यह रुको और देखो की स्थिति है, जहाँ उसे अब भावुकता के बजाय ठोस हितों पर आधारित कूटनीति खेलनी होगी। आशीष/ईएमएस 15 फरवरी 2026