लेख
17-Feb-2026
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जीत हार सत्ता विपक्ष जीवन में आते रहते हैं लोग चुनाव में हार जीत को लेकर आपस में व्यक्तिगत शत्रु हो जाते हैं और अंहकारी हो जाते हैं लेकिन एक समय के बाद ऐ खत्म होने लगता है, यश, पद, सत्ता, धन आदि के लिए लोगों के पीछे घूमने से आप आत्म-प्रतिष्ठा खो देंगे, तथा कुछ न मिलेगा और यदि मिला भी तो वह प्रतिष्ठा की कीमत चुकाने से दुःखद हो जायगा। प्रयत्न का अर्थ आत्म-पतन नहीं होना चाहिए।दृढ़ विश्वास रखो कि चरित्र का अपना ही एक महत्व है। चरित्र की दृढ़ता मन को सम्बल प्रदान करती है। आध्यात्मिकता मनुष्य को पलायन नहीं सिखाती है, बल्कि उसके अन्तर्जगत् को सुव्यवस्थित कर उसे कर्म की ओर प्रवृत्त करती है तथा उसे समभावजनित स्थायी सुख एवं शान्ति प्रदान करती है। अध्यात्म एक विज्ञान है, एक कला है, एक दर्शन है। अध्यात्म मानव के जीवन में जीने की कला के मूल रहस्य को उद्घाटित करा देता है। आध्यात्मिक वातावरण मानों मन के जख्मों को धोकर, उन पर दिव्य मरहम लगाकर मानव को मानसिक स्वस्थता प्रदान करता है। ध्यान का दैनिक अभ्यास स्वास्थ्य एवं शांति के लिए निद्रा की भाँति परम आवश्यक है। थकने पर निद्रा कैसी सुखदा प्रतीत होती है। निद्रा आने पर मनुष्य श्रेष्ठ संगीत, भोग्य पदार्थ एवं भौतिक सत्ता को भी भूल जाता है। वे हेय हो जाते हैं। मनुष्य की जाग्रत अवस्था में ध्यान, अन्तरंग का एक गहन सुख होता है, जो अनिर्वचनीय है। जीवन में भव्यतम क्या है, इसका दर्शन ध्यान द्वारा ही संभव है। इसकी तुलना में समस्त सुख फीके प्रतीत होने लगते हैं। ध्यान कोई तन्त्र-मन्त्र नहीं है। मन को विपरीत दिशा में अर्थात् बाहर से भीतर की ओर ले जाना और उसे विचारों के स्रोत्र के साथ जोड़ देना एक कला है, जिसे ध्यान कहते हैं। ध्यान मन की एकाग्रता नहीं है, बल्कि मन को भीतरी चेतना के साथ जोड़ना है। ध्यान एक साधना है, जिसके द्वारा हम अपने भीतर आत्मानन्द उपजाते हैं। केसर सब स्थानों पर उत्पन्न नहीं होता है; उसके लिए उपयुक्त स्थान खोजना होता है तथा एक विशेष पद्धति अपनाकर अथक परिश्रम करना होता है। वे सब इच्छाएं और भय हमारे ही हैं, जो हमें अनजाने ही दुःखी रखते हैं। वे हमें भीड़ की भाँति घेरकर मानो पकड़ लेने का प्रयत्न करते हैं। धैर्य रखें तथा तटस्थ द्रष्टा ही रहकर अपने भीतर के गहरे स्तर को भी देखते ही रहें। वास्तव में अवचेतन मन भी गतिमान तो निरन्तर रहता है, किंतु हमें इसी अवस्था में ही उसका यह ज्ञान होता है । तब हमारे अवधान के समक्ष अवचेतन मन उद्घटित अथवा नग्न होकर दीखने लगता है। अवचेतन (अचेतन) के अतल गह्वरों में उतरने पर, समस्त संस्कारों, इच्छाओं, आशाओं, निराशाओं, स्मृतियों की परतों को उठाकर, अथवा उनका भेदन कर गहरे स्तर पर चेतना की निर्ग्रन्थ, निर्मल, अखण्ड सत्ता का संदर्शन एवं संस्पर्श हो जाता है। नित्यप्रति ऐसा अभ्यास करने पर ध्यान की पूर्वावस्था में धीरे-धीरे चेतन तथा अवचेतन मन प्रायः शान्त होने लगेंगे और उनकी चंचलता शिथिल अथवा न्यूनतम हो जायेगी। यह एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है, जिसका गर्व भूलकर भी साधक को नहीं करना चाहिए। सत्य का अनुसंधता सदैव विनम्र रहता है। व्यक्तिगत हमला होने पर आपकी मान्यताओं एवं आस्थाओं की परीक्षा होती है। चरित्र ही आपकी सच्ची सत्ता है आपकी असली पहचान और शक्ति, आपकी प्रतिभा या धन-दौलत से कहीं ज़्यादा आपके नैतिक मूल्यों, ईमानदारी और व्यवहार से बनती है। चरित्र आपको जीवन की कठिनाइयों का सामना करने में मदद करता है, सम्मान दिलाता है, और दूसरों के लिए प्रेरणा बनता है। लोग तो आपको अपनी दृष्टि से देखते हैं,आत्म-प्रेक्षपण करते हैं। जिनकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत तिन देखी तैसी। दुष्ट लोग सन्तों को घुन्ना, छिपा रुस्तम, बना हुआ पाखंडी, ऊँचा कलाकार कह देते हैं और उन्हें दुष्ट सिद्ध करने का प्रयत्न करते हैं। किसी के गुणप्रकर्ष को न जा सकने से उसकी निंदा होने पर आश्चर्य नहीं है। न वेत्ति यो यस्य गुणप्रकर्ष स तं सदा निन्दति नात्र चित्रम् । यथा किराती करिकुम्भजातां मुक्तां परित्यज्य बिभर्ति गुञ्ञाम्। लोग तो अपने स्तर पर रहकर ही तथा अपनी शिक्षा और संस्कारों के अनुसार ही आपका मूल्याकांन करेगे। वे आपके स्तर पर उठकर आपको कैसे देखें ? किंतु कुछ लोग तो जान-बूझकर गुणों को देखते ही नहीं और दोषों को ही देखते हैं। दुष्ट को दूसरों को दोष ही दिखाई देते हैं, गुण नहीं दीखते। सुंदर मणियों से विनिर्मित भवन में भी चींटी छिद्र ही ढूंढती है-सुन्दरमणिमयभवने पश्यति पिपीलिका रन्ध्रम्। छिद्रान्वेषण करना दुष्टों का स्वभाव होता है। दोषदर्शन से कटुता उत्पन्न होती है। सर्प और बिच्छु प्रकृतिवाले दुष्ट वाले (सैडिस्ट) दिनभर इसी में सुख मानते हैं कि आज कितने लोगों को रुला दिया और कितने लोगों को सता दिया। वे दूसरों को सताने में, दूसरों का अकारण अपमान करने में सुख मानते हैं। आप उनसे कितने ही बचें, वे आपको नहीं छोड़ते। वे बनावटी प्रेम दिखाकर खून चूस लेते हैं। अपनी स्वार्थ-सिद्धि के लिए आपके पेट में घुसकर आपसे काम ले लेते हैं और आपको आवश्यकता होने पर वे आपको सहायता देने के बजाय हानि पहुँचाने में सक्रिय हो जाते हैं तथा अपने क्रूर अत्याचार को सिद्धान्तों का जामा पहनाकर स्वयं अच्छे, भले नजर आते हैं। ऐसे व्यक्ति जब उच्च पदाधिकारी अथवा धन के कारण सत्ताधारी हो जाते हैं, तो त्राहि-त्राहि मच जाती है। उनके दमन का डटकर प्रतिरोध करते हुए भी उन्हें प्रेम से ही सुधारा जा सकता है। सन्त उन्हें क्षणा ही करते हैं। साधुपुरुष संकट में भी उत्तम स्वभाव का परित्याग नहीं करते। कपूर आग में जलने पर सुगान्धित हो जाता है। स्वभावं न जहात्यन्तः साधुरापद्गतोऽपि सन्। कर्पूरः पावकप्लुष्टः सौरभं भजतेतराम्। निन्दक को धन्यवाद दो। यदि नाटक में खलनायक (विलेन) न हो, तो नायक (हीरो) के व्यक्तित्व में चमक न आयेगी। विश्वास रखो कि समाज में एक दिन आपकी सत्यनिष्ठा का मान अवश्य होगा। वास्तव में निंदक आपके नाम को चमकाने में लगे हुए हैं। समाज में अपनी तथा दूसरों की निन्दा सुनकार उसे अपने सारे व्यक्तित्व में न समाने दें। शिव ने विष पीकर कण्ठ में धारण कर लिया और जनहित में जटाजूट से पतति-पावनी गंगा को प्रवाहित कर दिया। कटुता सहकर भी समाज के लिए उपयोगी बनने से ही आपकी पूजा होगी। समाज में अपमान और कष्ट के विष का पान करके भी अमृत उगलनेवाले महापुरुष समाज के सच्चे उपकारक होते हैं। दूसरों की चुगली करना और सुनना दोनों ही पतनकारक हैं। दूसरे की द्वेषप्रेरित झूठी चुगली सुनकर उस पर विश्वास कर लेना भूल है। केवल कानों से सुनी हुई ही नहीं, आँखों से देखी हुई बातें भी अनेक बार गलत सिद्ध हो जाती है। अपना विवेक खोकर तुरंत विश्वास कर लेना संकट उत्पन्न कर देता है। जाँच-पड़ताल के बाद ही भलाई और बुराई का निश्चय करना चाहिए। सद्भावना से प्रेरित होकर, किसी के सद्गुणों की सराहना एवं प्रशंसा करना सदैव उचित है, क्योंकि प्रायः प्रशंसा सदगुणों को प्रोत्साहन देती है। हम दूसरों का सत्कार करें। किंतु चापलूसी न करें और झूठ हाँ में हाँ न करें, क्योंकि कोई मनुष्य परमात्मा नहीं है। केवल परमात्मा ही परमात्मा है, मनुष्य केवल मनुष्य ही है। चापलूस अपनी चापलूसी से पद, सत्ता, धन आदि पा सकता है, किंतु उसे कभी कीर्ति प्राप्त नहीं हो सकती है। चापलूसी के मीठे जहर से बचना चाहिए। समाज में व्यक्तिगात शोषण के अतिरिक्त कुछ सामाजिक अत्याचार भी होते हैं-जातिवाद, बिरादरीबाद, प्रान्तवाद तथा कुटिल राजनीति इत्यादि के संकीर्ण दृष्टिकोण से। योग्य व्यक्ति के अधिकार छीन लिये जाते हैं और अयोग्य अथवा निम्नस्तरीय व्यक्ति को योग्य व्यक्ति के सिर पर बैठा दिया जाता है। इसके दो परिणाम संभव है-(1) व्यक्ति सिकुड़कर समाज के एक कोने में छिपकर पड़े हुए आत्मग्लानि की भट्टी में जलने से अच्छा है अपमानजनक स्थिति का अन्त कर दे। (2) अथवा वह हिंसा का सहारा लेकर अपराधी के रुप में सामाजिक अपराध करना प्रारंभ कर दे। किंतु विवेकशील व्यक्ति ऐसे समय में भी सुदृढ़ रहकर अपने मन में अथवा व्यवहार में ऐसी प्रतिक्रिया नहीं होने देता है। यह संकीर्णता की कदापि नहीं अपनाता है। कीचड़ से कीचड़ नहीं धोयी जाती है। शुद्ध जल से ही कीचड़ को धो सकते हैं। चरित्र आपका सच्चा धन है।चरित्र की राह पर चलने से धन और सत्ता उससे दूर होने लगते हैं और कठिनाइयाँ घेर लेती हैं। सीधा चलने और सीधा सोचनेवाला दूसरों को भी सीधा-सच्चा समझाकर उन पर सहज विश्वास कर लेता है। अतएव सच्चे आदमी को अधिक सावधान रहना चाहिए किंतु उसे अपनी सचाई और ईमानदारी में दृढ़ आस्था रखनी चाहिए। उसकी सच्चाई और ईमानदारी न केवल उसके सुख एवं संबल का स्रोत बन जाती है, उसकी रक्षा भी करती है। मनुष्य जब छल-प्रपंच का सहारा लेता है, बुद्धि निर्बल हो जाती है, आत्मविश्वास लुप्त हो जाता है तथा मनुष्य दूसरों के हाथ का खिलौना बनकर फँसता ही चला जाता है। सत्य का सहारा लेकर ही मनुष्य का आत्मविश्वास दृढ़ रह सकता है तथा मनुष्य संकट पार कर सकता है। हाँ, सत्यवादी व्यक्ति को सावधान एवं सतर्क रहने के साथ ही शालीन भी रहना चाहिए। संघर्ष से आपका व्यक्तिगत निखरकर ऊपर उठ सकता है और भौतिक पराजय एवं हानि पर भी आप चमक सकते हैं। वह आपकी विजय होगी। सत्यमेव जयते। सत्य की जय होती है। सत्य को सूर्य सदा के लिए छिपा हुआ नहीं रह सकता है। कभी-कभी मनुष्य के मरने के बाद भी सत्य प्रकट होता है। मनुष्य मरणशील हैं, किंतु सत्य अमर है। (यह लेखक के व्य‎‎‎क्तिगत ‎विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अ‎निवार्य नहीं है) ईएमएस / 17 फरवरी 26