लेख
17-Feb-2026
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस भव्य आयोजन का शुभारंभ किया,तो यह केवल दीप प्रज्ज्वलन नहीं था,बल्कि उस भविष्य का उद्घाटन था जिसमें मशीनें केवल उपकरण नहीं, बल्कि मानव निर्णय,शासन, अर्थव्यवस्था और चेतना की संरचना में सहभागी होंगी।भारत जैसे विशाल जनसंख्या वाले देश के लिए यह आयोजन एक प्रयोगशाला नहीं,बल्कि एक प्रयोग-भूमि है, जहाँ करोड़ों जीवन की दिशा तय होनी है। नई दिल्ली में 16 से 20 फरवरी 2026 के बीच आयोजित ‘एआई इम्पैक्ट 2026’ केवल एक तकनीकी सम्मेलन नहीं,बल्कि मानव सभ्यता के इतिहास में एक नए अध्याय का उद्घोष है। जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस भव्य आयोजन का शुभारंभ किया, तो यह केवल दीप प्रज्ज्वलन नहीं था, बल्कि उस भविष्य का उद्घाटन था जिसमें मशीनें केवल उपकरण नहीं, बल्कि मानव निर्णय,शासन, अर्थव्यवस्था और चेतना की संरचना में सहभागी होंगी। .भारत जैसे विशाल जनसंख्या वाले देश के लिए यह आयोजन एक प्रयोगशाला नहीं,बल्कि एक प्रयोग-भूमि है, जहाँ करोड़ों जीवन की दिशा तय होनी है। प्रधानमंत्री ने अपने उद्घाटन वक्तव्य में एआई को ‘विकसित भारत’ की धुरी बताते हुए कहा कि कृत्रिम बुद्धि केवल तकनीक नहीं, बल्कि मानव क्षमता के विस्तार का माध्यम है। उनका यह कथन प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि रणनीतिक था।भारत की जनसंख्या एक ओर भार है,तो दूसरी ओर मानव पूंजी का महासागर। एआई इम्पैक्ट 2026 इसी महासागर को दिशा देने का आह्वान है। यह आयोजन उस राष्ट्रीय आकांक्षा का मंच है जिसमें भारत केवल तकनीक का उपभोक्ता नहीं, बल्कि वैश्विक एआई नेतृत्वकर्ता बनने का संकल्प ले रहा है।एआई के संदर्भ में भारत की स्थिति अद्वितीय है। एक ओर विशाल युवा जनसंख्या, दूसरी ओर डिजिटल बुनियादी ढाँचे का तीव्र विस्तार, और तीसरी ओर राजनीतिक इच्छाशक्ति।प्रधानमंत्री मोदी का ‘मिशन एआई’ केवल प्रयोगशालाओं तक सीमित नहीं, बल्कि गाँव, खेत,कारखाने, विद्यालय और शासन प्रणाली तक विस्तारित दृष्टि है। एआई इम्पैक्ट 2026 इस दृष्टि को वैश्विक मंच पर प्रस्तुत करने का प्रयास है। परंतु हर तकनीकी क्रांति के साथ आशंकाओं की आँधी भी आती है। औद्योगिक क्रांति ने श्रमिक वर्ग को विस्थापित किया था, सूचना क्रांति ने ज्ञान का केंद्रीकरण तोड़ा था, और अब एआई क्रांति मानव श्रम और मानव निर्णय दोनों को चुनौती दे रही है। भारत जैसे देश में जहाँ बेरोजगारी पहले से ही सामाजिक- आर्थिक तनाव का स्रोत है,वहाँ एआई का आगमन एक नई अनिश्चितता का संकेत भी है। क्या मशीनें करोड़ों नौकरियों को निगल जाएँगी? क्या मानव श्रम अप्रासंगिक हो जाएगा? क्या निर्णय-प्रक्रिया एल्गोरिद्म के हाथों में चली जाएगी? ये प्रश्न केवल तकनीकी नहीं, बल्कि दार्शनिक और राजनीतिक भी हैं।एआई इम्पैक्ट 2026 का केंद्रीय विमर्श इसी द्वंद्व पर केंद्रित है—संभावना और शंका, सफलता और संकट,विकास और विस्थापन। प्रधानमंत्री मोदी का उद्घाटन भाषण इस द्वंद्व को स्वीकारते हुए आशावाद की ओर झुका हुआ था। उन्होंने कहा कि एआई मानव को विस्थापित नहीं, बल्कि सशक्त करेगा।यह कथन राजनीतिक रूप से आश्वस्तकारी है, परंतु सामाजिक यथार्थ में इसे मूर्त रूप देने के लिए नीतिगत क्रांति आवश्यक है। भारत की विशाल जनसंख्या यदि प्रशिक्षित, कौशलयुक्त और डिजिटल रूप से सशक्त होती है, तो एआई क्रांति भारत को वैश्विक शक्ति बना सकती है। किंतु यदि यह जनसंख्या तकनीकी परिवर्तन से कट जाती है,तो वही जनसंख्या सामाजिक विस्फोट का कारण भी बन सकती है।एआई इम्पैक्ट 2026 इस दोराहे पर खड़े भारत का आत्ममंथन है।मानव संसाधन के संदर्भ में एआई का प्रभाव बहुआयामी है। शिक्षा प्रणाली, स्वास्थ्य सेवाएँ, कृषि, उद्योग, प्रशासन, न्याय प्रणाली—सभी क्षेत्रों में एआई की भूमिका बढ़ रही है।भारत में डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर, आधार, यूपीआई, डिजिलॉकर, और अब एआई आधारित शासन मॉडल, एक नए सामाजिक अनुबंध की रचना कर रहे हैं।मोदी का मिशन इस अनुबंध को ‘डिजिटल नागरिकता’ के रूप में परिभाषित करता है। एआई इम्पैक्ट 2026 इसी डिजिटल नागरिकता का वैश्विक विमर्श है।बेरोजगारी की आशंका को लेकर अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों की राय विभाजित है। कुछ का मानना है कि एआई करोड़ों नौकरियों को समाप्त कर देगा, जबकि अन्य का कहना है कि यह उतनी ही नई नौकरियाँ भी पैदा करेगा। भारत के संदर्भ में यह समीकरण अधिक जटिल है। यहाँ अनौपचारिक क्षेत्र, कृषि आधारित रोजगार और निम्न कौशल श्रमिकों की विशाल संख्या है। यदि एआई इन क्षेत्रों में बिना सामाजिक सुरक्षा के प्रवेश करता है, तो असमानता बढ़ेगी। एआई इम्पैक्ट 2026 में इस प्रश्न पर गहन चर्चा हो रही है कि कैसे कौशल पुनर्संरचना, जीवनपर्यंत शिक्षा और डिजिटल प्रशिक्षण के माध्यम से मानव संसाधन को एआई युग के अनुरूप ढाला जाए। प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने उद्घाटन में ‘स्किल, स्केल और स्पीड’ की त्रयी पर बल दिया। उनका तर्क था कि भारत को एआई में कौशल विकसित करना होगा, उसे बड़े पैमाने पर लागू करना होगा, और वैश्विक प्रतिस्पर्धा में गति बनाए रखनी होगी। यह दृष्टि भारत को केवल तकनीकी शक्ति नहीं, बल्कि नैतिक और मानवीय एआई नेतृत्वकर्ता बनाने की आकांक्षा भी रखती है।वैश्विक संदर्भ में एआई एक भू-राजनीतिक हथियार बन चुका है।अमेरिका, चीन, यूरोप और अन्य शक्तियाँ एआई को आर्थिक, सैन्य और राजनीतिक प्रभुत्व के साधन के रूप में देख रही हैं। भारत की भूमिका अब केवल संतुलन कारी नहीं,बल्कि वैकल्पिक मॉडल प्रस्तुत करने की है। एआई इम्पैक्ट 2026 में भारत ने ‘मानव-केंद्रित एआई’ की अवधारणा को प्रमुखता से रखा है। यह अवधारणा एआई को मानव गरिमा, लोकतंत्र और सामाजिक न्याय के साथ जोड़ने का प्रयास है। सफलता की संभावना विशाल है। कृषि में सटीक खेती, स्वास्थ्य में निदान की क्रांति, शिक्षा में व्यक्तिगत शिक्षण, शासन में पारदर्शिता, उद्योग में उत्पादकता—ये सभी एआई के उपहार हैं। भारत जैसे देश में जहाँ संसाधनों की कमी और जनसंख्या की अधिकता है, वहाँ एआई संसाधनों के कुशल उपयोग का माध्यम बन सकता है। एआई इम्पैक्ट 2026 इन संभावनाओं को नीतिगत रोडमैप में बदलने का मंच है। परंतु शंका भी उतनी ही गहरी है। डेटा की निजता, एल्गोरिद्मिक पक्षपात, निगरानी राज्य, डिजिटल उपनिवेशवाद—ये एआई युग के अंधेरे पक्ष हैं। भारत जैसे लोकतंत्र में जहाँ नागरिक अधिकारों की रक्षा सर्वोपरि है, वहाँ एआई का अनियंत्रित प्रयोग लोकतंत्र को भी चुनौती दे सकता है। प्रधानमंत्री मोदी ने अपने भाषण में ‘ट्रस्ट और ट्रांसपेरेंसी’ पर जोर देकर इस चिंता को स्वीकार किया।एआई इम्पैक्ट 2026 इसलिए केवल तकनीकी सम्मेलन नहीं, बल्कि सभ्यता का संवाद है। यह संवाद मानव और मशीन, लोकतंत्र और एल्गोरिद्म, बाजार और समाज, शक्ति और नैतिकता के बीच है। भारत इस संवाद में एक प्राचीन सभ्यता के प्रतिनिधि के रूप में उपस्थित है, जो तकनीक को साधन मानती है, साध्य नहीं। इस आयोजन में अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों, नीति निर्माताओं, उद्योग जगत और शिक्षाविदों की उपस्थिति इस बात का संकेत है कि एआई अब किसी एक देश या कंपनी का विषय नहीं, बल्कि मानवता का साझा भविष्य है।प्रधानमंत्री मोदी का उद्घाटन भाषण भारत को इस साझा भविष्य के नैतिक मार्गदर्शक के रूप में प्रस्तुत करता है। अंततः प्रश्न यह नहीं कि एआई आएगा या नहीं, बल्कि यह है कि मानवता उसे कैसे अपनाएगी। भारत जैसे देश के लिए यह प्रश्न और भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहाँ तकनीक केवल सुविधा नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय का उपकरण भी हो सकती है। एआई इम्पैक्ट 2026 इस संभावना, शंका और सफलता के त्रिकोण में खड़े मानव भविष्य का चिंतन है। यह आयोजन एक चेतावनी भी है और एक आशा भी -कि यदि मानव विवेक, नीति और नैतिकता तकनीक के साथ चलें, तो एआई मानव सभ्यता का विनाश नहीं, बल्कि उसका उत्कर्ष बन सकता है।एआई इम्पैक्ट 2026 के उद्घाटन सत्र के साथ ही यह स्पष्ट हो गया कि भारत एआई को केवल आर्थिक वृद्धि का उपकरण नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का आधार बनाना चाहता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने वक्तव्य में भारत की जनसांख्यिकी को ‘डेमोग्राफिक डिविडेंड’ से ‘डिजिटल डिविडेंड’ में रूपांतरित करने का आह्वान किया। उनका संकेत स्पष्ट था—यदि युवा शक्ति को एआई कौशल से लैस किया जाए, तो भारत आने वाले दशकों में वैश्विक नवाचार का केंद्र बन सकता है। भारत के लिए एआई का प्रश्न केवल तकनीकी नहीं, बल्कि सभ्यतागत है। यहाँ की संस्कृति, दर्शन और सामाजिक संरचना हजारों वर्षों से मानव चेतना, नैतिकता और सामूहिकता पर आधारित रही है। एआई इस संरचना में एक नया तत्व जोड़ रहा है—एल्गोरिद्मिक निर्णय। यह निर्णय मानव विवेक का सहायक भी हो सकता है और प्रतिस्थापन भी। एआई इम्पैक्ट 2026 इसी द्वंद्व की ऐतिहासिक बहस का मंच है।मानव संसाधन के संदर्भ में भारत की चुनौती अद्वितीय है। हर वर्ष लाखों युवा श्रम बाजार में प्रवेश करते हैं। परंपरागत उद्योग उतनी गति से रोजगार नहीं पैदा कर पा रहे। एआई आधारित स्वचालन इस संकट को बढ़ा भी सकता है और हल भी कर सकता है। यदि एआई केवल पूंजी-गहन उद्योगों में केंद्रित रहा, तो रोजगार संकट गहराएगा। लेकिन यदि एआई को शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, लघु उद्योग और ग्रामीण उद्यमिता में समावेशी रूप से लागू किया जाए, तो यह रोजगार सृजन की नई लहर भी पैदा कर सकता है। मोदी ने ‘एआई फॉर ऑल’ की अवधारणा पर जोर देकर इस समावेशन का संकेत दिया। उनका कहना था कि एआई केवल महानगरों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों की संपत्ति नहीं, बल्कि गाँव, किसान, छात्र और छोटे उद्यमी का भी अधिकार है। एआई इम्पैक्ट 2026 में प्रस्तुत अनेक स्टार्टअप और नीति प्रस्ताव इसी विचार को मूर्त रूप देते हैं।वैश्विक मंच पर भारत की एआई कूटनीति भी इस सम्मेलन का महत्वपूर्ण आयाम है। एआई अब ऊर्जा, रक्षा, साइबर सुरक्षा और आर्थिक प्रभुत्व का नया क्षेत्र बन चुका है। अमेरिका और चीन के बीच एआई प्रतिस्पर्धा एक नई शीत युद्ध की तरह उभर रही है। भारत इस प्रतिस्पर्धा में तीसरे ध्रुव के रूप में उभर सकता है, जो लोकतांत्रिक मूल्यों और मानव अधिकारों पर आधारित एआई मॉडल प्रस्तुत करे। प्रधानमंत्री मोदी का उद्घाटन वक्तव्य इसी ‘विश्व मित्र’ भूमिका की ओर संकेत करता है। एआई इम्पैक्ट 2026 में यह भी स्पष्ट हुआ कि डेटा ही नए युग का तेल नहीं, बल्कि नई सभ्यता का रक्त है। भारत के पास विशाल डेटा संसाधन हैं, परंतु डेटा संप्रभुता, निजता और सुरक्षा के प्रश्न अत्यंत संवेदनशील हैं। यदि भारतीय नागरिकों का डेटा वैश्विक तकनीकी निगमों के नियंत्रण में चला गया, तो डिजिटल उपनिवेशवाद का खतरा वास्तविक है। इस सम्मेलन में डेटा लोकलाइजेशन, भारतीय एआई मॉडल और स्वदेशी चिप निर्माण पर हुई चर्चा भारत की डिजिटल संप्रभुता के संघर्ष का संकेत है। बेरोजगारी की आँधी की आशंका इस सम्मेलन के विमर्श में बार-बार उभरी। कई विशेषज्ञों ने चेतावनी दी कि आने वाले वर्षों में पारंपरिक नौकरियाँ तेजी से समाप्त होंगी। वहीं कुछ विशेषज्ञों ने कहा कि एआई नई रचनात्मक अर्थव्यवस्था को जन्म देगा, जहाँ मानव रचनात्मकता, भावनात्मक बुद्धि और सामाजिक कौशल की मांग बढ़ेगी। भारत के लिए यह संक्रमण काल सबसे चुनौतीपूर्ण होगा। यहाँ सामाजिक सुरक्षा तंत्र अभी भी विकसित हो रहा है। इसलिए एआई नीति के साथ-साथ सामाजिक नीति भी उतनी ही आवश्यक है। नरेंद्र मोदी ने अपने भाषण में ‘मानवता प्रथम’ का मंत्र दोहराया। यह मंत्र केवल नैतिक उपदेश नहीं, बल्कि नीति का आधार बन सकता है। यदि भारत एआई को मानव कल्याण, गरीबी उन्मूलन, शिक्षा और स्वास्थ्य के लिए उपयोग करता है, तो यह तकनीक सामाजिक समानता का उपकरण बन सकती है। एआई इम्पैक्ट 2026 इसी नैतिक दृष्टि को वैश्विक विमर्श में स्थापित करने का प्रयास है।सफलता की राह स्पष्ट है, परंतु सरल नहीं। भारत को एआई शिक्षा को विद्यालयों और विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में एकीकृत करना होगा।शोध, नवाचार और उद्योग के बीच सेतु बनाना होगा। स्टार्टअप इकोसिस्टम को ग्रामीण भारत तक विस्तार देना होगा। और सबसे महत्वपूर्ण, एआई के नैतिक और कानूनी ढाँचे का निर्माण करना होगा। एआई इम्पैक्ट 2026 इन सभी क्षेत्रों में नीति-निर्माताओं, उद्योग और अकादमिक जगत के बीच संवाद का मंच प्रदान करता है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए भी यह सम्मेलन एक संदेश है कि भारत केवल तकनीकी बाजार नहीं, बल्कि तकनीकी विचारधारा का स्रोत बनना चाहता है। प्रधानमंत्री मोदी का उद्घाटन भाषण इस विचारधारा का उद्घोष था—कि तकनीक मानव की दासी हो, स्वामी नहीं। हम यदि एआई इम्पैक्ट 2026 को यदि इतिहास के परिप्रेक्ष्य में देखा जाए, तो यह भारत के डिजिटल स्वतंत्रता आंदोलन का एक अध्याय भी हो सकता है। जैसे भारत ने औपनिवेशिक युग में राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त की, वैसे ही डिजिटल युग में तकनीकी संप्रभुता की लड़ाई आरंभ हो चुकी है। एआई इस लड़ाई का केंद्र है।भारत जैसे विशाल जनसंख्या वाले देश के लिए एआई एक तूफान भी है और एक अवसर भी।यह तूफान बेरोजगारी,असमानता और निगरानी का खतरा ला सकता है। और यही अवसर नव-रोजगार, नव-शिक्षा और नव-सभ्यता का द्वार भी खोल सकता है। एआई इम्पैक्ट 2026 इसी तूफान और अवसर के संगम पर खड़ा भारत का आत्म चिंतन है।यह सम्मेलन हमें याद दिलाता है कि तकनीक का भविष्य केवल इंजीनियरों के हाथ में नहीं, बल्कि समाज,नीति, दर्शन और लोकतंत्र के हाथ में है। यदि भारत इस सामूहिक जिम्मेदारी को स्वीकार करता है,तो एआई युग में वह केवल उपभोक्ता नहीं, बल्कि दिशा-निर्देशक बन सकता है। प्रधानमंत्री का उद्घाटन भाषण इसी दिशा का संकेतक है।एआई इम्पैक्ट 2026 इसलिए एक सम्मेलन नहीं,बल्कि एक चेतावनी, एक संकल्प और एक सभ्यतागत संवाद है।मानव और मशीन के इस नए सहजीवन में भारत की भूमिका निर्णायक हो सकती है -यदि वह अपनी प्राचीन विवेक परंपरा और आधुनिक तकनीक को संतुलित कर सके। ईएमएस/17/02/2026