राष्ट्रीय
17-Feb-2026
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नई दिल्ली (ईएमएस)। जिस प्रकार लगातार काम करने से शरीर थक कर बीमार पड़ सकता है, उसी तरह मन भी निरंतर तनाव, चिंता, भय या गुस्से में उलझा रहे तो उसका संतुलन बिगड़ जाता है। यूनानी चिकित्सा सिद्धांतों में ‘हरकत-ओ-सुकून नफसानी’ यानी मानसिक गतिविधि और मानसिक विश्राम को स्वस्थ जीवन की मूल आधारशिला माना गया है। यूनानी मत के अनुसार, हमारे भीतर मौजूद जीवन शक्ति ‘रूह’ मानसिक व शारीरिक संतुलन बनाए रखने का महत्वपूर्ण केंद्र है। जब हमारी भावनाएं संतुलित, सोच सकारात्मक और मन को पर्याप्त विश्राम मिलता है, तो रूह भी संतुलित रहती है और सेहत बेहतर बनी रहती है। आज की तेज़ रफ्तार जिंदगी में लोग शरीर की थकान को तो पहचान लेते हैं, लेकिन मन की थकान को अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं। देर रात तक काम करना, घंटों स्क्रीन के सामने समय बिताना, लगातार तनाव में रहना और भविष्य की चिंताओं में डूबे रहना मन पर भारी बोझ डालता है। यह मानसिक दबाव धीरे-धीरे बेचैनी, चिड़चिड़ापन, अनिद्रा और मानसिक थकावट का रूप ले लेता है। यूनानी सिद्धांत बताते हैं कि मानसिक गतिविधि जीवन के लिए जरूरी है सोचना, सीखना, निर्णय लेना और काम करना मन के स्वाभाविक हिस्से हैं। लेकिन हर चीज की तरह इसमें भी संतुलन ज़रूरी है। यदि मानसिक काम अधिक हो जाए और आराम कम, तो मन असंतुलित होने लगता है। वहीं दूसरी ओर, मानसिक निष्क्रियता—जहां मन को कोई चुनौती या गतिविधि न मिले उदासी, सुस्ती और निराशा को जन्म दे सकती है। इसलिए मानसिक स्वास्थ्य के लिए सबसे अहम है संतुलन बनाकर रखना। मानसिक सुकून पाने के लिए बड़े बदलावों की आवश्यकता नहीं होती। दिन में कुछ समय स्वयं के लिए निकालना, गहरी सांस लेने के अभ्यास करना, प्रकृति के बीच समय बिताना, नमाज, ध्यान या प्रार्थना को जीवन का हिस्सा बनाना, और सकारात्मक लोगों के साथ समय बिताना मन को राहत देते हैं। जब मन शांत और संतुलित होता है, तो इसका सीधा असर पूरे शरीर पर दिखता है। इसलिए मानसिक सेहत पर उतना ही ध्यान देना चाहिए जितना शरीर की सेहत पर, क्योंकि दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। साथ ही, अपनी सीमाओं को पहचानना और हर ज़िम्मेदारी को खुद पर लादने से बचना भी मानसिक स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है। यूनानी चिकित्सा हमें संयम, सकारात्मक सोच और आवश्यक मानसिक विश्राम की शिक्षा देती है। सुदामा/ईएमएस 17 फरवरी 2026