लेख
18-Feb-2026
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अपने शुद्ध आत्म स्वरूप को पहचान कर जगत के बंधन को तोड कर चेतन लोक को गमन करो। शरीर के अंदर मुलाधार , स्वाधिष्ठान, मणिपुरक आदि आठ चक्रों का शोधन करते हुए उनका ज्ञान करते हुए ब्रह्मांड में जाओ जहां पर पंच शून्य स्थानों में जगमग प्रकाश हो रहा है। चाचरी भूचरी अगोजरी मुद्रा त्याग कर खेचरी उनमुनी से पार अपनी चेतना को दशम द्वारा से उर्ध की और ले जाओ। यह मन को शांत और स्थिर रखने के साथ-साथ तनाव से राहत दिलाने में भी अच्छा है। आंखें मजबूत हो जाती हैं और आत्मनिरीक्षण की क्षमता उत्पन्न होती है। मूलाधार चक्र का जागरण और संतुलन करना है ।पंच ब्रह्मांडीय शब्द निरंजन, ओम सोहम शक्ति ररंकार को त्याग कर सत्य शब्द परम प्रभु को चेतन प्रदेश में प्रत्यक्ष देखो। तुम्हारे शरीर में दशम द्वारा जो बंद पड़ा है।उसे गुरु विधान से तुम खोलकर मकर डोरी जो प्रभु से तुम्हारी आत्मा तक लगी है को पकड़ लो तत्पश्चात प्रभु के दिव्य प्रकाश को वहां पहुंच कर देखो उस परमात्मा के स्वरूप का वर्णन मै क्या करु। उसके दिव्य चेतन प्रकाश में असंख्य सुर्य का प्रकाश लज्जित हो जाता है उस प्रभु को प्राप्त करने पर संसार के त्रयताप छुट जाते हैं। और आत्मा सारे बंधनों को छोड़ कर शास्वत आनंद प्राप्त करता है सद्गुरु सदाफल देव जी महाराज कहते हैं।इस दुर्लभ रहस्य पूर्ण गोपनीय चेतन साधन को करोड़ों मनुष्य में कोई एक जौहरी पारखी भाग्यशाली व्यक्ति प्राप्त करता है आत्म-बोध या चेतना है। यह केवल जानकारी नहीं, बल्कि खुद को और वास्तविकता को गहराई से जानने का अनुभव है। इसके अलावा, ज्ञान, विवेक, और बोध स्वयं भी ज्ञान के बोध के लिए महत्वपूर्ण शब्द हैं, जो समझने की क्षमता को दर्शाते हैं। प्रमुख शब्द और उनके अर्थ: आत्म-बोध यह सबसे गहरा शब्द है, जो स्व-ज्ञान और वास्तविक ज्ञान की प्राप्ति को दर्शाता है। बोध: यह इंद्रिय और अनुभव से प्राप्त ज्ञान का बोध कराता है। चेतना: यह मानसिक जागरूकता और ज्ञान को ग्रहण करने की क्षमता है। विवेक:: यह सही और गलत के बीच अंतर करने की क्षमता प्रदान करता है। अनुभव : यह ज्ञान प्राप्ति का एक प्रमुख स्रोत है, जो प्रत्यक्ष ज्ञान की पुष्टि करता है। प्रमुख कारण और विवरण: विभिन्न शब्दकोश: शब्दों की उत्पत्ति के आधार पर उन्हें तत्सम, तद्भव, देशज और विदेशी जैसे विभिन्न वर्गों में बांटा जाता है, जिससे उनकी विविधता बनी रहती है भावनात्मक और संदर्भगत अंतर: अलग-अलग शब्दों के माध्यम से व्यक्ति विभिन्न भावनाओं और संदर्भों को व्यक्त करता है, जिससे अर्थ में सूक्ष्म अंतर आ जाता है। अनेकार्थक और समानार्थक शब्द: हिंदी में कुछ शब्द एक समान लिखे/बोले जाते हैं लेकिन उनके अर्थ बिल्कुल अलग हो सकते हैं (अनेकार्थक), या उच्चारण समान होने पर भी अर्थ में भिन्नता हो सकती है (समरूपी शब्द)। वाक्य रचना में भिन्नता: बोलचाल या लेखन में लोग अपनी भावनाओं के अनुसार शब्दों का चयन और प्रयोग करते हैं, जो उनके विचारों को अद्वितीय बनाते हैं। ज्ञानवर्धक वचनों या सद्गुरु के वचनों) से जीवन में आत्मज्ञान (स्वयं की पहचान, सत्य और अपनी शक्तियों का बोध) प्राप्त होता है। यह ज्ञान न केवल मानसिक शांति, आत्म-विकास और जीवन के उद्देश्य को समझने में मदद करता है, बल्कि संसार के नश्वर स्वरूप (परिवर्तन ही नियम है) से परिचय कराकर मन में संतुलन और स्थिरता लाता है। आत्मज्ञान के संदर्भ में मुख्य बातें: शब्दों का महत्व: अक्सर किसी ज्ञानी व्यक्ति के शब्द या उपदेश व्यक्ति को भीतर की ओर देखने के लिए प्रोत्साहित करते हैं, जिससे स्वयं का अनुभव और विश्वास बढ़ता है। आत्म-साक्षात्कार की प्रक्रिया: यह एक गहरी समझ है जिसमें यह पता चलता है कि हम कौन हैं, हमारा मूल क्या है और हमारे दुखों या सुखों का कारण क्या है। दृष्टिकोण में बदलाव: आत्मज्ञानी व्यक्ति संसार के सुख-दुख, मान-अपमान से प्रभावित नहीं होते, वे अत्यंत साधारण जीवन जीते हैं और संतोष का अनुभव करते हैं। परिणाम: जब शब्दों का प्रभाव गहरा होता है, तो व्यक्ति का अहंकार कम होता है और वह अपने वास्तविक स्वरूप को जानकर मोह-माया से मुक्त हो जाता है। हिन्दू समाज में मान्यता है कि वेद में भगवान राम का वर्णन है जिसके नाम पर अनेक पौराणिक कथाओं का सृजन हुआ है। उन्हीं राम की पूजा-उपासना वैदिक काल से आज तक चली आती है। किन्तु वेद के मर्मज्ञ इस विचार से सहमत नहीं हैं।उनके अनुसार वेद तथा उपनिषदों का राम ही निराकार ब्रह्म है। ईएमएस / 18 फरवरी 26