नई दिल्ली (ईएमएस)। कांग्रेस सांसद और पूर्व मंत्री शशि थरूर ने ‘वंदे मातरम’ को लेकर चल रही बहस पर साफ कहा कि किसी भी नागरिक को गाने के लिए मजबूर नहीं करना चाहिए। उन्होंने हाल ही में केंद्र सरकार द्वारा जारी किए गए गाइडलाइंस की आलोचना कर कहा कि देशभक्ति दिल से होती है, और कानून बनाकर इस गाने को जबरन किसी की जुबान पर नहीं लाया जा सकता। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने आदेश दिए हैं कि राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम’ अब सभी आधिकारिक कार्यक्रमों में पूरा गाना अनिवार्य होगा। कांग्रेस नेता थरूर ने इस दौरान ‘वंदे मातरम’ के इतिहास का उल्लेख किया। यह गीत बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा लिखा गया था और स्वतंत्रता संग्राम में क्रांतिकारियों और सत्याग्रहियों को प्रेरित करता था। उन्होंने कहा कि आज एक धर्मनिरपेक्ष गणराज्य के रूप में राज्य और व्यक्तिगत अंतरात्मा के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है। स्वतंत्रता के समय भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ‘वंदे मातरम’ गाती थी, लेकिन देश की धार्मिक विविधता को देखकर ‘जन गण मन’ को राष्ट्रगान चुना गया। संविधान सभा ने ‘वंदे मातरम’ को राष्ट्रीय गीत का समान दर्जा दिया, ताकि स्वतंत्रता संग्राम में इसकी भूमिका सम्मानित हो और किसी समुदाय को अलग-थलग न किया जाए। यह एक सोच-समझकर किया गया समझौता था। कांग्रेस नेता थरूर ने रवींद्रनाथ टैगोर की भूमिका का भी जिक्र किया। टैगोर ने 1896 में गीत को संगीतबद्ध किया और 1937 में सुझाव दिया कि सार्वजनिक मंचों पर केवल पहले दो अंतरे गाए जाएं। शुरुआती पंक्तियां मातृभूमि की प्राकृतिक सुंदरता का प्रतीकात्मक वर्णन करती हैं, जिसे सभी स्वीकार कर सकते हैं। लेकिन बाद के अंतरों में दुर्गा और लक्ष्मी जैसी देवी-देवताओं का उल्लेख है, इससे कुछ धर्मों के लोग धार्मिक कारणों से नहीं गा सकते। कांग्रेस नेता थरूर ने कहा कि कई मुस्लिम नागरिकों की आपत्ति इसी कारण है, क्योंकि इस्लाम में तौहीद के सिद्धांत के अनुसार किसी अन्य ईश्वर या देवी-देवता को मानना या उसकी स्तुति करना स्वीकार्य नहीं है। कांग्रेस सांसद थरूर ने मोदी सरकार के हालिया आदेश पर भी सवाल उठाकर कहा कि किसी प्रतीक की ताकत उसकी स्वैच्छिक श्रद्धा में है, जबरदस्ती पालन में नहीं। उन्होंने 1986 के सुप्रीम कोर्ट के ‘जेहोवाज विटनेस केस’ का उदाहरण दिया, जिसमें धार्मिक कारणों से राष्ट्रगान न गाने वाले छात्रों को बहाल किया गया था। थरूर ने सुझाव दिया कि ‘वंदे मातरम’ विवाद में यही मॉडल अपनाया जाए—जो लोग पूरी श्रद्धा से गाना चाहते हैं, वे गाएं, और जिन्हें धार्मिक या अंतरात्मा की आपत्ति है, उन्हें चुपचाप सम्मान करने का अधिकार मिले, बिना दंड या सामाजिक बहिष्कार के। यह दृष्टिकोण धर्मनिरपेक्षता और नागरिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाए रखने की दिशा में एक सोच-समझकर किया गया प्रयास है। आशीष दुबे / 19 फरवरी 2026