लेख
20-Feb-2026
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भारत ने पिछले 2 वर्षों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता पर दो सौ अरब रुपये खर्च किये है।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अनुसार भारत कृत्रिम बुद्धिमत्ता के क्षेत्र में दुनिया की तीसरी महाशक्ति बनने जा रहा है,कृत्रिम बुद्धिमत्ता उन्नत मार्ग पर बढ़ने के लिए कारगर तो है लेकिन इस पर नियंत्रण भी जरूरी है।वास्तव में 21वीं सदी में मानव सभ्यता एक अदभुत परिवर्तन के दौर से गुजर रही है। ओपन एआई जैसी संस्थाओं द्वारा विकसित कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने शिक्षा, स्वास्थ्य,साहित्य, पत्रकारिता, उद्योग, प्रशासन और संचार के क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव किये हैं। दूसरी ओर, अध्यात्म मानव जीवन की आंतरिक चेतना, नैतिक मूल्यों और आत्मबोध का आधार भी एआई बन सकती है। प्रश्न यह नहीं है कि साहित्य और कृत्रिम बुद्धिमत्ता में कौन श्रेष्ठ है, बल्कि यह है कि दोनों का संतुलित समन्वय मानवता को किस दिशा में ले जा सकता है। साहित्य अर्थात अंतरात्मा के भाव की अभिव्यक्ति, जो शब्द संयोजन के तहत रची जाती है। यह व्यक्ति को स्वयं की पहचान, अपने विचारों की शुद्धता और जीवन के उद्देश्य की स्पष्टता प्रदान करती है।जैसे अध्यात्म सिखाता है: मैं केवल शरीर नहीं, बल्कि चेतन आत्मा हूँ। प्रत्येक कर्म का प्रभाव होता है। नैतिकता, करुणा और सत्य जीवन की आधारशिला हैं।अध्यात्म बाहरी प्रगति से अधिक आंतरिक उन्नति पर बल देता है। यह मन को स्थिर, शांत और सकारात्मक बनाता है।ठीक उसी प्रकार अंतर्बोध से उपजे विचार साहित्य का निर्माण करते है।जिसके बेहतर परिणामो के लिए एआई का उपयोग सार्थक हो सकता है।वास्तव में कृत्रिम बुद्धिमत्ता वह तकनीक है जो मशीनों को सीखने, विश्लेषण करने और निर्णय लेने की क्षमता देती है। भविष्य में यदि कृत्रिम बुद्धिमत्ता को आध्यात्मिक मूल्यों के साथ साहित्य से जोड़ा जाए, तो एक संतुलित समाज का निर्माण संभव है। साहित्य में एआई का महत्व रचनात्मकता को बढ़ाने, लेखन प्रक्रिया को तेज करने और जटिल डेटा का विश्लेषण करने में एक क्रांतिकारी सहायक के रूप में उभर रहा है। यह लेखकों को कथानक, संवाद और विचारों को विकसित करने में मदद करता है। इसके अलावा, एआई का उपयोग पुराने साहित्य के अनुवाद, संरक्षण और विस्तृत साहित्यिक समीक्षा में हो रहा है। एआई के प्रभाव स्वरूप भाषा और साहित्य में बदलाव द्वारा साहित्य के क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन ला रहा है एआई के द्वारा हम नए विचारों का सृजन कर सकते हैं, और कहानी,गद्य व पद्य के विभिन्न पहलुओं को बेहतर बना सकते हैं। एआई पुराने और दुर्लभ ग्रंथों का आधुनिक भाषाओं में अनुवाद कर सकता है, जिससे उनकी पहुंच वैश्विक स्तर तक होती है। वही साहित्यिक प्रवृत्तियों की भविष्यवाणी करने, शैली का विश्लेषण करने और पात्रों के विकास को समझने में भी मदद मिलती हैं। साहित्य समीक्षा प्रक्रिया में इन एआई-संचालित उपकरणों को एकीकृत करके, शोधकर्ता अपनी दक्षता बढ़ा सकते हैं, जिससे मैन्युअल कार्यों से जुड़े संज्ञानात्मक भार कम हो जायेगा और अपने काम के व्याख्यात्मक और सैद्धांतिक विकास पहलुओं पर अधिक ध्यान केंद्रित कर सकते हैं। जिससे साहित्य समीक्षा अधिक सुगम और ज्ञानवर्धक बन जाएगी हाल के वर्षों में, अकादमिक अनुसंधान में साहित्य समीक्षा के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता का उपयोग अत्यंत महत्वपूर्ण हो गया है। विशेष रूप से, एआई उपकरणों ने विद्वानों और छात्रों द्वारा विभिन्न स्रोतों की खोज के तरीके में क्रांतिकारी बदलाव लाया गया है, जिससे खोज शब्दों को सटीक बनाने और पूर्ण-पाठ लेखों को आसानी से जांचने की अत्याधुनिक क्षमताएं उपलब्ध हुई हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता पर आधारित मशीन लर्निंग एल्गोरिदम और प्राकृतिक भाषा प्रसंस्करण जैसे उपकरण प्रासंगिक साहित्य खोजने की प्रक्रिया को काफी सरल बना सकते हैं। ये उपकरण व्यापक डेटाबेस और डिजिटल पुस्तकालयों में खोज करके विशिष्ट कीवर्ड और विषयों से मेल खाने वाले लेख, पुस्तकें और शोधपत्र ढूंढ सकते हैं। ये पहले से खोजी गई सामग्री के आधार पर संबंधित कार्यों की अनुशंसा भी कर सकते हैं, जिससे शोधकर्ताओं का काफी समय और मेहनत बचती है। शोधकर्ताओं को विभिन्न स्रोतों से आवश्यक जानकारी को समझने में मदद मिलती है, बिना प्रत्येक स्रोत को विस्तार से पढ़े। ऐसे सारांश उपकरण साहित्य समीक्षाओं के लिए अमूल्य साबित हो सकते हैं, जो वर्तमान शोध परिदृश्य का स्पष्ट अवलोकन प्रदान करते हैं।यह विश्लेषणात्मक क्षमता शोधकर्ताओं को अधिक सूक्ष्म निष्कर्ष निकालने और कमियों या आगे के अध्ययन के क्षेत्रों की पहचान करने में सक्षम बनाती है।लेकिन मुख्य प्रश्न यह है कि क्या मशीन मानवीय संवेदना, विवेक और रचनात्मकता का स्थान ले सकती है? यह दौर तकनीक द्वारा भाषाई संरक्षण और साहित्य की आत्मा बचाने की एक बड़ी चुनौती है।समय के साथ ज्ञान का रूप बदला, माध्यम बदला, लेकिन उसका मूल भाव बना रहा। वेदों की मौखिक परंपरा से लेकर ताड़पत्रों और भोजपत्रों तक, फिर हस्तलिखित पांडुलिपियों से छपाई की मशीन तक और अब डिजिटल दुनिया तक, भारतीय साहित्य ने हर बदलाव को अपनाया।अब एक नया आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) का दौर सामने है। सवाल यह है कि क्या यह बदलाव भी पहले की तरह स्वाभाविक होगा? या यह साहित्य की आत्मा को ही बदल देगा? इस पर हमें गहन विचार विमर्श करने की आवश्यकता है।हम कह सकते है कि कबीर के दोहे जीवन संघर्ष से उपजे, मीरा की भक्ति काव्य धारा समर्पण से उपजी, प्रेमचंद की कहानियां सामाजिक विसंगतियों से जन्मी,जबकि महादेवी की काव्य वेदना ने उनकी अंतरात्मा से जन्म लिया। ये रचनाएं किसी गणना का परिणाम नहीं थीं। एआई वास्तव पहले से लिखी गई रचनाओं अर्थात साहित्य को ही पढ़ता है। हम यह भी कह सकते है कि लेखक की जगह मशीन नही ले सकती है या मशीन लेखक की सहयोगी भर है।लेकिन फिर भी एआई एक उम्मीद का रास्ता खोलता है। इसलिए हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते है कि साहित्य और कृत्रिम बुद्धिमत्ता एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। ईएमएस / 20 फरवरी 25