-मंदिर उत्सवों को जाति पहचान के प्रचार का मंच नहीं बनाया जा सकता चेन्नई,(ईएमएस)। देश में यूजीसी के नए नियम को लेकर जाति के नाम पर विवाद जारी है। वहीं मद्रास हाईकोर्ट ने एक मामले में सुनवाई के दौरान अहम टिप्पणी करते हुए आदेश दिया है। कोर्ट ने सुनवाई के दौरान साफ कहा कि जाति समाज की सच्चाई नहीं, बल्कि लोगों के दिमाग में बैठी सोच है। कोर्ट ने यह भी चेतावनी दी कि मंदिर उत्सवों को किसी भी तरह से जाति पहचान के प्रचार का मंच नहीं बनाया जा सकता। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक मद्रास हाईकोर्ट ने अपने आदेश में संविधान के अनुच्छेद 14 का हवाला देते हुए कहा कि भारत गणराज्य बनने का मूल उद्देश्य ही समानता स्थापित करना था। कोर्ट ने कहा कि जाति जन्म के आधार पर लोगों को बांटती है और हर सरकारी संस्था की जिम्मेदारी है कि वह जातिवाद को खत्म करने की दिशा में काम करे, न कि उसे बढ़ावा दे। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भविष्य में मंदिर उत्सवों के किसी भी निमंत्रण या पर्चे में जाति का नाम स्वीकार नहीं किया जाएगा। बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक मामला तमिलनाडु के चेंगलपट्टू जिले के तिरुपोरुर स्थित अरुलमिगु कंधासामी मंदिर के मासी ब्रह्मोत्सव से जुड़ा था। कोर्ट के सामने सवाल था कि क्या मंदिर उत्सव के निमंत्रण पत्रों में दानदाताओं के नाम के साथ उनकी जाति लिखी जा सकती है। सुनवाई के दौरान जस्टिस भरत चक्रवर्ती ने कहा कि जब मंदिर उत्सव सरकारी विभाग की देखरेख में आयोजित होते हैं, तब किसी भी रूप में जाति का उल्लेख संविधान के समानता सिद्धांत के खिलाफ है। याचिकाकर्ता ने मांग की थी कि 2026 के मासी ब्रह्मोत्सव के निमंत्रण पत्रों में जाति नामों के इस्तेमाल पर रोक लगाई जाए और जुलूस में मूर्ति उठाने वाले स्वयंसेवकों के चयन के लिए नियम बनाए जाएं। राज्य सरकार ने कोर्ट को बताया कि इस साल के निमंत्रण पहले ही छप चुके हैं और उत्सव 20 फरवरी से शुरू हो रहा है। इस वजह से कोर्ट ने इस वर्ष के आयोजन में हस्तक्षेप नहीं किया, लेकिन भविष्य के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी कर दिए। हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि अगर दानदाता अपने नाम के साथ जाति लिखते हैं, तो मंदिर प्रशासन केवल नाम छापेगा जाति नहीं। कोर्ट ने राज्य सरकार की उस मांग को भी खारिज कर दिया जिसमें यह फैसला मंदिर या दानदाताओं के विवेक पर छोड़ने की बात कही गई थी। कोर्ट का मानना है कि जाति कोई प्राकृतिक या कानूनी पहचान नहीं बल्कि सामाजिक सोच का परिणाम है। संविधान समानता की बात करता है इसलिए सरकारी संस्थानों से जुड़े आयोजनों में जाति का प्रचार संविधान की भावना के खिलाफ है। क्योंकि मंदिर उत्सव विभाग के तहत आयोजित होते हैं जो एक सरकारी संस्था है। ऐसे में किसी जाति विशेष को प्रमुखता देना सरकारी कार्यक्रम में भेदभाव जैसा माना जाएगा। कोर्ट ने इस मामले में हस्तक्षेप से इनकार किया और कहा कि यह प्रशासनिक और स्थानीय स्तर का मुद्दा है। अदालत नियम बनाकर अनावश्यक विवाद नहीं बढ़ाना चाहती। वहीं विशेषज्ञों के मुताबिक यह फैसला सिर्फ मंदिर प्रशासन तक सीमित नहीं है, बल्कि सार्वजनिक आयोजनों में जातिगत पहचान के इस्तेमाल पर बड़ा संवैधानिक संदेश देता है। अदालत ने साफ कर दिया कि धार्मिक परंपराएं संविधान से ऊपर नहीं हो सकतीं और समानता ही लोकतंत्र की असली पहचान है। सिराज/ईएमएस 20फरवरी26 ---------------------------------