26-Feb-2026
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नई दिल्ली,(ईएमएस)। केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने दिल्ली की सीमाओं पर वाणिज्यिक वाहनों से वसूले जाने वाले पर्यावरण मुआवजा शुल्क को तत्काल समाप्त करने की जोरदार वकालत की है। एक सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान गडकरी ने इस कर की वसूली की सार्थकता और इसके तहत एकत्रित भारी-भरकम धनराशि के वास्तविक उपयोग पर कड़े सवालिया निशान खड़े किए हैं। उन्होंने दिल्ली नगर निगम की कार्यप्रणाली पर उंगली उठाते हुए पूछा है कि वर्षों से पर्यावरण के नाम पर वसूले गए करोड़ों रुपये आखिर कहां खर्च किए गए। गडकरी ने खुलासा किया कि उन्होंने हाल ही में नगर निगम के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ एक उच्च स्तरीय समीक्षा बैठक की थी। इस बैठक के दौरान उन्होंने निगम से यह स्पष्ट करने को कहा कि इस विशेष शुल्क से प्राप्त आय का हरित गतिविधियों या प्रदूषण कम करने वाली योजनाओं में कितना निवेश किया गया। उनके अनुसार, अधिकारियों ने स्वीकार किया कि पर्यावरण सुधार की दिशा में कोई ठोस योगदान नहीं दिया गया है। जब गडकरी ने इस टोल वसूली के औचित्य पर सवाल उठाया, तो अधिकारियों ने इसे सुप्रीम कोर्ट के पुराने आदेश का हिस्सा बताया। इस पर मंत्री ने सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि यदि इस धन का उपयोग निर्धारित लक्ष्यों के लिए नहीं हो रहा है, तो जनता और परिवहन क्षेत्र पर यह अतिरिक्त बोझ डालना अनुचित है। उल्लेखनीय है कि वर्ष 2015 में सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद दिल्ली में प्रवेश करने वाले भारी और वाणिज्यिक वाहनों पर ईसीसी लागू किया गया था। इसका मूल उद्देश्य प्रदूषण फैलाने वाले ट्रकों को शहर के भीतर आने से हतोत्साहित करना और प्राप्त राशि का उपयोग सार्वजनिक परिवहन व पैदल यात्रियों की सुविधाओं को बेहतर बनाने में करना था। हालांकि, गडकरी का दावा है कि उनके मंत्रालय की जांच में सामने आया है कि एकत्रित राशि का उपयोग प्रदूषण नियंत्रण के बजाय निगम की वित्तीय स्थिति को संभालने और वेतन जैसे खर्चों के लिए किया जा रहा है। इस वित्तीय संकट का समाधान सुझाते हुए केंद्रीय मंत्री ने कहा कि यदि यह पैसा नगर निकाय को चलाने के लिए अनिवार्य है, तो दिल्ली सरकार को निगम को सीधे अनुदान देना चाहिए। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि वे इस मामले में हस्तक्षेप करेंगे और सुप्रीम कोर्ट से इस पुराने आदेश पर पुनर्विचार करने का अनुरोध करेंगे। गडकरी का यह रुख दिल्ली-एनसीआर के ट्रांसपोर्टरों के लिए बड़ी राहत की उम्मीद लेकर आया है। यदि यह शुल्क हटता है, तो इससे आवश्यक वस्तुओं की ढुलाई लागत में कमी आएगी और अंतरराज्यीय व्यापार सुगम होगा। अब देखना यह है कि दिल्ली सरकार और न्यायालय पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक सुगमता के इस द्वंद्व पर क्या निर्णय लेते हैं। वीरेंद्र/ईएमएस/26फरवरी2026