भारत आज उस ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा है,जहाँ वह नित्य नवीन विकास की परिभाषा बदल रही है। इसी क्रम में औद्योगिक उत्पादन और सेवा क्षेत्र की परंपरागत सीमाओं से बाहर निकलकर अब राष्ट्र की शक्ति का निर्धारण उसकी रचनात्मक क्षमता,डिजिटल दक्षता और नवाचार से हो रहा है।इसी परिवर्तनकारी परिदृश्य में आई आई सी टी का उदय केवल एक शैक्षणिक संस्थान की स्थापना नहीं, बल्कि सामाजिक पुनर्रचना की एक दुरगामी दृष्टि का परिचायक है। एनीमेशन,विजुअल इफेक्ट्स, गेमिंग,कॉमिक्स और एक्सटेंडेड रियलिटी जैसे उभरते क्षेत्रों में भारत को वैश्विक अग्रणी बनाने की यह पहल अपने भीतर सामाजिक न्याय,अवसरों के लोकतंत्रीकरण और सांस्कृतिक आत्मविश्वास का अनंत संदेश समेटे हुए है।हमारी रचनात्मक अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें प्रतिभा और कल्पनाशीलता ही वास्तविक पूँजी होती है।भौगोलिक सीमाएँ,पारंपरिक संसाधन या भारी अवसंरचना इसकी अनिवार्यता नहीं हैं।एक छोटे शहर या ग्रामीण पृष्ठभूमि से आने वाला युवा भी यदि उपयुक्त प्रशिक्षण और तकनीकी संसाधन प्राप्त करे तो वह वैश्विक परियोजनाओं में अपनी अग्रणी भूमिका निभा सकता है।संस्थान का 2035 तक 10 लाख से अधिक विद्यार्थियों को कौशल प्रशिक्षण देने का लक्ष्य इसी सोच का सतत विस्तार है।यह केवल कौशल विकास का कार्यक्रम नहीं,बल्कि सामाजिक गतिशीलता का माध्यम है,जो वंचित और निचले तबकों को नई आर्थिक मुख्यधारा से जोड़ने का मार्ग प्रशस्त करता है।21वीं सदी का वैश्विक आर्थिक परिदृश्य यह स्पष्ट संकेत दे रहा है,कि आने वाला समय रचनात्मकता,डिजिटल तकनीक और बौद्धिक संपदा का होगा।जिस राष्ट्र के पास विचार, कल्पनाशक्ति और तकनीकी दक्ष मानव संसाधन होगा,वही विश्व मंच पर नेतृत्व करेगा।भारत ने इस यथार्थ को समय रहते पहचानते हुए एनीमेशन,विजुअल इफेक्ट्स,गेमिंग, कॉमिक्स और एक्सटेंडेड रियलिटी जैसे उभरते क्षेत्रों में संस्थागत आधार निर्मित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया है। इसी क्रम में स्थापित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ क्रियेटिव ट्रेकनालोजी(Indian Institute of Creative Technology) केवल एक शिक्षण संस्थान नहीं,बल्कि भारत की ऑरेंज इकोनॉमी का केंद्रीय स्तंभ बनकर उभर रहा है। माया नगरी मुंबई में राष्ट्रीय उत्कृष्टता केंद्र के रूप में प्रारंभ हुआ यह संस्थान सार्वजनिक-निजी भागीदारी मॉडल पर कार्य करता है,जहाँ उद्योग और अकादमिक जगत का समन्वय इसकी आधारशिला है।प्रारंभिक चरण में इसका संचालन नेशनल फिल्म डबल्पमेन्ट कॉरपोरेशन (NFDC) परिसर से आरंभ किया गया,जो भारतीय फिल्म और रचनात्मक उद्योग के ऐतिहासिक केंद्रों में से एक है।वर्तमान संरचना में चौथी से सातवीं मंजिल तक पूर्णतःकार्यशील फ्लोर स्थापित किए गए हैं,जिनमें अत्याधुनिक स्मार्ट कक्षाएँ,डिजिटल लैब्स,साउंड डिजाइन स्टूडियो,पोस्ट-प्रोडक्शन सुविधाएँ और पेशेवर स्तर का स्क्रीनिंग थिएटर शामिल हैं।यह अवसंरचना विद्यार्थियों को केवल सैद्धांतिक ज्ञान नहीं,बल्कि उद्योग- संगत व्यावहारिक प्रशिक्षण प्रदान करने के उद्देश्य से विकसित की गई है।संस्थान की संरचना का एक महत्वपूर्ण आयाम इसका स्टार्टअप इनक्यूबेशन केंद्र है,जहाँ नवोन्मेषी विचारों को व्यावसायिक रूप देने के लिए मेंटरशिप,तकनीकी संसाधन और नेटवर्किंग सहयोग उपलब्ध कराया जाता है।यह मॉडल विद्यार्थियों को नौकरी खोजने वाले के बजाय रोजगार सृजक बनने की प्रेरणा देता है।साथ ही,18 विशेषी कृत पाठ्यक्रमों के माध्यम से ए वी जी सी-एस आर(AVGC-XR) क्षेत्र की विविध आवश्यकताओं को संबोधित किया जा रहा है।उद्योग- उन्मुख पाठ्यक्रम संरचना यह सुनिश्चित करती है कि प्रशिक्षित युवा सीधे वैश्विक परियोजनाओं में योगदान दे सकें।आईआई सी टी की दीर्घकालिक योजना इसे और व्यापक स्वरूप देने की है।गोरेगांव फिल्म सिटी में प्रस्तावित10एकड़ का स्थायी परिसर इस दिशा में एक महत्त्वाकाँक्षी कदम है।यहाँ अत्याधुनिक इमर्सिव स्टूडियो,ए आर/वीआर/एक्सआर (AR/VR/XR)आधारित प्रयोगशालाएँ और सहयोगात्मक रचनात्मक स्पेस विकसित किए जाने की योजना है। यह परिसर विद्यार्थियों को भारत के मनोरंजन उद्योग के केंद्र में प्रशिक्षण का अवसर देगा,जिससे शिक्षा और उद्योग के बीच की दूरी न्यूनतम हो सकेगी।भविष्य में यह केंद्र वैश्विक प्रशिक्षण, शोध और नवाचार का हब बन सकता है।वही ऑरेंज इकोनॉमी की अवधारणा रचनात्मक उद्योगों को आर्थिक शक्ति में रूपांतरित करने की है।इसमें संस्कृति,कला,मीडिया,डिजाइन और डिजिटल नवाचार सम्मिलित होते हैं।विश्व स्तर पर यह क्षेत्र तीव्र गति से विस्तार कर रहा है और अरबों डॉलर का बाजार निर्मित कर चुका है।भारत,जिसकी जनसंख्या युवा और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध है,इस क्षेत्र में स्वाभाविक बढ़त रखता है।यदि भारतीय कथानक, पौराणिकता,लोककथाएँ और समकालीन अनुभव आधुनिक तकनीकी माध्यमों से प्रस्तुत किए जाएँ,तो वे वैश्विक दर्शकों को आकर्षित कर सकते हैं।इसी संभावना को संरचनात्मक आधार प्रदान करता है।आईआईसीटी संस्थान का लक्ष्य केवल प्रशिक्षण तक सीमित नहीं है,बल्कि 500 से अधिक मौलिक भारतीय बौद्धिक संपदाओं (IP)का निर्माण,10,000 से अधिक डोमेन विशेषज्ञों की तैयारी और 2035 तक 10 लाख से अधिक युवाओं को कौशल प्रशिक्षण देना इसकी व्यापक दृष्टि का हिस्सा है।यह दृष्टिकोण भारत को केवल सेवा प्रदाता नहीं,बल्कि वैश्विक कंटेंट सृजनकर्ता के रूप में स्थापित करने का प्रयास है। बौद्धिक संपदा का सृजन ही किसी भी राष्ट्र की दीर्घकालिक आर्थिक स्वायत्तता का आधार बनता है।सामाजिक दृष्टि से भी आईआईसी टी की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।डिजिटल रचनात्मक उद्योग भौगोलिक सीमाओं से मुक्त हैं।अतः छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों के युवाओं के लिए भी अवसर उपलब्ध हैं।जब समाज के निचले तबकों तक कौशल और संसाधन पहुँचेंगे, तब आर्थिक अवसरों का वास्तविक लोकतंत्रीकरण होगा।यहसामाजिक पूँजी को सुदृढ़ करेगा और क्षेत्रीय असमानताओं को कम करने में सहायक होगा।समावेशी और सतत विकास की दिशा में यह पहल दीर्घकालिक परिवर्तन का आधार बन सकती है। अंततः इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ क्रियेटिव ट्रेकनालोजीभारत के उस आत्मविश्वास का प्रतीक है,जो अपनी सांस्कृतिक विरासत और तकनीकी क्षमता के संगम से भविष्य गढ़ना चाहता है।यदि संरचना,उद्योग साझेदारी और सामाजिक समावेशन की यह त्रिवेणी निरंतरता के साथ आगे बढ़ती रही,तो ऑरेंज इकोनॉमी भारत की विकास यात्रा में स्वर्णिम अध्याय सिद्ध होगी।हम कह सकते है कि यह कोई आर्थिक प्रगति की कहानी नहीं होगी,बल्कि एक ऐसे भारत की ऐतिहासिक कथा होगी जो अपनी रचनात्मक ऊर्जा को वैश्विक शक्ति में रूपांतरित कर रहा है। (स्वतंत्र पत्रकार व स्तम्भकार) ईएमएस / 26 फरवरी 26