विकसित भारत के निर्माण में आईआईसीटी वऑरेंज इकोनॉमी की निर्णायक भूमिका रहेगी। 21वीं सदी के तीसरे दशक में भारत केवल विकास शील राष्ट्र नहीं,बल्कि वैश्विक नेतृत्व की ओर अग्रसर एक नव जागृत सभ्यता बनकर उभर रहा है।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दूरदर्शी नेतृत्व में विकसित भारत का संकल्प अब शब्द मात्र नहीं,बल्कि ससक्त शक्ति व नीति, तकनीक और नवाचार में परिवर्तित हो चुका है। भारत मंडपम में आयोजित एआई इम्पैक्ट समिट 2026 ने विश्व को यह संदेश दिया कि भारत अब डिजिटल युग का अनुयायी नहीं, बल्कि वह दिशा-निर्देशक बनने को तत्पर है।जिसकी झलक हमें विकसित भारत के निर्माण में आईआईसीटी व ऑरेंज इकोनॉमी की निर्णायक भूमिका होगी।21वीं सदी के तीसरे दशक में भारत केवल विकास शील राष्ट्र नहीं,बल्कि वैश्विक नेतृत्व की ओर अग्रसर एक नव जागृत सभ्यता बनकर उभर रहा है।नरेंद्र मोदी के दूरदर्शी नेतृत्व में विकसित भारत का संकल्पअब शब्द मात्र नहीं,बल्कि ससक्त शक्ति व नीति,तकनीक और नवाचार में परिवर्तित हो चुका है।राष्ट् नव निर्माण के यज्ञ में ऑरेंज इकोनॉमी और इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ क्रिएटिव टेक्नोलॉजी (आईआईसीटी)भारत की रचनात्मक शक्ति, सांस्कृतिक आत्मनिर्भरता और डिजिटल स्वाधीनता के नए स्तंभ बनकर उभर रहे हैं,जो आने वाले समय में देश को वैश्विक ज्ञान-आधारित महाशक्ति के रूप में स्थापित करने की क्षमता रखते हैं।तभी तो भारत चर्चा और चिंतन का केंद्र बना हुआ है।मोदी स्वयं विकास की बागडोर अपने हाथों में संभाल रखी हैं,तो परिवर्तन की गति तीव्र हो जाती है। मोदी के कुशल नेतृत्व में मिशन मोड में विकसित भारत तेजी से अग्रसर है,हाल ही में नई दिल्ली स्थित भारत मंडपम में आयोजित चार दिवसीय ‘एआई इम्पैक्ट समिट 2026’ के दौरान देखने को मिला।इस सम्मेलन ने विश्व को एक मंच पर लाकर भविष्य की योजनाओं की रूपरेखा न केवल प्रस्तुत की,बल्कि भारत की शर्तों और आवश्यकताओं के अनुरूप अनेक समझौतों को भी मूर्त रूप दिया।इससे यह संदेश गया कि भारत जिस आर्थिक और सामाजिक परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है,उसमें ज्ञान और तकनीक आधारित अर्थव्यवस्था निरंतर विस्तार पा रही है और यही भविष्य की वैश्विक प्रतिस्पर्धा का आधार बनेगी। 21वीं सदी के तीसरे दशक में मोदी सरकार के नेतृत्व में एक नई आर्थिक धारा उभर रही है, जिसे वैश्विक मंच पर “ऑरेंज इकोनॉमी” कहा जाता है।यह अर्थव्यवस्था रचनात्मकता,संस्कृति, डिजिटल मीडिया, मनोरंजन, डिजाइन,गेमिंग और नवोन्मेष पर आधारित है।भारत जैसे युवा और डिजिटल रूप से जुड़ते समाज के लिए यह केवल एक नया उद्योग नहीं,बल्कि आर्थिक और सांस्कृतिक नेतृत्व का अवसर भी है।आज जब दुनिया की अर्थव्यवस्थाएं ज्ञान आधारित मॉडल की ओर बढ़ रही हैं,तब रचनात्मक उद्योगों की भूमिका पारंपरिक औद्योगिक क्षेत्रों से कहीं अधिक निर्णायक होती जा रही है। हम आप को आई आई सी टी के परिसर में रू बरूह कराने की कोशिस कर रहे है।सबसे पहले मै आप से आई आई सी टी केनिदेशक मंडल : - संजय जाजू ,आईएएस, आईआईसीटी बोर्ड के अध्यक्ष।सचिव-सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार,डॉ.आशीष कुलकर्णी निदेशक -पुनर्युग आर्टविज़न,राजन नवानी-अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक, जेटलाइन ग्रुप ऑफ कंपनीज़, श्रीकर परदेशी मुख्यमंत्री के सचिव,महाराष्ट्र सरकार।मनवेन्द्र शुक्ल-मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ)लक्ष्य डिजिटल,चंद्रजीत बनर्जी , महानिदेशक-भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई),श्रीमती स्वाति म्हसे पाटिल-आईएएस,प्रबंध निदेशक-है।कार्यकारी टीम में डॉ. विश्वास देवस्कर,मुख्य कार्यकारी अधिकारी(आईआईसीटी के सीईओ),निनाद रायकर-मुख्य परिचालन अधिकारी(आईआईसीटी के सीओओ)-टीम सदस्यों के नेतृत्व व निर्देशन कार्य कर रही है। आपको बता दें विगत 19 सितंबर 2024 को भारत सरकार द्वारा एनीमेशन,विजुअल इफेक्ट्स,गेमिंग कॉमिक्स और एक्सटेंडेड रियलिटी जैसे क्षेत्रों के लिए राष्ट्रीय उत्कृष्टता केंद्र की स्थापना की घोषणा 391.15 करोड़ रुपये के बजटीय समर्थन के साथ की गई।यह संकेत था कि नीति-निर्माता रचनात्मक उद्योगों को राष्ट्रीय विकास रणनीति के केंद्र में ला रहे हैं।इसी संदर्भ में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ क्रिएटिव टेक्नोलॉजीकी स्थापना एक दूरगामी नीतिगत निर्णय के रूप में देखी जानी चाहिए।सार्वजनिक-निजी भागीदारी मॉडल पर आधारित इस संस्थान में फिक्की और सीआईआई जैसे उद्योग संगठनों की भागीदारी यह दर्शाती है कि सरकार शिक्षा और उद्योग के बीच की खाई को कम करने के लिए सहयोगात्मक ढांचा तैयार कर रही है और कौशल विकास को उद्योग की वास्तविक आवश्यकताओं से जोड़ना चाहती है।सर्व विदित रहे कि मुंबई स्थित एनएफडीसी परिसर में 18जुलाई 2025 को आईआईसीटी के संचालन के पहले चरण का उद्घाटन किया गया,जहाँअत्याधुनिक कक्षाओं,हाई-एंड कंप्यूटिंग लैब्स, पोस्ट-प्रोडक्शन स्टूडियो और स्क्रीनिंग थिएटर जैसी सुविधाओं के साथ संस्थान ने यह स्पष्ट कर दिया कि वह केवल एक अकादमिक इकाई नहीं,बल्कि उद्योग-समकक्ष प्रशिक्षण मंच बनना चाहता है। माया नगरी के गोरेगाँव फिल्म सिटी में प्रस्तावित दस एकड़ के स्थायी परिसर में इमर्सिव स्टूडियो,एआर/वीआर/एक्सआर प्रशिक्षण सुविधाएं और वर्चुअल प्रोडक्शन सेट विकसित किए जाने की योजना इस दिशा में एक साहसिक कदम है।यदि यह परियोजना समयबद्ध और गुणवत्ता मानकों के अनुरूप पूरी होती है,तो यह भारत को वैश्विक क्रिएटिव टेक्नोलॉजी मानचित्र पर एक प्रमुख केंद्र बना सकती है और देश को डिजिटल कंटेंट उत्पादन के वैश्विक हब के रूप में स्थापित कर सकती है।आईआईसीटी की गूगल,मेटा, एनवीआईडीआईए, माइक्रोसॉफ्ट, एप्पल,एडोबी और डब्ल्यूपीपी जैसी वैश्विक तकनीकी कंपनियों के साथ साझेदारियां पाठ्यक्रम की प्रासंगिकता,तकनीकी अद्यतन और उद्योग संपर्क के लिए महत्वपूर्ण हैं। हालाँकि,भारत को इन साझेदारियों को केवल उपभोक्ता तकनीक के रूप में नहीं,बल्कि तकनीकी सह- विकास और स्वदेशी नवोन्मेष के अवसर के रूप में उपयोग करना होगा,अन्यथा देश केवल वैश्विक टेक कंपनियों के लिए टैलेंट सप्लायर बनकर रह सकता है।यदि भारत इन सहयोगों के माध्यम से स्वदेशी प्लेटफॉर्म,इंजन,सॉफ्टवेयर और कंटेंट फ्रेमवर्क विकसित करता है,तो यह डिजिटल संप्रभुता की दिशा में भी एक बड़ा कदम होगा।इस संस्थान द्वारा प्रस्तावित अठारह विशेषीकृत पाठ्यक्रम और सौ से अधिक छात्रों का नामांकन युवाओं की रुचि को दर्शाता है,किंतु भारत की विशाल जनसंख्या और रोजगार आवश्यकताओं की तुलना में यह संख्या अभी सीमित है।यदि आईआईसीटी को राष्ट्रीय स्तर पर प्रभावी बनाना है,तो इसे मॉडल संस्थान के रूप में विकसित कर राज्यों में समान केंद्रों की स्थापना की रणनीति अपनानी होगी। डिजिटल प्लेटफॉर्म और हाइब्रिड शिक्षा मॉडल के माध्यम से लाखों युवाओं तक इस प्रशिक्षण को पहुंचाया जा सकता है,जिससे भारत वैश्विक डिजिटल श्रम बाजार में प्रतिस्पर्धी बन सकेगा।ऑरेंज इकोनॉमी का महत्व केवल आर्थिक नहीं,बल्कि सांस्कृतिक और कूटनीतिक भी है।डिजिटल कंटेंट,फिल्म,गेमिंग और वर्चुअल अनुभव आज देशों की सॉफ्ट पावर के प्रमुख माध्यम बन चुके हैं। कोरियाई पॉप संस्कृति,जापानी एनीमेशन और अमेरिकी फिल्म उद्योग ने अपने देशों को वैश्विक सांस्कृतिक प्रभाव प्रदान किया है। भारत अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और कहानी परंपरा के बावजूद अभी तक इस क्षेत्र में संगठित वैश्विक रणनीति विकसित नहीं कर पाया है।आईआईसीटी इस कमी को दूर करने की दिशा में एक संस्थागत प्रयास हो सकता है और भारत की सभ्यतागत कथा को वैश्विक डिजिटल मंच पर प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करने का माध्यम बन सकता है। रोजगार के संदर्भ में जहाँ प्रशन है तो मै स्पष्ट कर दुँ कि एवीजीसी-एक्सआर क्षेत्र भविष्य के सबसे बड़े अवसरों में से एक है।ओटीटी प्लेटफॉर्म,गेमिंग ,डिजिटल विज्ञापन,शिक्षा,स्वास्थ्य,रक्षा सिमुलेशन और मेटावर्स जैसे क्षेत्रों में रचनात्मक तकनीकी विशेषज्ञों की माँग बढ़ रही है।यह क्षेत्र पारंपरिक उद्योगों की तुलना में अधिक लचीला,वैश्विक और डिजिटल है,जहाँ भौगोलिक सीमाएं कम होती हैं और फ्रीलांस तथा रिमोट वर्क के माध्यम से वैश्विक बाजार से जुड़ने के अवसर उपलब्ध होते हैं।भारत के लिए यह विदेशी मुद्रा अर्जन,डिजिटल निर्यात और वैश्विक पहचान का नया मार्ग खोल सकता है,साथ ही ग्रामीण और छोटे शहरों के युवाओं को भी वैश्विक अवसरों से जोड़ सकता है।हालॉकि, इस उज्ज्वल भविष्य के साथ कुछ नीतिगत चुनौतियां भी जुड़ी हैं।गुणवत्ता और पैमाने की चुनौती,समावेशन की आवश्यकता और बौद्धिक संपदा तथा स्टार्टअप इकोसिस्टम का सुदृढ़ीकरण प्रमुख मुद्दे हैं।यदि आईआईसीटी में इनक्यूबेट हो रहे स्टार्टअप्स को नीति समर्थन,वित्त पोषण और वैश्विक बाजार तक पहुंच मिलती है, तो भारत क्रिएटिव टेक्नोलॉजी इनोवेशन का प्रमुख केंद्र बन सकता है। इसके साथ ही मजबूत कॉपी राइट,पेटेंट और कंटेंट राइट्स फ्रेमवर्क की आवश्यकता होगी, ताकि भारतीय रचनाकारों को उनके बौद्धिक श्रम का उचित लाभ मिल सके।आईआईसीटी के संदर्भ में यह भी विचारणीय है कि रचनात्मक अर्थव्यवस्था को केवल मनोरंजन उद्योग तक सीमित न रखा जाए। एआर/वीआर और गेमिंग तकनीकें शिक्षा,स्वास्थ्य रक्षा,पर्यटन और स्मार्ट सिटी जैसे क्षेत्रों में भी क्रांतिकारी परिवर्तन ला सकती हैं। यदि संस्थान इन क्षेत्रों के लिए इंटरडिसिप्लिनरी रिसर्च और प्रशिक्षण कार्यक्रम विकसित करता है,तो यह व्यापक डिजिटल अर्थ व्यवस्था का भी केंद्र बन सकता है तथा राष्ट्रीय विकास के बहु आयामी मॉडल को गति दे सकता है।भारत की जनसांख्यिकी संरचना इस समय निर्णायक मोड़ पर है।युवा जनसंख्या भारत के लिए अवसर भी है और चुनौती भी।यदि युवाओं को रोजगार और कौशल नहीं मिला,तो यह सामाजिक और आर्थिक बोझ बन सकती है।ऑरेंज इकोनॉमी इस चुनौती को अवसर में बदलने का माध्यम बन सकती है और आईआईसीटी जैसे संस्थान इस प्रक्रिया के अग्रदूत हो सकते हैं, बशर्ते इन्हें राष्ट्रीय स्तर पर विस्तार और दीर्घकालिक नीति समर्थन मिले।अततः इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ क्रिएटिव टेक्नोलॉजी को केवल एक शैक्षणिक परियोजना के रूप में नहीं,बल्कि भारत की नई आर्थिक रणनीति के प्रतीक के रूप में देखा जाना चाहिए।जिस प्रकार से आईआईटी और आईआईएम ने भारत की तकनीकी और प्रबंधन पहचान बनाई,उसी प्रकार आईआईसीटी भारत को रचनात्मक तकनीक और डिजिटल मनोरंजन के क्षेत्र में वैश्विक पहचान दिला सकता है।ऑरेंज इकोनॉमी भारत के लिए प्रगति का एक नया पथ खोल रही है-एक ऐसा पथ जो प्राकृतिक संसाधनों पर नहीं,बल्कि मानव रचनात्मकता और डिजिटल नवोन्मेष पर आधारित है। आईआईसीटी विकाश पथ की पहली आधारशिला होगी,वही अगर यह प्रयोग सफल होता है,तो भारत वैश्विक डिजिटल संस्कृति और क्रिएटिव टेक्नोलॉजी का निर्माता बन सकता है।यही भारत की विकास यात्रा का अगला अध्याय हो सकता है। (स्वतंत्र पत्रकार व स्तम्भकार) ईएमएस / 27 फरवरी 26