आज का वैश्विक परिदृश्य अस्थिरता और संघर्ष के संकटों से जूझता हुआ नजर आ रहा है। रुस और यूक्रेन के बीच लगातार जारी तनाव, इजराइल और हमास के बीच गाजा में संघर्ष, सीरिया संघर्ष, ईरान पर अमेरिकी हमले की आशंका, और अब पाकिस्तान एवं अफगानिस्तान के बीच सीमा पर सैन्य टकराव ने स्पष्ट कर दिया है कि दुनिया युद्ध के मुहाने पर खड़ी है। पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच डूरंड लाइन पर लगातार बढ़ते तनाव ने स्थिति को सीधे सैन्य संघर्ष में तब्दील कर दिया है। वैसे पाकिस्तान इन दिनों अशांति के चरम दौर से गुजर रहा है, ऐसे में उसका अफगानिस्तान से सीधा टक्कर लेना किसी बड़े झमेले में फंसने से कम नहीं है। तालिबान पर तरह-तरह के आरोप लगाकर एयरस्ट्राइक कर अपनी पीठ थपथपाने के बाद जो तस्वीर सामने आ रही है वह न सिर्फ चिंता में डालने वाली है बल्कि इंसानियत के नाते भयावह भी है। दरअसल पाकिस्तान को जवाब देते हुए अफगान सेना ने दावा किया है कि पाकिस्तानी चौकियों पर कब्जा कर 55 सैनिकों को मार गिराया और कई को बंदी बना लिया गया है। वहीं पाकिस्तान ने काबुल, कंधार और पक्तिका में हवाई हमले कर 130 से अधिक अफगान लड़ाकों को ढेर करने का दावा किया है। इससे पहले अफगानिस्तान कह चुका है कि पाकिस्तान ने आम नागरिकों को निशाना बनाया है, जिसमें मौतें भी हुई हैं। वहीं दूसरी तरफ पाकिस्तान ने ‘ऑपरेशन ग़ज़ब लिल हक’ के तहत तालिबान ठिकानों और चौकियों पर बमबारी की, जबकि अफगान प्रवक्ता ने पाकिस्तानी चौकियों और ब्रिगेड मुख्यालयों को निशाना बनाने का दावा किया। इस सैन्य संघर्ष में आम नागरिकों की जान पर सबसे ज्यादा खतरा मंडरा रहा है। शरणार्थी शिविरों पर मिसाइल हमलों से महिलाओं और बच्चों सहित दर्जनों घायल और मृत हुए हैं। दरअसल इस पूरे विवाद की जड़ 2,611 किलोमीटर लंबी डूरंड लाइन है, जिसे अफगानिस्तान कभी मान्यता नहीं देता। टीटीपी की गतिविधियाँ और मध्यस्थता के टूटने से सीमा पर हालात और नाजुक हो गए हैं। ऐसे समय में पाकिस्तान द्वारा भारत को इस संघर्ष में घसीटने की कोशिश ने क्षेत्रीय तनाव को और बढ़ा दिया है। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने तालिबान को भारत का ‘प्रॉक्सी’ करार देते हुए गंभीर आरोप लगाए हैं, जबकि कई विश्लेषक इसे आंतरिक असफलताओं और सीमा पर नियंत्रण खोने का ध्यान भटकाने वाला कदम मान रहे हैं। दक्षिण एशिया में यह तनाव वैश्विक शांति के लिए भी चिंता का विषय है। अगर यह संघर्ष और बढ़ा, तो क्षेत्रीय अस्थिरता और मानवीय संकट गहरा सकता है। अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच टकराव न केवल स्थानीय लोगों की सुरक्षा के लिए खतरनाक है, बल्कि वैश्विक तेल, वाणिज्य और निवेश पर भी असर डाल सकता है। आखिर यह कैसे भुलाया जा सकता है भारत की सीमा से लगे अधिकांश देशों में हिंसा बढ़ी है, जेन-जी क्रांति ने नेपाल और ढाका में तो सत्ता पलटने का काम भी किया है, ऐसे में पाकिस्तान और अफगानिस्तान का संघर्ष वाकई बड़ी चिंता पैदा करने वाला है। इसलिए वैश्विक स्तर पर शांति स्थापित करने के लिए कूटनीतिक प्रयासों का महत्व बढ़ गया है। बताया जा रहा है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने भरोसेमंद सहयोगियों जेरेड कुश्नर और स्टीव विटकॉफ को मध्यस्थता के लिए नियुक्त किया है। उन्होंने जिनेवा में ईरान, यूक्रेन और गाजा से संबंधित कई उच्चस्तरीय वार्ता की। ईरानी परमाणु समझौते और अमेरिका-इज़राइल संभावित हमलों को टालने के प्रयासों के अलावा, यूक्रेन-रूस संघर्ष में भी संवाद का रास्ता खोलने की कोशिश की गई। कुश्नर और विटकॉफ की सक्रियता यह दर्शाती है कि कूटनीति केवल सरकारी संस्थानों तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि व्यक्तिगत और व्यावसायिक नेटवर्क भी संकट समाधान में भूमिका निभा सकते हैं। हालांकि, इन प्रयासों में कई चुनौतियाँ हैं। गाजा, अफगानिस्तान और यूक्रेन के मुद्दे तकनीकी, ऐतिहासिक और सामाजिक जटिलताओं से भरे हुए हैं। एक ही समय में इन सभी समस्याओं का समाधान ढूंढना व्यावहारिक रूप से कठिन है। ऐसे में कहना गलत नहीं होगा कि निजी दूतों की भूमिका में पारदर्शिता की कमी और व्यावसायिक हितों का टकराव शांति प्रयासों में बाधक बन सकता है। फिलहाल, दुनिया शांति और युद्ध के बीच संवेदनशील संतुलन पर खड़ी है। युद्ध की संभावनाएँ केवल क्षेत्रीय नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर आर्थिक और मानव सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा हैं। ऐसे समय में अंतरराष्ट्रीय समुदाय की जिम्मेदारी है कि वह सभी पक्षों को संयम बरतने, नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने और विवादों को कूटनीतिक संवाद के माध्यम से सुलझाने के लिए प्रेरित करे। शांति की राह हमेशा आसान नहीं होती, लेकिन यही मानव सभ्यता के अस्तित्व को बचाए रखने की अंतिम कुंजी है। युद्ध की जटिलताओं और हिंसा के साये में मानवता के लिए यही चुनौती है कि हम सहयोग, संवाद और समझौते के रास्ते ढूंढें। यह केवल सरकारों का काम नहीं, बल्कि वैश्विक नागरिकों, संगठनों और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की साझा जिम्मेदारी बन गई है कि वे युद्ध के खतरे को कम करें और स्थायी शांति की दिशा में कदम आगे बढ़ाएँ। यहां यह भी न भूलें कि बेशक वर्तमान में दुनिया युद्ध के मुहाने पर खड़ी है, लेकिन यही वह समय है, जबकि हम शांति की बात करें, कूटनीति को प्राथमिकता दें और ऐसे कदम उठाएँ जिससे संघर्ष के अंधकार को रोका जा सके। यही मानवता की जिम्मेदारी और सबसे बड़ा उद्देश्य है। ईएमएस / 27 फरवरी 26