लेख
01-Mar-2026
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जो नित्य, अविनाशी, आदि पुरुष, परब्रह्म राम है वे ही हृदय में रहते हैं। प्रकट करने के लिए स्वयं को प्रयास करना होगा। दूसरे का इसमें कोई रोल नहीं है। अपका स्वरूप परमचेतन ब्रह्म है, उनसे प्रत्यक्ष होना स्वयं पर निर्भर है। उसको राम नहीं सत्य नाम कह कर सम्बोधित किया गया है आर्ष ग्रंथों में ऋषियों द्वारा और बाद के संतों ने भी अपनी शब्दों में सत्य नाम का वर्णन किया है यह जो उल्टा नाम जपे जग जाना यह कोई व्यक्ति विशेष का नाम नहीं यह नाम राम ही प्रभु को ही नाम कहा है उसी का सुमिरन सुरती को उलट कर संत अपने आत्मा में अनुभव करते हैं यह साधना का विषय है अनुभव का विषय है जीव सनातन ईश्वर का अंश है उसी प्रकृति के कारण सदैव आनन्द की तलास में रहता है। इस प्रकिया में कभी स्त्री पुत्र से तो कभी धन सम्पत्ति से तो कभी स्वादिष्ट पदार्थों से सदैव आनन्द प्राप्त करने में सतत् लगा रहता है, परंतु उपरोक्त सभी आनन्द क्षणिक होते हैं। और नये आनन्द के प्रयास में लग जाता है। जीवन के आखिरी क्षण तक सतत् यही प्रयास चलता रहता है। वास्तव में पदार्थों में आनन्द है ही नहीं केवल आनन्दका आभास है, वह उसे भोगने के बाद मिट जाता है। इसलिए जो आत्मानन्द जो स्वयं का स्वरूप है, जबतक इसमें स्थित नहीं होंगे तबतक पूर्ण आनन्द नहीं मिलेगा। अर्जुन के मनमें ऐसी धारणा हुई कि कुटुम्बियोंको मारना, और सो भी राज्यके लिये, बहुत ही निन्दनीय अधर्म है। महाभारत में अर्जुन साधारण पुरुषों के समान वह यह सोच रहा था कि इस युद्ध में ‘मैं मारनेवाला हूँ और ये सब मरनेवाले है। यह सोचकर वह युद्धसे उपरत हो गया। तब मैने रणभूमिमें बहुत -सी युक्तियाँ देकर वीरशिरोमणि अर्जुनको समझाया था। उस समय अर्जुनने भी मुझसे यही प्रश्न किया था, जो तुम कर रहे हो। उद्धवजी! मैं समस्त प्राणियोंका आत्मा, हितैषी, सुहृद् और ईश्वर—नियामक हूँ। मैं ही इन समस्त प्राणियों और पदार्थोंके रूपमें हूँ और इनकी उत्पत्ति, स्थिति एवं प्रलयका कारण भी हूँ। गतिशील पदार्थोंमें मैं गति हूँ। अपने अधीन करनेवालोंमें मैं काल हूँ। गुणोंमें मै उनकी मूलस्वरूपा साम्यावस्था हूँ और जितनेभी गुणवान् पदार्थ हैं, उनमें उनका स्वाभाविक गुण हूँ। गुणयुक्त वस्तुओंमें मैं क्रिया-शक्ति-प्रधान प्रथम कार्य सूत्रात्मा हूँ और महानोंमें ज्ञान-शक्ति प्रधान प्रथम कार्य महत्तत्व हूं। सूक्ष्म वस्तुओंमें मैं जीव हूँ और कठिनाईसे वशमें होनेवालों में मन हूँ।मैं वेदोंका अभिव्यक्ति स्थान हिरण्यगर्भ हूँ और मन्त्रोंमें तीन मात्राओं (अ+उ+म) वाला ओंकार हूँ। मैं अक्षरोंमें अकार, छन्दोंमें त्रिपदा गायत्री हूँ। समस्त देवताओंमें इन्द्र, आठ वसुओंमें अग्नि, द्वादश आदित्योंमें विष्णु और एकादश रुद्रोंमें नीललोहित नामका रुद्र हूँ। मैं ब्रह्मर्षियोंमें भृगु, राजर्षियोंमें मनु, देवर्षियोंमें नारद और गौओंमें कामधेनु हूँ। मैं सिद्धेश्वरोंमें कपिल, पक्षियोंमें गरुड़, प्रजापतियोंमें दक्ष प्रजापति और पितरोंमें अर्यमा हूँ। प्रिय उद्धव! मैं दैत्योंमें दैत्यराज प्रह्लाद, नक्षत्रोंमें चन्द्रमा, ओषधियोंमें सोमरस एवं यक्ष-राक्षसोंमें कुबेर हूं—ऐसा समझो। मैं गजराजोंमें ऐरावत, जल निवासियोंमें उनका प्रभु वरुण, तपने और चमकने वालोंमें सूर्य तथा मनुष्योंमें राजा हूँ। मैं घोड़ोंमें उच्चैःश्रवा, धातुओंमें सोना, दण्डधारियोंमें यम और सर्पोंमें वासुकि हूँ। निष्पाप उद्धवजी! मैं नागराजोंमें शेषनाग, सींग और दाढ़वाले प्राणियोंमें उनका राजा सिंह, आश्रमोंमें संन्यास और वर्णोंमें ब्राह्मण हूँ। मैं तीर्थ और नदियोंमें गंगा, जलाशयोंमें समुद्र, अस्त्र-शस्त्रों में धनुष तथा धनुर्धरोंमें त्रिपुरारि शंकर हूँ। अर्थात् सभी प्राणियोंके रूप में मैं ही सर्वत्र अनूकरूपों में व्याप्त हूं। मेरे सिवा दूसरा कुछ नहीं, मैं ही मारनेवाला और मैं ही मरनेवाला भी मैं ही हूं। पृथ्वी, वायु, आकाश, जल,तेज, अहंकार, महत्तत्व, पंचमहाभूत, जीव, अव्यक्त, प्रकृति, सत्त्व, रज, तम और उनसे परे रहनेवाला ब्रह्म—ये सब मैं ही हूँ। इन तत्त्वोंकी गणना, लक्षणों द्वारा उनका ज्ञान तथा तत्व ज्ञानरूप उसका फल भी मैं ही हूँ। मैं ही ईश्वर हूँ, मैं ही जीव हूँ, मैं ही गुण हूँ और मैं ही गुणी हूँ। मैं ही सबका आत्मा हूँ और मैं ही सब कुछ हूं। मेरे अतिरिक्त और कोई भी पदार्थ कहीं भी नहीं है। यदि मैं गिनने लगूँतो किसी समय परमाणुओंकी गणना तो कर सकता हूँ, परन्तु अपनी विभूतियोंकी गणना नहीं कर सकता। क्योंकि जब मेरे रचे हुए कोटि-कोटि ब्रह्माण्डोंकी भी गणना नहीं हो सकती, तब मेरी विभूतियोंकी गणना तो हो ही कैसे सकती है। ऐसा समझो कि जिसमें भी तेज, श्री, कीर्ति, ऐश्वर्य, लज्जा, त्याग, सौन्दर्य, सौभाग्य, पराक्रम, तितिक्षा और विज्ञान आदि श्रेष्ठ गुण हो, वह मेरा ही अंश है।जीव सनातन ईश्वर का अंश है उसी प्रकृति के कारण सदैव आनन्द की तलास में रहता है। इस प्रकिया में कभी स्त्री पुत्र से तो कभी धन सम्पत्ति से तो कभी स्वादिष्ट पदार्थों से सदैव आनन्द प्राप्त करने में सतत् लगा रहता है, परंतु उपरोक्त सभी आनन्द क्षणिक होते हैं। और नये आनन्द के प्रयास में लग जाता है। जीवन के आखिरी क्षण तक सतत् यही प्रयास चलता रहता है। वास्तव में पदार्थों में आनन्द है ही नहीं केवल आनन्द का आभास है, वह उसे भोगने के बाद मिट जाता है। इसलिए जो आत्मानन्द जो स्वयं का स्वरूप है, जबतक इसमें स्थित नहीं होंगे तबतक पूर्ण आनन्द नहीं मिलेगा।वो भगवान राम के नाम जपने और मर्यादा के पालन से अच्छे कर्म से मालूम होगा। (यह लेखक के व्य‎‎‎क्तिगत ‎विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अ‎निवार्य नहीं है) .../ 1 मार्च /2026