क्षेत्रीय
05-Mar-2026
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- बमोरी के गांवों में गल उत्सव की धूम मचान पर मन्नतधारियों ने लगाए श्रद्धा के फेरे लक्कड़ देवता के दर पर उमड़ा श्रद्धा का सैलाब गुना (ईएमएस)। चंबल और मालवा की सरहद पर बसे बमोरी क्षेत्र में होली के दूसरे दिन आदिवासी संस्कृति और अटूट आस्था का एक ऐसा रंग देखने को मिला, जो आधुनिकता के दौर में भी अपनी जड़ों से मजबूती से जुड़ा है। बुधवार को आदिवासी पटेलिया और भील समाज द्वारा पारंपरिक लक्कड़ देवता (गल देव) की विशेष पूजा-अर्चना की गई। इस दौरान मन्नत पूरी होने पर श्रद्धालुओं ने जमीन से 30 फीट की ऊंचाई पर मचान से झूलकर अपने आराध्य के प्रति कृतज्ञता प्रकट की। 3, 5 और 7 फेरों में श्रद्धा की डोर बमोरी ब्लॉक के डोमावन, भैंस टोरी, लीलझिरी, नागदा और रोयपुर जैसे आधा दर्जन गांवों में बुधवार से ही उत्सव का माहौल बन गया था। ढोल-मांदल की थाप और पारंपरिक लोकगीतों के बीच गल पूजन शुरू हुआ। इस परंपरा की सबसे रोमांचक और श्रद्धापूर्ण कड़ी वह है, जिसमें मन्नत पूरी होने वाले श्रद्धालु को लकड़ी के ऊंचे मचान (गल) पर चढ़ाया जाता है। यहाँ पेड़ों की छाल से बनी मजबूत रस्सियों के सहारे श्रद्धालु को बांधकर हवा में लटकाया जाता है और मन्नत के अनुसार उसे 3, 5 या 7 बार गोल चक्कर में घुमाया जाता है। क्या है गल और इसकी धार्मिक महत्ता? आदिवासी परंपराओं के जानकार रणविजय भूरिया बताते हैं कि गल असल में लकड़ी से बना एक ऊंचा मचान होता है। ग्रामीण क्षेत्रों में इसका उपयोग खेतों की रखवाली के लिए किया जाता है, लेकिन धार्मिक रूप से यह बाबादेव के प्रति समर्पण का प्रतीक है। जो लोग बीमारियों, दुखों या पारिवारिक परेशानियों से जूझ रहे होते हैं, वे लक्कड़ देवता से मन्नत मांगते हैं। मुराद पूरी होने पर वे अगले साल इसी ऊंचे मचान पर झूलकर यह संदेश देते हैं कि उनका जीवन और खुशियां ईश्वर की ही देन हैं। मेले जैसा माहौल, लोक नृत्य की गूंज नगदा और आसपास के गांवों में इस अवसर पर भव्य मेले जैसा नजारा रहा। हजारों की संख्या में समाजजन अपनी पारंपरिक वेशभूषा में सज-धजकर पहुंचे। जब मन्नतधारी व्यक्ति हवा में झूलता है, तो नीचे खड़े ग्रामीण और परिजन लोक धुनों पर थिरकते हुए उसका उत्साहवर्धन करते हैं। यह आयोजन न केवल एक धार्मिक अनुष्ठान है, बल्कि यह आदिवासी समाज की एकता, साहस और अपनी प्राचीन सांस्कृतिक विरासत को सहेजने का जीवंत उदाहरण भी है। देर शाम तक चले इस उत्सव में श्रद्धालुओं ने सुख-शांति और आगामी फसल के अच्छे होने की कामना की। - सीताराम नाटानी