खेती की अंतर्राष्ट्रीय तकनीक से हो रही खेती, दुनिया भर के विशेषज्ञ कर रहे तारीफ छिंदवाड़ा (ईएमएस)। पर्यावरण में तेजी से हो रहे बदलावों के कारण अब मौसम के हिसा बसे खेती की तकनीक में बदलाव बेहद जरूरी हो गया है। जलवायु अनुकूल खेती के जरिए जहां जमीन का गुणवत्ता स्तर भी बनाए रखना है वहीं किसानों की आय को भी बढ़ाना है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर खेती की नई तकनीक को विकसित करने के उद्देश्य से छिंदवाड़ा में किए जा रहे इसके प्रयोग अब दुनिया भर के लिए माडल बनते जा रहे हैं। अंतराष्ट्रीय स्तर की तकनीके के साथ दुनिया भर में इस क्षेत्र के विशेषज्ञ वैज्ञानिक यहां आ रहे हैं। अंतर्राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान संस्थान बोरलॉग इंस्टीट्यूट फॉर साउथ एशिया और मध्य प्रदेश कृषि विभाग के संयुक्त प्रयासों से अब आधुनिक कृषि तकनीक सीधे किसानों के खेतों तक पहुँच रही है। गत दिवस मोहखेड़ के ग्राम चारगांव करबल में गेहूं की उन्नत और जलवायु अनुकूल किस्मों पर आधारित क्षेत्र का भ्रमण प्रसिद्ध कृषि वैज्ञानिक और बीसा के प्रबंध निदेशक डॉ बीएम प्रसन्ना के मार्गदर्शन मे हुआ जो अंतरराष्ट्रीय कृषि अनुसंधान को किसानों तक पहुंचाने की पहल को आगे बढ़ा रहे हैं। सुपर सीडर पद्धति, जीरो टिलेज यानि शून्य जुताई व पारंपरिक बुवाई पद्धति के रिजल्ट यहां किसानों को दिखाए गए। इसका उद्देश्य किसानों को खेत में ही तकनीकों के परिणाम दिखाना था, ताकि वे स्वयं तुलना कर बेहतर पद्धति अपनाने का निर्णय ले सकें। बीसा के तकनीकी सहायक दीपेंद्र सिंह ने किसानों को गेहूं की नवीन और जलवायु अनुकूल किस्मों ॥ढ्ढ-1636, ष्ठक्चङ्ख-303, ड्डह्म्द्ब-327 और ष्ठक्चङ्ख-187—के बारे में विस्तार से जानकारी दी। किसानों को खेतों का भ्रमण करवाते हुए तीन अलग-अलग बुवाई पद्धतियों का प्रदर्शन कराया गया। विशेषज्ञों का मानना है कि क्चढ्ढस््र और कृषि विभाग के संयुक्त प्रयासों से छिंदवाड़ा में जलवायु अनुकूल खेती का मॉडल विकसित हो रहा है। ये कार्यक्रम किसानों को नई तकनीकों से जोड़कर खेती को अधिक लाभदायक और टिकाऊ बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। लागत मूल्य में हो रही बचत खेत भ्रमण के दौरान किसानों ने विशेष रूप से जीरो टिलेज तकनीक में रुचि दिखाई। ग्राम चारगांव करबल के प्रगतिशील किसान रघुवर भादे ने बताया कि इस पद्धति से उन्हें प्रति एकड़ लगभग 2500 रुपए की सीधी बचत हुई है। सिंचाई के पानी की खपत कम हुई, बीज की मात्रा लगभग आधी लगती है और पराली जलाने की समस्या से राहत मिली है। उनके अनुसार यह तकनीक, खेती की लागत घटाने और पर्यावरण संरक्षण दोनों के लिए उपयोगी है। किसानों ने आधुनिक तकनीकों को खेत में देखकर उन्हें उत्साहपूर्वक अपनाने की इच्छा जताई। विभागीय अधिकारियों ने भी दी जानकारी कार्यक्रम में कृषि विभाग और आत्मा परियोजना के अधिकारियों ने भी किसानों को विभिन्न योजनाओं और आधुनिक खेती के तरीकों की जानकारी दी। वरिष्ठ कृषि विकास अधिकारी डीएस घाघरे ने सरकारी योजनाओं के बारे में बताया। आत्मा परियोजना की बीटीएम प्रिया कराडे ने प्राकृतिक खेती के लाभ समझाए। कृषि विस्तार अधिकारी बीएल सरेआम ने प्रभावी नरवाई प्रबंधन के उपाय बताए। ईएमएस/मोहने/ 05 मार्च 2026