लेख
06-Mar-2026
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नीतीश कुमार भारतीय राजनीति के एक ऐसे विलक्षण चरित्र हैं, जिन्हें इतिहास क्या हो सकता था और क्या हो गए के बीच के द्वंद्व के रूप में याद रखेगा। 2005 में जब उन्होंने बिहार की सत्ता संभाली, तो वह केवल एक मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि आधुनिक भारत के एक नए विजन और सुशासन के प्रतीक बनकर उभरे थे। 2005 से 2010 का वह स्वर्ण काल आज भी बिहार के मानस पटल पर अंकित है, जब उन्होंने जंगलराज की राख से एक नए बिहार की नींव रखी थी। उस दौर में नीतीश कुमार का कद इतना विराट था कि उन्हें प्रधानमंत्री पद का सबसे स्वाभाविक और योग्य दावेदार माना जाता था। उनकी तुलना अक्सर बड़े सुधारकों से की जाती थी, लेकिन आज का परिदृश्य कुछ और ही कहानी बयां करता है। नीतीश की सबसे बड़ी ताकत उनका प्रशासनिक विजन था। उन्होंने दिखा दिया था कि इच्छाशक्ति हो तो बिहार जैसे जटिल राज्य की कानून-व्यवस्था को बदला जा सकता है। सड़कों का जाल बिछाना, स्कूल की बच्चियों को साइकिल बांटकर सामाजिक क्रांति लाना और पंचायत चुनावों में महिलाओं को आरक्षण देना—ये उनके ऐसे मास्टरस्ट्रोक थे जिन्होंने उन्हें विकास पुरुष की उपाधि दी। उन्होंने राजनीति को जाति के दलदल से निकालकर विकास की मेज पर लाने की गंभीर कोशिश की थी। नीतीश कुमार में एक राष्ट्रीय नेता बनने की हर खूबी मौजूद थी—साफ सुथरी छवि, प्रशासनिक अनुभव और धर्मनिरपेक्ष साख। लेकिन 2013 के बाद उनकी राजनीति ने एक ऐसी करवट ली, जिसने उनकी विश्वसनीयता पर बड़े सवाल खड़े कर दिए। नरेंद्र मोदी के उदय के विरोध में एनडीए छोड़ना और फिर बार-बार गठबंधन बदलना उनकी राजनीति का टर्निंग पॉइंट साबित हुआ। यहीं से सुशासन बाबू की छवि धीरे-धीरे एक संकीर्ण पहचान में तब्दील होने लगी। एक ऐसा नेता जो कभी देश को दिशा देने की क्षमता रखता था, वह अपनी कुर्सी बचाने के लिए छोटे-छोटे समीकरणों में उलझ कर रह गया। नीतीश कुमार की सबसे बड़ी कमी उनकी अति-व्यावहारिकता रही, जो अंततः अवसरवाद के रूप में दिखने लगी। सत्ता के शीर्ष पर बने रहने की उनकी चाहत ने उनके वैचारिक आधार को कमजोर कर दिया। जब कोई नेता बार-बार अपने सिद्धांतों के विपरीत पाले बदलता है, तो वह जनता का विश्वास खो देता है। उनकी राजनीति धीरे-धीरे समावेशी विकास से हटकर केवल उत्तरजीविता की राजनीति बन गई। उन्होंने खुद को एक ऐसे घेरे में सीमित कर लिया जहाँ उनके पास न तो कोई बड़ा वैचारिक आधार बचा और न ही एक कड़क विद्रोही का तेवर। विशेष रूप से भाजपा के साथ उनके संबंधों का ग्राफ उनकी राजनीतिक गिरावट की सबसे बड़ी गवाह है। एक दौर वह था जब भाजपा में नीतीश कुमार का कद इतना बड़ा था कि उन्हें सिर-आंखों पर बिठाया जाता था। बिहार में भाजपा उनके पीछे खड़ी रहती थी और राष्ट्रीय स्तर पर वे एनडीए के सबसे प्रभावशाली चेहरे माने जाते थे। तब भाजपा उन्हें बड़ा भाई मानती थी और उनकी हर शर्त स्वीकार्य होती थी। लेकिन आज स्थिति बिल्कुल उलट है। बार-बार गठबंधन बदलने और अपनी विश्वसनीयता खोने के कारण आज वे भाजपा के लिए केवल एक रणनीतिक आवश्यकता बनकर रह गए हैं। कल तक जो नीतीश भाजपा की दिशा तय करते थे, आज वे भाजपा की बिछाई हुई बिसात पर एक मोहरे के समान नजर आते हैं। अब गठबंधन में शर्तें वे नहीं, बल्कि भाजपा तय करती है। यह एक सशक्त नेता का धीरे-धीरे हुआ वह अवसान है, जहाँ जिस भाजपा को वे कभी चुनौती देते थे, आज उसी की छत्रछाया में अपनी राजनीतिक आयु बढ़ाने को मजबूर हैं। यह एक विडंबना ही है कि जो नेता जातिवाद को खत्म करने की बात करता था, अंत में वह स्वयं जातीय गणना और छोटे कबीलाई वोट बैंक की राजनीति के इर्द-गिर्द सिमट गया। विकास का बड़ा कैनवास अब गठबंधन के जोड़-तोड़ की छोटी फाइलों में दब गया है। जब नीतीश कुमार भविष्य में पीछे मुड़कर देखेंगे, तो उन्हें निश्चित रूप से उस खोए हुए अवसर का मलाल होगा, जहाँ वह भारत के एक बड़े विकल्प का नेतृत्व कर सकते थे। इतिहास नीतीश कुमार का मूल्यांकन एक अधूरी क्रांति के नायक के रूप में करेगा। उन्हें एक ऐसे मुख्यमंत्री के रूप में याद किया जाएगा जिसने बिहार को चलना सिखाया, लेकिन खुद को दौड़ने से रोक लिया। उनका अंत इस बात का प्रमाण है कि वह बहुत बड़ी सफलता के करीब पहुंचकर अपनी ही अस्थिरता की भेंट चढ़ गए। समय उन्हें एक कुशल प्रशासक तो मानेगा, लेकिन एक ऐसा राजनेता भी कहेगा जिसने अपनी महानता को अवसरवाद के भंवर में खो दिया। उनका राजनीतिक अवसान एक व्यक्ति का अंत नहीं, बल्कि एक उस बड़ी उम्मीद का अंत है जिसे करोड़ों लोगों ने अपनी आंखों में सजाया था। (लेखक पत्रकार हैं) ईएमएस / 06 मार्च 26