लेख
06-Mar-2026
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(7 मार्च दिवस विशेष आलेख) अनाजों के महत्व, पोषण और खाद्य सुरक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से प्रतिवर्ष 7 मार्च को विश्व अनाज दिवस (वर्ल्ड सीरियल डे) मनाया जाता है। यहां पाठकों को बताता चलूं कि ‘सीरियल’ शब्द की उत्पत्ति प्राचीन रोमन देवी सेरेस के नाम से हुई है। दरअसल, रोमन पौराणिक कथाओं में सेरेस को खेती, फसल और मातृत्व की देवी माना जाता था और उन्हीं के सम्मान में अनाज को ‘सीरियल’ कहा जाने लगा। वैसे, गेहूं, चावल, मक्का, जौ और जई जैसे खाद्यान्न सीरियल्स की श्रेणी में आते हैं। विश्व अनाज दिवस वस्तुतः खाद्य सुरक्षा की नींव को रेखांकित करता है। कहना ग़लत नहीं होगा कि गेहूं, चावल, मक्का, जौ और बाजरा जैसे अनाज केवल भोजन नहीं, बल्कि मानव सभ्यता के आधार स्तंभ हैं। उल्लेखनीय है कि आज विश्व की आधी से अधिक आबादी की दैनिक ऊर्जा आवश्यकताएँ मुख्यतः तीन अनाजों-गेहूं, चावल और मक्का से ही पूरी होती हैं। यदि अनाज न हों, तो वैश्विक खाद्य सुरक्षा की कल्पना भी संभव नहीं। आज जब दुनिया जलवायु परिवर्तन, जनसंख्या वृद्धि और भूख जैसी चुनौतियों का लगातार सामना कर रही है, तब अनाजों का महत्व और बढ़ जाता है। आज तापमान में वृद्धि, अनियमित वर्षा और सूखा जैसी परिस्थितियाँ विशेषकर गेहूं और चावल की पैदावार को प्रभावित कर रही हैं। ऐसे में टिकाऊ कृषि पद्धतियाँ अपनाना समय की आवश्यकता है। भारत के संदर्भ में देखें तो हमारा देश विश्व के प्रमुख गेहूं और चावल उत्पादक देशों में शामिल है। सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) के माध्यम से करोड़ों लोगों तक सस्ती दरों पर अनाज पहुँचाया जाता है। हाल के वर्षों में मोटे अनाज-जैसे बाजरा, ज्वार और रागी आदि को पुनः प्रोत्साहित किया जा रहा है, क्योंकि ये पोषक तत्वों से भरपूर होने के साथ-साथ कम पानी में भी उगाए जा सकते हैं। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि भारत की पहल पर संयुक्त राष्ट्र महासभा ने वर्ष 2023 को ‘अंतरराष्ट्रीय मिलेट्स वर्ष’ घोषित किया, जिससे वैश्विक स्तर पर मोटे अनाजों के महत्व को नई पहचान मिली। विश्व अनाज दिवस का उद्देश्य केवल उत्पादन बढ़ाना नहीं, बल्कि अनाजों के पोषण मूल्य, खाद्य अपव्यय रोकने, संतुलित आहार अपनाने और किसानों के परिश्रम के सम्मान के प्रति जागरूकता फैलाना भी है। वास्तव में यह दिवस कुपोषण और भूख की समस्या को कम करने, टिकाऊ कृषि (सस्टेनेबल एग्रीकल्चर) को बढ़ावा देने तथा खाद्य सुरक्षा में किसानों की भूमिका को रेखांकित करता है। इतिहास की दृष्टि से जौ को दुनिया के सबसे प्राचीन खेती किए गए अनाजों में से एक माना जाता है, जिसके प्रमाण लगभग 10,000 वर्ष पुराने मिलते हैं। इतिहासकारों का मत है कि मिस्र, मेसोपोटामिया और सिंधु घाटी जैसी प्राचीन सभ्यताओं का विकास कृषि, विशेष रूप से अनाज उत्पादन, के कारण ही संभव हुआ। आज बाजरा, ज्वार और रागी जैसे मोटे अनाजों को ‘फ्यूचर फूड’ कहा जा रहा है। ये प्रायः ग्लूटेन-रहित होते हैं और आयरन व कैल्शियम जैसे पोषक तत्वों से समृद्ध होते हैं। पर्यावरणीय दृष्टि से भी कुछ अनाज अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं। उदाहरण के लिए, ‘पेरेनियल ग्रेन्स’ (बारहमासी अनाज) ऐसी फसलें हैं जिन्हें हर वर्ष दोबारा बोने की आवश्यकता नहीं पड़ती। इनकी गहरी जड़ें मिट्टी के कटाव को रोकती हैं और कार्बन अवशोषण में सहायक होती हैं। पाठक जानते होंगे कि मक्का विश्व में सर्वाधिक उगाई जाने वाली फसल है, किंतु इसका बड़ा हिस्सा प्रत्यक्ष भोजन के बजाय एथेनॉल (ईंधन) और पशु आहार के रूप में प्रयुक्त होता है। यह भी उल्लेखनीय है कि विश्व में उत्पादित अनाज का बड़ा भाग भंडारण और परिवहन के दौरान नष्ट हो जाता है। यदि इस अपव्यय को रोका जाए तो करोड़ों लोगों की भूख मिटाई जा सकती है। 19वीं सदी के अंत में डॉ. जॉन हार्वे केलॉग ने कॉर्नफ्लेक्स जैसे ब्रेकफास्ट सीरियल का आविष्कार किया था। उनका उद्देश्य इसे सादा और स्वास्थ्यवर्धक भोजन के रूप में प्रस्तुत करना था, ताकि लोग अत्यधिक मसालेदार और गरिष्ठ भोजन से बच सकें। अनाज ऊर्जा, फाइबर, विटामिन और खनिजों का महत्वपूर्ण स्रोत हैं। विश्व की बड़ी आबादी का मुख्य भोजन अनाज ही है, जिनमें गेहूं और चावल का उपभोग सर्वाधिक होता है। जलवायु परिवर्तन का अनाज उत्पादन पर सीधा प्रभाव पड़ रहा है, जिससे खाद्य सुरक्षा की चुनौतियाँ और गंभीर हो सकती हैं। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि ‘विश्व खाद्य दिवस’ प्रतिवर्ष 16 अक्टूबर को मनाया जाता है। यह दिवस 16 अक्टूबर 1945 को स्थापित खाद्य और कृषि संगठन (एफएओ) की स्थापना की स्मृति में मनाया जाता है, जो संयुक्त राष्ट्र की एक विशेषीकृत एजेंसी है। भोजन का अधिकार 1948 की सार्वभौमिक मानवाधिकार घोषणा-पत्र द्वारा मान्यता प्राप्त है। वर्ष 2025 में विश्व खाद्य दिवस की थीम थी-बेहतर भोजन और बेहतर भविष्य साथ-साथ। भारत में अन्न उत्पादन की स्थिति सुदृढ़ हुई है। आंकड़े बताते हैं कि पिछले दशक में देश का अन्न उत्पादन लगभग 90 मिलियन मीट्रिक टन बढ़ा है। इतना ही नहीं, फल और सब्ज़ियों का उत्पादन भी 64 मिलियन मीट्रिक टन से अधिक बढ़ा है। भारत दूध और बाजरा (मिलेट्स) के उत्पादन में विश्व में प्रथम स्थान पर है, जबकि मछली, फल और सब्ज़ियों के उत्पादन में दूसरा स्थान रखता है। वर्ष 2014 के बाद से शहद और अंडे का उत्पादन दोगुना हो चुका है। भारत सरकार की प्रमुख पहलों में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013; प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना; पीएम पोषण योजना; अंत्योदय अन्न योजना; राइस फोर्टिफिकेशन तथा प्राइस स्टेबिलाइज़ेशन फंड (पीएसएफ) शामिल हैं, जो खाद्य और पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करने की प्रतिबद्धता को सुदृढ़ करती हैं। इसी क्रम में ‘विश्व दलहन दिवस’ (वर्ल्ड पल्सेस डे) प्रतिवर्ष 10 फरवरी को मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 2016 को ‘अंतरराष्ट्रीय दलहन वर्ष’ घोषित किया था। दालें न केवल पोषण का केंद्र हैं, बल्कि ‘क्लाइमेट-स्मार्ट’ फसलें भी मानी जाती हैं, क्योंकि इनमें नाइट्रोजन फिक्सेशन की क्षमता होती है। इनके पौधों की जड़ों में उपस्थित बैक्टीरिया वायुमंडलीय नाइट्रोजन को अवशोषित कर मिट्टी की उर्वरता बढ़ाते हैं, जिससे कृत्रिम उर्वरकों पर निर्भरता कम होती है। पर्यावरणीय दृष्टि से दालों का जल पदचिह्न(वाटर फुटप्रिंट) अत्यंत कम है।एक उपलब्ध जानकारी के अनुसार जहाँ एक किलोग्राम बीफ उत्पादन में लगभग 15,000 लीटर पानी की आवश्यकता होती है, वहीं उतनी ही मात्रा में दाल उगाने के लिए केवल 50 से 200 लीटर पानी पर्याप्त होता है। पोषण के स्तर पर दालें प्रोटीन का सस्ता और प्रभावी स्रोत हैं। इनमें अनाज की तुलना में दो से तीन गुना अधिक प्रोटीन तथा आयरन, जिंक और फाइबर प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। शून्य कोलेस्ट्रॉल और कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स के कारण ये हृदय रोग और मधुमेह प्रबंधन में सहायक हैं। वैश्विक परिदृश्य में भारत की भूमिका विशिष्ट है। भारत विश्व की लगभग 25% दालों का उत्पादक और 27% उपभोक्ता है। वर्ष 2026 के हालिया आँकड़ों के अनुसार, भारत चना और मूंग जैसी प्रमुख दालों में आत्मनिर्भरता की दिशा में तेज़ी से अग्रसर है। कभी ‘गरीबों का प्रोटीन’ कही जाने वाली दालें आज ‘भविष्य का भोजन’ मानी जा रही हैं। अंततः, विश्व अनाज दिवस हमें यह संदेश देता है कि अनाज केवल भोजन नहीं, बल्कि मानव सभ्यता, अर्थव्यवस्था और पर्यावरण संतुलन की आधारशिला हैं। जलवायु परिवर्तन और बढ़ती जनसंख्या के दौर में इनका संरक्षण, टिकाऊ उत्पादन और खाद्य अपव्यय पर नियंत्रण अत्यंत आवश्यक है। आइए, हर दाने का सम्मान करें और सुरक्षित, पोषित एवं समृद्ध भविष्य के निर्माण का संकल्प लें। (सुनील कुमार महला, फ्रीलांस राइटर, कॉलमिस्ट व युवा साहित्यकार, पिथौरागढ़, उत्तराखंड। ) ईएमएस / 06 मार्च 26