राज्य
07-Mar-2026
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* मधुमक्खी पालन से शुरू हुई यात्रा आज सफल ग्रामीण उद्योग तक पहुँची * ‘सह्याद्री सखी मंडल’ के माध्यम से प्राकृतिक उत्पादों का उत्पादन और महिला सशक्तिकरण का उदाहरण नवसारी (ईएमएस)| “स्त्री शक्ति ही समाज की सच्ची शक्ति है” - इस कहावत को सही अर्थों में साकार किया है दक्षिण गुजरात के नवसारी जिले के चिखली तालुका के सोलधरा गांव की अस्मिता अशोकभाई पटेल ने। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर उनकी आत्मनिर्भरता की कहानी जानकर आश्चर्य होता है कि एक साधारण किसान परिवार से आने वाली अस्मिताबेन आज अपना उद्योग चलाकर अन्य 10 महिलाओं को भी आत्मनिर्भर बना रही हैं। उनका यह प्रयास देश के प्रधानमंत्री के “आत्मनिर्भर भारत मिशन” को भी साकार करता है। उल्लेखनीय है कि अप्रैल 2026 में सूरत में वाइब्रेंट गुजरात रीजनल कॉन्फ्रेंस (वीजीआरसी) – दक्षिण गुजरात का आयोजन होने जा रहा है। इस सम्मेलन में स्थानीय महिला स्वयं सहायता समूहों और ग्रामीण उद्यमियों को वैश्विक बाजार से जोड़ने पर विशेष जोर दिया जाएगा। यह मंच अस्मिताबेन जैसी महिला उद्यमियों को अपनी क्षमता दिखाने के नए अवसर प्रदान करेगा। * मधुमक्खी पालन से आत्मनिर्भरता की शुरुआत गुजरात के चिखली तालुका के सोलधरा गांव में जन्मी अस्मिताबेन पटेल किसान परिवार में पली-बढ़ीं। बचपन से ही उन्हें खेती और पशुपालन का अनुभव मिला। एटीडी (आर्ट टीचर डिप्लोमा) की पढ़ाई के दौरान उनके पिता का निधन हो गया, लेकिन प्रगतिशील सास-ससुर और उनके आत्मविश्वास ने उन्हें आगे बढ़ने की ताकत दी। विवाह के बाद भी उन्होंने बी.ए. की डिग्री पूरी की और सीखने की प्रक्रिया जारी रखी। खेती की सीमित आय के कारण घर चलाना कठिन हो रहा था। ऐसे समय में वर्ष 2010-11 में उन्होंने मधुमक्खी पालन का प्रशिक्षण लिया और घर से ही शहद का उत्पादन शुरू किया। धीरे-धीरे बाजार में इसकी बिक्री होने लगी। इसके बाद 2014 में उन्होंने नवसारी कृषि विश्वविद्यालय से बेकरी कोर्स भी किया। सीखने और आगे बढ़ने का यही जज़्बा उनकी पहचान बन गया। * ‘सह्याद्री सखी मंडल’ – 10 महिलाओं का एक सपना वर्ष 2015 में ग्राम विकास अधिकारियों के मार्गदर्शन में अस्मिताबेन ने 10 महिलाओं के साथ मिलकर “सह्याद्री सखी मंडल” की स्थापना की। शुरुआत में आम, नींबू और करोंदा के अचार तथा अन्य मौसमी उत्पाद बनाए जाने लगे। मिशन मंगलम योजना के तहत रु. 15,000 का रिवॉल्विंग फंड मिलने पर रागी (नागली) आधारित उत्पाद, पापड़, बिस्किट और आटा बनाना शुरू किया गया। इन उत्पादों को स्थानीय, जिला और क्षेत्रीय कृषि मेलों में प्रदर्शित और बेचा जाने लगा। इसके बाद रु. 2,00,000 का ऋण लेकर हल्दी प्रोसेसिंग और पीसने की मशीन खरीदी गई, जिससे प्राकृतिक हल्दी पाउडर का उत्पादन शुरू हुआ। आज सह्याद्री सखी मंडल की महिलाएं मिलकर प्राकृतिक और हस्तनिर्मित खाद्य उत्पाद तैयार करती हैं। समूह की कुछ महिलाएं घर से शहद की पैकिंग और प्रोसेसिंग करती हैं, जबकि अन्य महिलाएं अचार, आंवला कैंडी, नागली वेफर और बांस से बने हस्तशिल्प उत्पाद तैयार करती हैं। ये उत्पाद स्थानीय बाजार के साथ-साथ राज्य और राष्ट्रीय स्तर के “सरस मेले” में भी प्रदर्शित और बेचे जाते हैं। आज अस्मिताबेन की वार्षिक आय लगभग रु. 10.20 लाख है। वे केवल “लखपति दीदी” ही नहीं, बल्कि अपने गांव और समाज में एक प्रेरणादायक मार्गदर्शक बन चुकी हैं। वे अपनी सफलता का श्रेय मिशन मंगलम योजना और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा ग्रामीण महिलाओं के लिए किए गए प्रयासों को देती हैं। * राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (एनआरएलएम) के अंतर्गत किए गए उनके कार्यों को राष्ट्रीय स्तर पर सराहना मिली है। उन्हें प्रधानमंत्री से तीन बार मिलने का अवसर भी प्राप्त हुआ है। इसके अलावा उन्हें गुजरात सरकार की ओर से “कृषि रत्न पुरस्कार” और अप्रैल 2015 में जिला स्तर पर कृषि टेक्नोलॉजी मैनेजमेंट एजेंसी (एटीएमए) अवॉर्ड भी मिला है। * सह्याद्री की तरह मजबूत प्रेरणा अस्मिताबेन पटेल की यात्रा केवल व्यक्तिगत सफलता की कहानी नहीं है, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था, महिला सशक्तिकरण और सतत विकास का एक मजबूत मॉडल है। सह्याद्री सखी मंडल के माध्यम से स्थानीय कच्चे माल, पारंपरिक कौशल और प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग कर रोजगार सृजन का एक अनोखा उदाहरण प्रस्तुत किया गया है। * अस्मिताबेन गर्व से कहती हैं: “जैसे एक मजबूत पेड़ की जड़ें एकता में होती हैं और उसकी शाखाएं अवसर मिलने पर फैलती जाती हैं, उसी तरह हमारा समूह भी आज मजबूत होकर आगे बढ़ रहा है।” उनकी यह स्व-रोजगार की यात्रा साबित करती है कि जब महिलाएं एक साथ जुड़ती हैं, तो उनका विकास घर से समाज और समाज से पूरे देश तक पहुंचता है। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर ऐसी ‘लखपति दीदियों’ को सलाम, जो मिट्टी से उठकर सह्याद्री की तरह मजबूत बनकर समाज में परिवर्तन की नई कहानी लिख रही हैं। सतीश/07 मार्च