सारी दुनिया में आर्थिक मंदी की आशंका अमेरिका और इजरायल ने ईरान के ऊपर हमला किया। इस हमले में ईरान को बड़ा नुकसान हुआ, इससे इनकार नहीं किया जा सकता है। इस युद्ध में सबसे बड़ा नुकसान ईरान के सुप्रीमो और शिया समुदाय के सबसे बड़े धार्मिक गुरु आयतुल्लाह खामेनेई और लगभग दो दर्जन से अधिक ईरान के प्रमुख नेता इस युद्ध में शहीद हो गए हैं। जिसके कारण युद्ध ने विकराल स्वरूप धारण कर लिया है। इस युद्ध में इजरायल और अमेरिका को बड़ा नुकसान होने जा रहा है, जिसकी कल्पना अमेरिका और इजरायल ने शायद नहीं की थी। अमेरिका ने खाड़ी देशों में सैन्य बल स्थापित करके खाडी देशों को सुरक्षा देने के नाम पर हर साल अरबो रुपए वसूल किये थे। जब सुरक्षा का समय आया, तब अमेरिका खाड़ी देशों की सुरक्षा नहीं कर पाया। ईरान के ड्रोन और मिसाइलों ने बड़े पैमाने पर खाडी देशों के अमेरिकी सैन्य ठिकानों को नष्ट कर दिया। खाडी देशों को उनके हाल पर छोड़कर अमेरिका खुद अपने बचाव में लग गया। खाड़ी देशों का आयात और निर्यात व्यापार पूरी तरह से ठप्प हो गया है। खाड़ी देशों के शासको को लग रहा है, पिछले कई दशक से अमेरिका उन्हें सुरक्षा के नाम पर लूट रहा था। सुरक्षा देने के नाम पर अरब देशों का शोषण, आपस में लड़ाकर, अमेरिका अपना आर्थिक हित साधकर उल्लू सीधा कर रहा था। खाड़ी देशों के शासक अब अमेरिका पर भड़क रहे हैं। इजरायल और अमेरिका ने अपने निजी हितों को ध्यान में रखते हुए जिस तरह से ईरान के ऊपर हमला थोपा है, इसके बाद वैश्विक अर्थव्यवस्था लगभग तीन दशक पीछे जाती हुई दिख रही है। तेल की कीमतों में भारी वृद्धि देखने को मिल रही है। प्राकृतिक गैस की कमी विश्व के अधिकांश देशों में हो चुकी है। पिछले कई वर्षों से रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध चल रहा है। इसके चलते पूरी दुनिया में अराजकता की स्थिति बनी हुई थी। अमेरिका के 70 फ़ीसदी लोगों का मानना है, यह युद्ध अमेरिका का नहीं है। अमेरिकी नागरिक और विपक्षी दल इस युद्ध का विरोध कर रहे हैं। इस युद्ध के कारण वैश्विक अर्थ व्यवस्था बुरी तरह से प्रभावित हुई है। दुनिया में आर्थिक मंदी की संभावना तेजी के साथ बढ़ती चली जा रही है। 1993 में वैश्विक व्यापार संधि लागू होने के बाद सारी दुनिया के देशों में एक दूसरे से व्यापार करने तथा विकास के लिए ऋण लेकर विकास कार्य शुरू होने से अर्थ व्यवस्था बड़ी तेजी के साथ बढ़ी थी। वह व्यवस्था ध्वस्त होती हुई दिख रही है। जिन देशों ने वैश्विक वित्तीय संस्थानों से बड़ी मात्रा में कर्जा लिया है। नागरिकों को भी बड़े पैमाने पर पिछले 20 वर्षों में कर्ज दिया गया है। कर्ज की अर्थव्यवस्था के कारण पिछले 30 सालों में दुनिया का व्यापार और व्यवसाय कई गुना बढ़ गया था। उधार की अर्थव्यवस्था चरम पर है। वर्तमान स्थिति में सरकारों और नागरिकों को ब्याज और मूल चुकाना मुश्किल हो रहा है। ऐसी स्थिति में रूस-यूक्रेन युद्ध, इजराइल-फिलिस्तीन युद्ध के चलते पहले ही अर्थव्यवस्था डंवाडोल हो रही थी। रही सही कसर अमेरिका-इजराईल ईरान के युद्ध ने पूरी कर दी है। अमेरिका ने ईरान के खिलाफ यह युद्ध शुरू क्यों किया है। इसका कारण स्पष्ट नहीं है। अंतरराष्ट्रीय परमाणु एजेंसी ने जांच के बाद स्पष्ट कर दिया था, ईरान कोई परमाणु बम नहीं बना रहा है। इसके बाद भी इजराइल के उकसाने पर अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप युद्ध में शामिल हुए हैं। इससे अमेरिका की जनता में नाराजी देखने को मिल रही है। माना जा रहा है, एपिस्टीन फाइल में अमेरिका के वर्तमान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का भी नाम है। 13 साल की नाबालिग लड़की का उन्होंने यौन शोषण किया था। एपस्टीन के साथ ट्रंप के बड़े अंतरंग संबंध थे। नाबालिग बच्चों के यौन शोषण के आरोप में अमेरिका की न्यायालय में जांच चल रही है। इससे बचने के लिए डोनाल्ड ट्रंप ने युद्ध को छेड़ा है, यह आरोप उनके ऊपर लग रहा है। भारत में भी एपस्टीन फाइल मे हरदीप पुरी अनिल अंबानी और कई अन्य नेताओं के नाम होने से भारत पर भी इसी तरह के आरोप हैं। एपस्टीन फाइल मे नाम होने से बचने के लिए भारत का राजतंत्र इजराइल और अमेरिका का साथ देकर भारतीय विदेश नीति का उल्लंघन कर रहा है। जिस तरह की स्थिति वर्तमान में बनती चली जा रही है, उससे तीसरे विश्व युद्ध की आशंका भी गहराने लगी है। सारी दुनिया के देशों में आर्थिक मंदी की संभावना बढ़ गई है। कच्चे तेल के दाम 60 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर एक सप्ताह के अंदर 83 डॉलर पर पहुंच गए हैं। तेल-गैस के दाम बढ़ने का सबसे बड़ा असर महंगाई पर पड़ रहा है। महंगाई और बेरोजगारी के कारण दुनिया भर के आम लोगों की क्रय शक्ति घटती चली जा रही है। जिससे सारी दुनिया की अर्थ व्यवस्था प्रभावित हो रही है। यह चिंता का सबसे बड़ा कारण है। इसी बीच रूस- चीन जैसी महाशक्तियां ईरान के समर्थन में आ गई हैं। वैश्विक व्यापार को लेकर अधिकांश देशों से चुनौती अमेरिकी डॉलर को मिलना शुरू हो गई है। अर्थ व्यवस्था की स्थिरता के लिए यह सबसे बड़ी चुनौती है। आगे क्या होगा इसका गुणा-भाग कोई नहीं लगा पा रहा है। वर्तमान स्थिति को देखते हुए यह कहने को मजबूर होना पड़ रहा है, होगा वही जो मंजूरे खुदा या मंजूर भगवान को होगा। ईएमएस/07/03/2026