लेख
07-Mar-2026
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अन्तराष्ट्रीय महिला दिवस पर विशेष आलेख भारतीय संस्कृति की विराट परंपरा में एक वाक्य सदियों से गूँजता रहा है -“यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः”।यह केवल एक शास्त्रीय उक्ति नहीं,बल्कि भारतीय सभ्यता की आत्मा का घोष है।इसका आशय है कि जिस समाज में नारी का सम्मान होता है,वहाँ देवत्व का वास होता है,वहाँ संवेदनाएँ जीवित रहती हैं,वहाँ संस्कृति साँस लेती है और वहाँ मानवता का दीपक कभी बुझता नहीं। नारी केवल एक व्यक्ति नहीं है; वह जीवन की सृजनधर्मी ऊर्जा है। वह माँ के रूप में ममता की गंगोत्री है, बहन के रूप में स्नेह की सरिता है, पत्नी के रूप में जीवन की सहयात्री है और बेटी के रूप में भविष्य की मुस्कान है।भारतीय परंपरा ने नारी को केवल सामाजिक भूमिका में नहीं देखा,बल्कि उसे सृजन की मूल शक्ति माना है।यही कारण है कि हमारे यहाँ प्रकृति को भी माँ कहा गया और ज्ञान,धन तथा शक्ति को सरस्वती, लक्ष्मी और दुर्गा के रूप में पूजित किया गया। भारत की सभ्यता में नारी का स्थान सदैव गौरवपूर्ण रहा है।वेदों के युग में जब ज्ञान और दर्शन के संवाद होते थे, तब वहाँ नारी भी समान रूप से उपस्थित थी। गार्गी और मैत्रेयी जैसी विदुषियों ने केवल शास्त्रों का अध्ययन ही नहीं किया, बल्कि दार्शनिक विमर्शों में अपनी तेजस्विता से सबको चकित किया। उस समय समाज में यह विश्वास गहरा था कि ज्ञान और संवेदना का कोई लिंग नहीं होता।मनुष्य की पहचान उसके विचार और कर्म से होती है। समय की धारा में कई उतार-चढ़ाव आए। मध्यकालीन परिस्थितियों ने सामाजिक संरचनाओं को बदल दिया और अनेक रूढ़ियाँ समाज में घर करने लगीं।नारी की स्वतंत्रता पर कई प्रकार के बंधन लगाए गए। शिक्षा और सामाजिक भागीदारी के अवसर सीमित होने लगे। किंतु इतिहास इस बात का साक्षी है कि भारतीय नारी की चेतना कभी पूरी तरह दबाई नहीं जा सकी।वह समय-समय पर अपनी ऊर्जा और आत्मविश्वास से इन बंधनों को तोड़ती रही।भारत के स्वतंत्रता संग्राम ने नारी शक्ति को नई दिशा और नई पहचान दी।जब देश पराधीनता की जंजीरों में जकड़ा हुआ था, तब अनेक महिलाओं ने घर की चौखट लांघकर स्वतंत्रता के महासंग्राम में भाग लिया।रानी लक्ष्मीबाई की तलवार केवल अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध नहीं थी; वह भारतीय नारी के स्वाभिमान का प्रतीक बन गई। सरोजिनी नायडू की वाणी में कविता भी थी और क्रांति की चेतना भी।कस्तूरबा गाँधी का त्याग और समर्पण राष्ट्र की आत्मा से जुड़ा हुआ था।स्वतंत्रता आंदोलन ने यह सिद्ध कर दिया कि नारी केवल घर की परिधि में सीमित रहने वाली सत्ता नहीं है,बल्कि वह राष्ट्र की नियति को भी दिशा देने की क्षमता रखती है।यही कारण है कि स्वतंत्र भारत के संविधान निर्माताओं ने महिलाओं को समान अधिकार और समान अवसर प्रदान करने का संकल्प लिया। संविधान ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि राज्य किसी भी नागरिक के साथ लिंग के आधार पर भेदभाव नहीं करेगा। यह केवल कानूनी प्रावधान नहीं था; यह उस नए भारत की परिकल्पना थी जिसमें नारी और पुरुष दोनों समान गरिमा के साथ आगे बढ़ें। स्वतंत्रता के बाद के दशकों में भारतीय समाज ने धीरे-धीरे परिवर्तन की यात्रा तय की।शिक्षा के विस्तार ने महिलाओं के जीवन में नई रोशनी जगाई। विद्यालयों और विश्वविद्यालयों के द्वार खुलने लगे। ज्ञान के साथ आत्मविश्वास भी बढ़ा और आत्मविश्वास के साथ नई संभावनाओं के द्वार खुलते चले गए।आज का भारत उस परिवर्तन का साक्षी है जहाँ नारी केवल घर की धुरी नहीं बल्कि समाज और राष्ट्र की सक्रिय सहभागी बन चुकी है। विज्ञान की प्रयोगशालाओं से लेकर अंतरिक्ष के प्रक्षेपण केंद्रों तक, खेल के मैदानों से लेकर प्रशासनिक दायित्वों तक,कला, साहित्य,पत्रकारिता,शिक्षा और उद्यमिता के हर क्षेत्र में भारतीय महिलाएँ अपनी प्रतिभा का परिचय दे रही हैं। जब कोई भारतीय बेटी अर्न्तराष्ट्रीय मंच पर देश का तिरंगा लहराती है, तब यह केवल उसकी व्यक्तिगत सफलता नहीं होती; यह उस संपूर्ण नारी शक्ति का सम्मान होता है जिसने सदियों की चुनौतियों के बीच अपनी पहचान बनाई है। फिर भी यह कहना कि यात्रा पूरी हो चुकी है,शायद वास्तविकता से आँखें मूँद लेना होगा।समाज में अभी भी कई ऐसी चुनौतियाँ मौजूद हैं जो नारी के मार्ग को कठिन बनाती हैं।कई स्थानों पर सामाजिक रूढ़ियाँ और असमानताएँ आज भी उसके आत्मविश्वास को चुनौती देती हैं। कहीं शिक्षा का अभाव है तो कहीं अवसरों की कमी।कहीं सुरक्षा का प्रश्न है तो कहीं सामाजिक मानसिकता का संकीर्ण दायरा। इन चुनौतियों के बावजूद भारतीय नारी की यात्रा रुकी नहीं है।वह निरंतर आगे बढ़ रही है।उसकी आँखों में स्वप्न हैं,उसके कदमों में विश्वास है और उसके भीतर वह अदम्य शक्ति है जो कठिनाइयों को भी अवसर में बदल देती है। दरअसल नारी शक्ति को समझना केवल अधिकारों के संदर्भ में संभव नहीं है।यह एक गहरी सांस्कृतिक और मानवीय चेतना का विषय है। जिस समाज में नारी का सम्मान होता है,वहाँ संवेदनाएँ जीवित रहती हैं।वहाँ परिवार मजबूत होते हैं, वहाँ संस्कृति सुरक्षित रहती है और वहाँ भविष्य उज्ज्वल होता है।नारी जीवन की वह मौन धारा है जो बिना किसी शोर के सभ्यता को आगे बढ़ाती रहती है।वह घर के आँगन में बच्चों के सपनों को आकार देती है,परिवार के रिश्तों को प्रेम की डोर से बाँधती है और समाज को संवेदनशील बनाती है। उसकी मुस्कान में आशा होती है और उसके संघर्ष में प्रेरणा।आज जब अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस का अवसर हमारे सामने है,तब यह केवल उत्सव का क्षण नहीं बल्कि कृतज्ञता का भी क्षण है।यह वह समय है जब समाज को उन अनगिनत महिलाओं को याद करना चाहिए जिन्होंने अपने त्याग,श्रम और संवेदना से इस दुनिया को बेहतर बनाया है।हर माँ जो अपने बच्चों के भविष्य के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर देती है, हर बेटी जो सपनों के साथ आगे बढ़ती है,हर बहन जो परिवार की खुशियों का आधार बनती है और हर वह महिला जो समाज को बेहतर बनाने के लिए संघर्ष करती है - वे सभी नारी शक्ति की जीवंत प्रतिमाएँ हैं। भारत की सांस्कृतिक चेतना में नारी को शक्ति कहा गया है।यह शक्ति केवल बाहुबल की नहीं बल्कि धैर्य, संवेदना,करुणा और सृजन की शक्ति है।यही शक्ति जीवन को अर्थ देती है और समाज को दिशा प्रदान करती है।आज आवश्यकता इस बात की है कि हम नारी सम्मान के इस आदर्श को केवल शब्दों में नहीं बल्कि अपने व्यवहार और सामाजिक जीवन में भी उतारें।जब समाज की मानसिकता बदलेगी, जब बेटी और बेटे के बीच कोई भेद नहीं रहेगा,जब हर महिला को सम्मान और अवसर मिलेगा-तभी वह आदर्श सच में साकार होगा जिसकी कल्पना हमारे ऋषियों ने की थी।नारी शक्ति को प्रणाम करना केवल औपचारिकता नहीं है;यह उस सृजनशील ऊर्जा के प्रति श्रद्धा है जिसने मानव सभ्यता को आकार दिया है। इस अवसर पर समूची नारी शक्ति को हृदय से नमन करते हुए यही कहा जा सकता है कि जहाँ नारी का सम्मान है, वहीं जीवन की सुंदरता है,वहीं संस्कृति की ज्योति है और वहीं मानवता का उजाला है।सच तो यह है कि नारी केवल समाज का हिस्सा नहीं,बल्कि समाज की आत्मा है।जब यह आत्मा सम्मानित होती है,तभी सच्चे अर्थों में देवत्व पृथ्वी पर उतरता है। यही वह भावना है जो हमें फिर से स्मरण कराती है—“यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।”.हे शक्ति स्वपणी,श्रृष्टि की जननी,तुझे शत-शत नमन । ईएमएस/07/03/2026