लेख
10-Mar-2026
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सोशल मीडिया के जाल में फंसकर बच्चों के पठन पाठन और खेल के मैदान से दूरी के अलावा अपराध और सुसाइड की वारदातों ने चिंता बढ़ा दी हैं। इसी सब के बीच आंध्र प्रदेश और कर्नाटक द्वारा अलग-अलग आयु समूहों में बच्चों के लिए सोशल मीडिया के उपयोग पर प्रतिबंध लगाने का फैसला लिया है सरकारों द्वारा किया गया यह निर्णय निसंदेह , सराहनीय, साहसिक और स्वाग्तयोग कदम है। बच्चों और किशोरों के बीच सोशल मीडिया का उपयोग किस तेजी से बड़ा है, यह बात छिपी नहीं है। सूचना, शिक्षा, मनोरंजन और संवाद के अनेक साधन अब हमारी हथेली में मौजूद हैं, लेकिन इस तकनीकी क्रांति का एक दूसरा पहलू भी है, जो विशेष रूप से बच्चों और किशोरों के लिए चिंता का विषय बनता जा रहा है। कम उम्र में सोशल मीडिया का बढ़ता उपयोग बच्चों के मानसिक, सामाजिक और भावनात्मक विकास पर गहरा प्रभाव डाल रहा है। यही कारण है कि अब राज्य सरकारें इस मुद्दे को गंभीरता से लेने लगी हैं। इस दिशा में आगे बढ़ते हुए कर्नाटक और आंध्र प्रदेश सरकारों ने 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया के उपयोग पर प्रतिबंध लगाने की घोषणा की है। कर्नाटक सरकार ने अपने 2026-27 के बजट में यह पहल करते हुए कहा कि किशोरों को सोशल मीडिया के नकारात्मक प्रभावों से बचाने के लिए यह कदम उठाया जा रहा है। इसी दिशा में आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू ने भी घोषणा की है कि 13 वर्ष से कम उम्र के बच्चों द्वारा सोशल मीडिया के उपयोग पर अगले 90 दिनों के भीतर रोक लगा दी जाएगी। यह निर्णय केवल प्रशासनिक कदम नहीं, बल्कि बच्चों के भविष्य और मानसिक स्वास्थ्य को लेकर बढ़ती चिंताओं का संकेत भी है। लेकिन इसके साथ-साथ इससे जुड़ी कई गंभीर चिंताएं भी सामने आई हैं, जैसे मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव, पढ़ाई में गिरावट, ऑनलाइन लत और साइबर खतरों का बढ़ना। पिछले कुछ वर्षों र में स्मार्टफोन और इंटरनेट की उपलब्धता ने बच्चों को बहुत कम उम्र में ही सोशल मीडिया से जोड़ दिया है। इंस्टाग्राम, यूट्यूब, टिकटॉक और फेसबुक जैसे प्लेटफॉर्म बच्चों के दैनिक जीवन का हिस्सा बन चुके हैं। कई बच्चे घंटों तक मोबाइल स्क्रीन पर लगे रहते हैं, जिससे उनकी पड़ई, खेलकूद ह और सामाजिक जीवन प्रभावित होता है। विशेषज्ञों का मानना है कि लगातार सोशल मीडिया के संपर्क में रहने से बच्चों में ध्यान केंद्रित करने की क्षमता नि कम होती है। वे वास्तविक जीवन की गतिविधियों से दूर होते जाते हैं और डिजिटल दुनिया में अधिक समय बिताने लगते हैं। यही स्थिति धीरे-धीरे डिजिटल लत में बदल जाती है। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार सोशल मीडिया क का अत्यधिक उपयोग बच्चों और किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव डाल सकता है। अवसाद, चिंता, नींद की कमी और आत्मविश्वास में क गिरावट जैसी समस्याएं बढ़ने लगी हैं। खासकर किशोरों में दूसरों से तुलना क करने की प्रवृत्ति बढ़ जाती है, जिससे हीन भावना और शरीर की छवि को लेकर असंतोष पैदा होता है। कर्नाटक और आंध्र प्रदेश की पहल इसी वैश्धिक चिंता का हिस्सा मानी जा सकती है। राज्य सरकारों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किशोरों को डिजिटल दुनिया के नकारात्मक प्रभावों से बचाया जा सके। माता-पिता और शिक्षकों की लंबे समय से यह शिकायत रही है कि बच्चों का बढ़ता स्क्रीन टाइम उनकी पढ़ाई, एकाग्रता और सामाजिक व्यवहार को प्रभावित कर रहा है। सोशल मीडिया पर अत्यधिक समय बिताने से बच्चों की नींद प्रभावित होती है, शारीरिक गतिविधियां कम हो जाती हैं और वास्तविक सामाजिक संबंध कमजोर पड़ने लगते हैं। यहीं कारण है कि बच्चों को बचाने के लिए भारत में कदम उठाने की मांग काफी पहले से हो रही है। हालांकि यह कदम केवल भारत तक सीमित नहीं है। दुनिया के कई देश पहले ही इस दिशा में कठोर कदम उठा चुके हैं। ऑस्ट्रेलिया ने 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लागू किया है, जबकि फ्रांस और कुछ यूरोपीय देशों में भी डिजिटल सुरक्षा से जुड़े कड़े नियम बनाए जा रहे हैं। इससे स्पष्ट है कि यह समस्या वैश्विक स्तर पर गंभीर होती जा रही है। हकिकत यह है कि बच्चों और किशोरों के जीवन में सोशल मीडिया की बढ़ती उपस्थिति ने कई मनोवैज्ञानिक चुनौतियों को जन्म दिया है। इस उम्र में बच्चों का मस्तिष्क तेजी से विकसित हो रहा होता है और वे बाहरी प्रभावों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील होते हैं। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध सामग्री हमेशा सकारात्मक या सुरक्षित नहीं होती। कई बार बच्चे हिंसक, अश्लील या भ्रामक सामग्री के संपर्क में आ जाते हैं, जिसका उनके मन पर गहरा प्रभाव पड़ सकता है। कई शोध यह बताते हैं कि जो बच्चे प्रतिदिन तीन घंटे या उससे अधिक समय सोशल मीडिया पर क बिताते हैं, उनमें अवसाद, तनाव और आत्मविश्वास की कमी की समस्या स अधिक देखी जाती है। लगातार दूसरों की जीवनशैली और उपलब्धियों को देखकर बच्चों में तुलना को प्रवृत्ति बढ़ जाती है। इससे उनमें हीन भावना भी न पैदा हो सकती है। इसके अलावा देर रात तक मोवाइल और सोशल मीडिया प का उपयोग बच्चों की नींद को भी प्रभावित करता है। पर्याप्त नींद न मिलने से उनकी एकाग्रता कम होती है और पढ़ाई में भी गिरावट आती है। लंबे नि समय तक स्क्रीन के सामने रहने से आंखों और मस्तिष्क पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। सोशल मीडिया का एक बड़ा खतरा साइबर बुलिंग यानी ऑनलाइन उत्पीड़न भी है। कई बार बच्चे अपने सहपाठियों या अनजान लोगों द्वारा ऑनलाइन अपमान, धमकी या मजाक का शिकार बन जाते हैं। कम उम्र में ऐसी घटनाएं बच्चों के आत्मसम्मान और मानसिक स्वास्थ्य को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकती हैं। इंटरनेट की दुनिया में गुमनामी के कारण कई लोग बिना किसी डर के दूसरों को परेशान करते हैं। बच्चे अक्सर यह समझ नहीं पाते कि ऐसी स्थितियों से कैसे निपटना चाहिए। कई मामलों में यह मानसिक तनाव इतना बढ़ जाता है कि बच्चों में अकेलापन, स डर और अवसाद जैसी समस्याएं उत्पन्न हो जाती हैं। हालांकि बच्चों की सुरक्षा के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने का विचार सराहनीय है, लेकिन इसका क्रियान्वयन आसान नहीं होगा। आज के समय में मोबाइल नि फोन और इंटरनेट शिक्षा का भी एक महत्वपूर्ण साधन बन चुके हैं। स्कूलों के असाइनमेंट, नोटिस और पढ़ाई पढ़ाई से से जुड़े जुड़े कई कई कार्य क अब डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से ही पूरे किए से ही पूरे किए जाते हैं। ऐसे में शैक्षिक उपयोग और मनोरंजन के उपयोग के बीच अंतर करना कठिन हो सकता है। एक और बड़ी चुनौती बच्चों की उम्र का सत्यापन है। इंटरनेट पर यह सुनिश्चित करना कि किसी उपयोगकर्ता की उम्र वास्तव में कितनी है, तकनीकी रूप से जटिल कार्य है। कई बच्चे अपने माता-पिता के फोन या फर्जी जानकारी का उपयोग करके भी सोशल मीडिया तक पहुंच सकते हैं। इसके अलावा कई परिवारों में एक ही मोबाइल फोन सभी सदस्य उपयोग करते हैं। ऐसे में बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर पूरी तरह प्रतिबंध लागू करना व्यवहारिक रूप से कठिन हो सकता है। डिजिटल तकनीक पूरी तरह नकारात्मक नहीं है। इसके माध्यम से बच्चों को शिक्षा, जानकारी और रचनात्मक अवसर भी मिलते हैं। इसलिए चुनौती यह है कि तकनीक के सकारात्मक उपयोग को बनाए रखते हुए ि इसके दुष्प्रभावों को नियंत्रित किया जाए। सरकारों को एक संतुलित नीति बनानी होगी जिसमें आयु सत्यापन तकनीक, एल्गोरिदम पारदर्शिता और डेटा सुरक्षा जैसे पहलुओं को शामिल किया जाए। साथ ही प्लेटफॉर्म कंपनियों इ को भी सामाजिक जिम्मेदारी निभानी होगी। कर्नाटक की पहल ने एक नई बहस को जन्म दिया है। आने वाले वर्षों में संभव है कि सोशल मीडिया के ज उपयोग के लिए उम्र सीमा तय करना सामान्य नीति बन जाए। दुनिया भर में नि डिजिटल प्लेटफॉर्म के लिए सख्त नियम बनते दिखाई दे रहे हैं। बच्चों की सुरक्षा केवल सरकार या कंपनियों की जिम्मेदारी नहीं है। यह पूरे समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है। कर्नाटक और आंध्र प्रदेश द्वारा उठाया गया कदम इस दिशा में एक महत्वपूर्ण शुरुआत माना जा सकता है। हालांकि यह अंतिम समाधान नहीं है, लेकिन इससे एक व्यापक बहस जरूर शुरू हुई है कि बच्चों को डिजिटल दुनिया में सुरक्षित कैसे रखा जाए। अंततः बच्चों के सुरक्षित भविष्य के लिए सरकार, समाज, तकनीकी कंपनियों और अभिभावकों को मिलकर काम करना होगा। तभी हम डिजिटल युग के लाभों का उपयोग करते हुए बच्चों के बचपन को सुरक्षित और स्वस्थ बना सकेंगे।पिछले दिनों एनसीआर के गाजियाबाद में जिस तरह का सोशल मीडिया पर एक्टिव तीन नाबालिग बहनों द्वारा हाइराइज बिल्डिंग के नवे माले से आधी रात कूदकर जान देने का मामला सामने आया और समय समय पर इसी तरह की घटनाओं की झड़ी लग रही है ऐसे मे सरकारों को बच्चों किशोरों के जीवन को बचाने के लिए कठोर कदम उठाने की जरूरत है बशर्ते इन कानूनों पर गंभीरता से अमल भी किया जाना चाहिए। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं) ईएमएस / 10 मार्च 26