ईरान पर इजरायल और अमेरिका के संयुक्त हमले के बाद पैदा हुए जंग के हालात ने पूरी दुनियां को अपने आतिशि आगोश में लेना शुरु कर दिया है। सैन्य संघर्ष का असर अब वैश्विक ऊर्जा बाजार पर साफ दिखाई देने लगा है, जिससे भारत भी अछूता नहीं है। ईरान, अमेरिका और इजरायल के बीच बढ़ते टकराव ने तेल और गैस की आपूर्ति को लेकर दुनिया भर में चिंता पैदा कर दी है। इस संकट का सबसे बड़ा कारण उस समुद्री मार्ग पर बढ़ता जोखिम है, जिसे वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति की जीवनरेखा माना जाता है। स्ट्रैट ऑफ हॉर्मोज वही मार्ग है जिससे एशिया के कई देशों, जिनमें भारत, चीन और जापान प्रमुख हैं, को बड़ी मात्रा में कच्चा तेल और गैस पहुंचती है। इस मार्ग के बंद होने की खबरों ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारी हलचल पैदा कर दी है। नौ मार्च की शाम को तेल और गैस के वैश्विक बाजारों में अचानक उतार-चढ़ाव देखने को मिला, जिससे यह स्पष्ट हो गया कि युद्ध का असर अब केवल युद्धक्षेत्र तक सीमित नहीं रहा, बल्कि आर्थिक और ऊर्जा सुरक्षा से भी गहराई से जुड़ गया है। भारत में इस स्थिति को लेकर चिंता के स्वर उठने लगे हैं। हालांकि केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने देशवासियों को आश्वस्त करते हुए कहा है, कि घरेलू उपभोक्ताओं के लिए गैस की आपूर्ति में किसी तरह की कमी नहीं है और घबराने की आवश्यकता नहीं है। उनका कहना है कि भारत ने ऊर्जा आयात के कई वैकल्पिक स्रोत और रास्ते तैयार कर रखे हैं, जिससे आपूर्ति को स्थिर बनाए रखने में मदद मिल रही है। सरकार का दावा है कि घरेलू उपभोक्ताओं को सीएनजी और पीएनजी की 100 प्रतिशत आपूर्ति सुनिश्चित की जा रही है, जबकि उद्योगों को भी 70 से 80 प्रतिशत तक गैस उपलब्ध कराने का प्रयास किया जा रहा है। वहीं दूसरी तरफ गैस संकट के मद्देनजर सरकार ने एस्मा की भी घोषणा कर दी है। बावजूद इसके जमीनी स्तर पर तेल व गैस संकट साफ नजर आने लगा है। विभिन्न राज्यों के शहरों से आने वाली खबरें और सरकार के दावे पूरी तरह मेल नहीं खाती हैं। देश के कई शहरों में रेस्टोरेंट उद्योग ने कमर्शियल एलपीजी सिलेंडर की आपूर्ति में बाधा आने की शिकायतें हैं। कुछ स्थानों पर सिलेंडर की उपलब्धता कम होने और बुकिंग नियमों में बदलाव की खबरें भी आम हैं। यही कारण है कि विपक्ष इस मुद्दे को लेकर सरकार पर लगातार दबाव बना रहा है। मामला इसलिए भी राजनीतिक रूप से संवेदनशील हो गया है क्योंकि संसद का बजट सत्र जारी है। ऐसे में विपक्ष इस संकट को राष्ट्रीय बहस का मुद्दा बनाना चाहता है और सरकार से स्पष्ट जवाब मांग रहा है। विपक्ष का कहना है कि ऊर्जा सुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण विषय पर सरकार को संसद में विस्तृत चर्चा करनी चाहिए और देश को यह बताना चाहिए कि संकट से निपटने के लिए क्या ठोस रणनीति तैयार की गई है। मौजूदा स्थिति की गंभीरता का अंदाजा भारत के पड़ोसी देशों की हालत से भी लगाया जा सकता है। पाकिस्तान सरकार ने ईंधन की कमी के चलते स्कूल-कॉलेज तक बंद कर दिए हैं, जबकि बांग्लादेश में पेट्रोल-डीजल की बिक्री पर सीमाएं तय कर दी गई हैं। इन परिस्थितियों के बीच भारत ने बांग्लादेश को तेल आपूर्ति करने का आश्वासन दिया है। केंद्र सरकार का यह कदम एक ओर भारत की क्षेत्रीय भूमिका और क्षमता का संकेत देता है, लेकिन दूसरी ओर यह सवाल भी उठाता है कि यदि वैश्विक संकट और गहरा हुआ तो क्या भारत अपनी घरेलू मांग को पूरी तरह सुरक्षित रख पाएगा। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात से पूरा करता है। इसलिए मध्य पूर्व में पैदा हुआ कोई भी संकट सीधे तौर पर भारतीय अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकता है। यदि तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतें तेजी से बढ़ती हैं या आपूर्ति बाधित होती है, तो इसका असर परिवहन, उद्योग, महंगाई और आम उपभोक्ता के बजट पर पड़ना तय है। यही वजह है कि विशेषज्ञ लगातार यह सवाल उठा रहे हैं कि भारत के पास तेल और गैस का रणनीतिक भंडार कितने दिनों के लिए पर्याप्त है। क्या सरकार के पास ऐसी ठोस योजना है जिससे लंबे समय तक आपूर्ति बाधित होने की स्थिति में भी कीमतों को नियंत्रित रखा जा सके? इस संदर्भ में कई लोग पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कार्यकाल की भी चर्चा कर रहे हैं। उनके शासनकाल में वैश्विक आर्थिक मंदी आई थी, लेकिन आर्थिक प्रबंधन और नीतिगत संतुलन के कारण भारत पर उसका प्रभाव न के बतौर भी नजर नहीं आया था। यही कारण है कि आज भी उस दौर को आर्थिक स्थिरता के उदाहरण के रूप में याद किया जाता है। वर्तमान संकट भी कुछ वैसी ही दूरदर्शिता और संवाद की मांग करता है। ऊर्जा सुरक्षा केवल आर्थिक विषय नहीं है, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और आम जनता की जीवनशैली से जुड़ा मुद्दा है। ऐसे में सरकार को चाहिए कि वह विपक्ष को भी भरोसे में लेकर एक पारदर्शी रणनीति प्रस्तुत करे। मध्य पूर्व की जंग कब तक चलेगी, इसका अनुमान लगाना कठिन है। लेकिन यह स्पष्ट है कि यदि संकट लंबा खिंचता है तो उसके प्रभाव से भारत भी अछूता नहीं रह पाएगा। इसलिए समय की मांग यही है कि राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से ऊपर उठकर ऊर्जा सुरक्षा पर राष्ट्रीय सहमति बनाई जाए। यदि वास्तविक चुनौतियों को नजरअंदाज कर केवल आश्वासन दिए जाते रहे, तो हालात बिगड़ने में देर नहीं लगेगी। संकट के समय नेतृत्व की सबसे बड़ी कसौटी यही होती है कि वह सच्चाई स्वीकार करे, दूरदर्शी नीति बनाए और देश को भरोसे के साथ आगे बढ़ाए। ईएमएस/ 11 मार्च 26