नई दिल्ली (ईएमएस)। डिजिटल अरेस्ट के जरिए ठगी करने वाले ठग पुलिस की वर्दी पहनकर, फर्जी अदालती वारंट और नकली पुलिस स्टेशन दिखाकर लोगों को ड्रग्स और मनी लॉन्ड्रिंग केस में फंसाने की धमकी देते हैं। डरा-धमकाकर लाखों रुपये वसूलने वाले इन अपराधियों से सावधान रहने की जरूरत है। आजकल साइबर अपराधी लोगों को ठगने के लिए ऐसे-ऐसे पैंतरे आजमाते हैं, जिसने लोग बिल्कुल ही अंजान होते हैं। जब ठग उनका बैंक अकाउंट बिल्कुल ही खाली कर देते हैं तब जाकर लोगों को स्कैम का पता लगता है। जो पुलिस की वर्दी पहनकर मासूम लोगों को ठग रहा था। डिजिटल अरेस्ट की शुरुआत एक रिकॉर्डेड फोन कॉल से होती है। मोहित यादव नाम के एक युवक को कॉल आया कि उनके पते पर एक पार्सल आया है, जिसमें नशीले पदार्थ मिले हैं। इसके बाद कॉल को एक कॉल सेंटर जैसे सेटअप पर ट्रांसफर किया गया, जहां ठगों ने मोहित को डराना शुरू किया कि उनकी आईडी का गलत इस्तेमाल मनी लॉन्ड्रिंग में हुआ है। ठगों का आत्मविश्वास इतना है कि वे व्हाट्सएप वीडियो कॉल पर पुलिस की वर्दी पहनकर सामने आते हैं। मोहित के मामले में ठग लोकमान्य तिलक थाना, मुंबई का अधिकारी बनकर बात कर रहा था। पीछे पुलिस का लोगो और फाइलें इस तरह सजी थीं कि कोई भी धोखा खा जाए। विश्वास जीतने के लिए ठग ने मोहित से कहा- गूगल पर जाकर थाने का लैंडलाइन नंबर चेक कर लो, हम वहीं से बोल रहे हैं। ठग ऐसे केस का नाम लेते हैं जो गूगल पर ट्रेंड कर रहा हो (जैसे मनी लॉन्ड्रिंग या ड्रग सिंडिकेट)। पीड़ित को एक लिंक भेजा जाता है, जो हूबहू सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट जैसा दिखता है। वहां केस नंबर डालते ही आपके नाम का अरेस्ट वारंट दिखाई देता है। ठग आपसे बैंक बैलेंस का स्क्रीनशॉट मांगते हैं। अगर अकाउंट खाली है, तो वे कॉल काट देते हैं। लेकिन अगर पैसा है, तो केस रफा-दफा करने या प्रायोरिटी फीस के नाम पर लाखों की मांग की जाती है। अजीत झा/देवेन्द्र/नई दिल्ली/ ईएमएस/12/मार्च /2026