लेख
12-Mar-2026
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हाल ही में लोकसभा स्पीकर ओम बिरला के विरुद्ध विपक्षी दलों द्वारा अविश्वास प्रस्ताव पर सदन मे सभी राजनीतिक दलों के संसद सदस्यों ने चर्चा कर अविश्वास प्रस्ताव को लेकर अपना-अपना मत रखा है। भारतीय संसद की कार्य प्रणाली और संसदीय परंपराओं को लेकर गंभीर बहस हुई है। पिछले 7 वर्षों से लोकसभा उपाध्यक्ष का पद भी खाली पड़ा हुआ है। इस पर भी विपक्षी दल के सदस्यों ने तीव्र प्रतिक्रिया व्यक्त की है। प्रधानमंत्री और नेता प्रतिपक्ष को सत्ता पक्ष और प्रतिपक्ष का नेता माना जाता है। नेता प्रतिपक्ष को जिस तरह से बोलने नहीं दिया गया था। सदस्यों को बोलने के दौरान बार-बार टोंका जाता है। तरह-तरह के नियम बताकर सांसदों को अपनी बात नहीं कहने दी जाती है। बिना चर्चा और बिना प्रक्रिया के सदन से जो बिल पास किये जा रहे हैं। सत्र की अवधि लगातार कम किए जाने के कारण सदस्य अपनी बात संसद में नहीं रख पाते हैं इसको लेकर संसद सदस्यों में पिछली कई वर्षों से नाराजी देखने को मिल रही थी। सत्ता पक्ष जिस तरह से विपक्षी सदस्यों को बोलने से रोकता था आसंदी का सत्ता पक्ष के लिए अलग व्यवहार और विपक्ष के लिए अलग व्यवहार अविश्वास प्रस्ताव का कारण बना। लोकसभा अध्यक्ष का पद संविधान और संसदीय लोकतंत्र में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। लोकसभा का अध्यक्ष सभी सदस्यों का संरक्षक होता है। वह सरकार या किसी पार्टी का नहीं होता है। यह पद सदन की कार्यवाही निष्पक्ष और संतुलित ढंग से संचालित हो। सभी सदस्यों को अपनी बात कहने का अधिकार मिले। जो भी कानून और नियम बनाए जा रहे हैं उनमें सभी पक्षों की राय ली जाए। यह दायित्व लोकसभा के अध्यक्ष का होता है। सदन में किसी भी विषय पर स्वतंत्रता से संसद सदस्य अपनी बात रख सकते हैं। यदि कुछ नियमों के विपरीत होता है तो उसे हटाने का अधिकार भी अध्यक्ष के पास होता है लेकिन बोलने के पहले ही उसे रोक दिया जाए। पिछले 12 वर्षों में यह बहुत बार देखने को मिला है। यही अति अविश्वास का सबसे बड़ा कारण बनी। सत्ता पक्ष बहुमत में होता है। विपक्ष अल्पमत में होता है। ऐसी स्थिति में यह परंपरा रही है कि अध्यक्ष सरकार और विपक्ष के बीच जब टकराव होता है तो ऐसी स्थिति में वह मध्यस्थता करके तथा अपने अधिकारों का उपयोग करके सही निर्णय लेकर सदन की कार्रवाई को संचालित करने में बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका होती थी। पिछले कुछ वर्षों से सत्ता पक्ष का दबाव आसंदी पर देखा जा रहा था। ऐसे में अध्यक्ष के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव केवल एक व्यक्ति पर सवाल नहीं बल्कि संसद की कार्यशैली और लोकतांत्रिक संवाद और जवाबदेही का भी मामला है। संसद सदस्यों को सदन में स्वतंत्र रूप से अपनी बात रखने का अवसर नहीं मिलता है। बोलते समय उन्हें बीच में रोक दिया जाता है। सेंसेक्स सदस्यों को थोक के भाव में निलंबित कर दिया जाता है। सदस्यों का कहना था, अध्यक्ष को सभी दलों के सांसदों के साथ तथा नेता प्रतिपक्ष के साथ समान दृष्टिकोण रखना चाहिए। वर्तमान परिस्थितियों में सत्ता पक्ष को अधिक अवसर और संरक्षण देने का आरोप अध्यक्ष पर लगाया गया है। सत्ता पक्ष के सदस्यों ने विपक्ष के इन आरोपों को निराधार बताते हुए खारिज किया है। सत्ता पक्ष के सदस्यों ने कहा अध्यक्ष ने सदन की मर्यादा, सदन की कार्रवाई सुचारू रूप से चले, सदन में व्यवधान ना हो। इसके लिए अध्यक्ष महोदय द्वारा आवश्यक कदम उठाए गये हैं। सत्ता पक्ष का आरोप था विपक्ष की लगातार नारेबाजी और हंगामे के कारण अध्यक्ष को कठोर निर्णय लेने पड़े हैं। भारतीय संसदीय परंपरा में लोकसभा अध्यक्ष को निष्पक्षता का प्रतीक माना जाता है। संसद से जो भी कानून पास होते हैं उनमें अध्यक्ष की भूमिका अति महत्वपूर्ण होती है। भारतीय संविधान में अध्यक्ष के पद को दलगत राजनीति से अलग रखा गया है। यदि अध्यक्ष की निष्पक्षता पर प्रश्न उठते हैं, तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए चिंताजनक संकेत है। इस विवाद का समाधान केवल आरोप-प्रत्यारोप से नहीं हो सकता है। आवश्यकता इस बात की है, संसद की गरिमा, सदस्यों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, विधायी कार्य की गुणवत्ता के बीच संतुलन बनाया जाए। संसद लोकतंत्र का सर्वोच्च मंच है। यहां संवाद,बहस और असहमति को स्थान मिलना ही चाहिए। सभी सदस्यों को संसद में वह सभी बात कहने की स्वतंत्रता होनी चाहिए जो वह संसद के बाहर किसी कारण से नहीं बोल पाते हैं। यदि यह परंपरा कमजोर होती है, तो उसका प्रभाव पूरे लोकतांत्रिक ढांचे पर पड़ना तय है। पिछले 75 वर्षों में भारत की संसद ने बार-बार यह साबित किया है। सत्ता को नियंत्रित करने एवं नियम और कानून का बेहतर निर्माण हो इस दिशा में जो कार्य पहले हुए हैं वह बहुत संतोष जनक रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों में जिस तरह से सत्ता पक्ष आसंदी पर हावी हो रही है, उसके कारण अब यह टकराव चरम पर पहुंच गया है। सत्ता पक्ष और विपक्ष एक दूसरे के प्रति दुश्मनों के समान व्यवहार कर रहे हैं। सत्ता पक्ष के पास बहुमत है ऐसे में सभी जानते हैं कि लोकसभा अध्यक्ष को हटाना विपक्ष के लिए संभव नहीं। हुआ भी यही ध्वनिमत से अविश्वास प्रस्ताव गिर गया, लेकिन जिस तरह से विपक्ष एकजुट हुआ उसने अपनी नाराजी सत्ता पक्ष और आसंदी को जता दी। पिछले 7 वर्षों से उपाध्यक्ष के पद पर किसी का चयन नहीं हो पाया है अविश्वास प्रस्ताव के दौरान यह बात भी खुलकर सामने आई की दोनों पद होना अत्यंत आवश्यक हैं। अविश्वास प्रस्ताव की चर्चा के बाद लोकसभा में उपाध्यक्ष के पद का निर्वाचन शीघ्र किया जाएगा। संसद सत्र का कार्यकाल बढ़ाया जाएगा। सदस्यों को बोलने की स्वतंत्रता दी जाएगी। जो आपत्तिजनक शब्द या बातें होंगी उन्हें लोकसभा अध्यक्ष भाषण समाप्ति के बाद रिकॉर्ड से हटा सकते हैं। आसंदी सत्ता पक्ष और विपक्ष के लिए एक समान व्यवहार करें यह सुनिश्चित करना जरूरी हो गया है। जिस तरह की चुनौतियां बढ़ रही हैं यदि सत्ता पक्ष द्वारा विपक्ष को विश्वास में नहीं लिया गया। ऐसी स्थिति में लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं और परंपराओं को कायम रख पाना संभव नहीं होगा। जो होता है वह अच्छे के लिए होता है। अविश्वास प्रस्ताव में चर्चा के दौरान दोनों ही पक्षों को अपनी-अपनी स्थितियों का भान हो गया है आशा की जा सकती है कि भविष्य में एक बार फिर सत्ता पक्ष और विपक्ष मिलकर भारतीय लोकतंत्र को मजबूत करने और देश की जनता को अपनी बात पहुंचाने का माध्यम संसद बने। इसमें जो भी सुधार आवश्यक हों करने चाहिए। ईएमएस / 12 मार्च 26