लेख
29-Apr-2026
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- विधायिका, कार्य पालिका, न्याय पालिका पर है खास पकड़ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2001 में पहली बार गुजरात के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। उसके बाद से सत्ता को किस तरह से नियंत्रित किया जा सकता है, दिखला दिया। सत्ता और नौकरशाही पर मोदी ने अपनी मजबूत पकड़ बनाते हुए, 2001 से लेकर 2026 तक का जो राजनीतिक सफर पूरा किया है, उसे देखते हुए यह कहा जा सकता है, भारत में उनके मुकाबले का कोई ऐसा राजनेता नहीं देखने में आया जिसने सत्ता की सवारी इस तरह से की हो। इसके पहले स्वतंत्र भारत में कोई नहीं कर पाया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हर विषम परिस्थितियों में सत्ता के उन सभी घोडों को नियंत्रित करने में सफलता हासिल की, जिनको नियंत्रित करना आमतौर पर उसके पहले के किसी भी प्रधानमंत्री के लिए संभव नहीं हुआ। गुजरात का मुख्यमंत्री बनने के बाद गोधरा कांड हुआ था। जिसमें उनकी कुर्सी खतरे में पड़ी थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई को कहना पड़ा था, मोदी जी राज धर्म का पालन करें। उस विषम परिस्थितियों से नरेंद्र मोदी अपने आपको बाहर निकलने में सफल रहे। 2002 का विधानसभा चुनाव जीतने के बाद उन्होंने कभी मुड़कर नहीं देखा। गुजरात में उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री केशू भाई पटेल और शंकर सिंह बघेला को घर बिठाकर अपनी ताकत का एहसास कराया था। लोकतांत्रिक व्यवस्था में रहते हुए संघीय और केंद्रीय व्यवस्था को कब कैसे नियंत्रित किया जा सकता है, यह उन्होंने गुजरात से जाना। नरेंद्र मोदी ने मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री के रूप यह भी जाना कि किस तरह से विपक्षी दलों के नेताओं का कैसे उपयोग करना है। कार्यपालिका, न्यायपालिका, पार्टी संगठन और विपक्षी दलों के नेताओं को किस तरह से काबू करना है, या अपने पाले में लाना है। यह किसी से छिपा नहीं है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नोटबंदी लागू करके विपक्ष को एक ही झटके में सड़क पर लाकर खड़ा कर दिया था। काला धन तो वापस नहीं आया। नोटबंदी के कारण उन्होंने उस दौरान के अधिकांश राज्यों के चुनाव और लोकसभा जीत लिया। विपक्ष को पैसे-पैसे के लिए तरसा दिया। समय बीता, अब कोई भी आदमी नोटबंदी लागू होने के बाद काला धन और आतंकवाद खत्म होने की बात नहीं करता है। कुछ इसी तरह से उन्होंने जीएसटी कानून लागू किया। उसका उत्सव मनाया। देखते ही देखते राज्यों और केंद्र के राजस्व में कई गुना इजाफा कर लिया। आम जनता के ऊपर भारी टैक्स लगा, लेकिन जनता ने ताली बजाकर स्वागत किया। प्रधानमंत्री के रूप में मोदी ने जो भी निर्णय लिए उसका कितना भी विरोध हो, उन्होंने बिना डरे उसका मुकाबला जिस तरह से किया, यह नरेंद्र मोदी से अच्छा और कोई नहीं जानता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, भारतीय जनता पार्टी जिस विचारधारा को लेकर राजनीति करती थी। उस विचारधारा के विपरीत लोगों को जिस तरह से उन्होंने भाजपा में शामिल किया। सत्ता में उन्हें भागीदार बनाया। कई राज्यों में भाजपा की डबल इंजन की सरकारें बनाईं। गुजरात और दिल्ली में उन्होंने जिस तरह से नौकरशाही और न्यायपालिका के साथ बिना टकराव उन पर सवारी करने में सफलता हासिल की। जांच एजेंसियों का उपयोग उन्होंने अपनी ताकत बढ़ाने, विपक्षियों को समाप्त करने, में जिस तरह से किया है। आज उसकी प्रशंसा सारी दुनिया में हो रही है। भाजपा संगठन और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में जो पकड़ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की वर्तमान में है। इसके पहले कभी किसी भी संगठन प्रमुख की ऐसी पकड़ जनसंघ, भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ मे देखने को नहीं मिली। पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी जिनके पास लोकसभा में दो तिहाई बहुमत था, वह भी जो ताकत हासिल नहीं कर पाए थे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उस ताकत का एहसास सारे देश को करा दिया है। कार्यपालिका और न्यायपालिका सरकार के अनुकूल काम करती हुई दिख रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पहले जो टकराव न्यायपालिका और कार्यपालिका का केंद्रीय सत्ता के साथ होता था अब लोग उसे भूल चुके हैं। अब वही होता है जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चाहते हैं। कार्यपालिका और न्यायपालिका उनके इशारे पर काम करती है। मंत्रिमंडल पर उनका एकाधिकार है। पार्टी संगठन में एकाधिकार है। कहीं से भी उन्हें कोई चुनौती देता हुआ नजर नहीं आता है। ऐसी स्थिति में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चर्चा न केवल भारत में होती है वरन उनकी चर्चा वैश्विक धरातल पर होने लगी है। लोकतंत्र में वह एक ऐसे मॉडल बनकर सामने आए हैं, जिसे अमेरिका के राष्ट्रपति और अन्य कई देशों के रास्ट्राध्यक्षों ने भी अपना रोल मॉडल बना लिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक ही लक्ष्य होता है सत्ता में उनकी 100 फ़ीसदी पकड़ होनी चाहिए। साथ ही चुनाव में उनकी जीत कैसे होगी, इसके लिए वह निरंतर काम करते हुए अपनी पकड़ को मजबूत रखते हैं। साम-दाम-दंड-भेद का प्रयोग करते हुए सत्ता में अपनी ताकत बनाए रखने का कोई अवसर नहीं छोड़ते हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था में शासक के रूप में जिस तरह से वह हमेशा अपनी जीत के लिए काम करते हैं, जो जीता वही सिकंदर की कहावत को चरितार्थ करते हैं। गुजरात के मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री के रूप में सत्ता के 25 वर्षों में सत्ता की सवारी कैसे की जाती है वह आज वैश्विक स्तर पर मॉडल बनकर उभरे हैं। उन्होंने अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप को भी पछाड़ दिया है। जिसके कारण वैश्विक स्तर पर चर्चाओं में है। ईएमएस / 29 अप्रैल 26