(स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (सिपरी) की ताजा रिपोर्ट-2025) दुनिया के देश अपने रक्षा बजट या यूं कहें कि सैन्य खर्च में अभूतपूर्व बढ़ोत्तरी कर रहे हैं। वास्तव में, आज के समय में दुनिया भर में सैन्य खर्च कई कारणों से तेजी से बढ़ रहा है। प्रमुख कारणों की यदि हम यहां पर बात करें तो भू-राजनीतिक तनाव और युद्ध(रूस-यूक्रेन युद्ध), इजरायल हमास युद्ध, दक्षिण चीन सागर जैसे संघर्षों ने देशों को सुरक्षा पर अधिक खर्च करने के लिए प्रेरित किया है। पड़ोसी देशों की प्रतिस्पर्धा (जैसे कि भारत, चीन और पाकिस्तान जैसे देशों की आपसी प्रतिस्पर्धा) भी इसके लिए कहीं न कहीं जिम्मेदार है।ये देश अपने सामरिक संतुलन बनाए रखने के क्रम में अपने सैन्य खर्च में बढ़ोत्तरी कर रहे हैं।सरल शब्दों में कहें तो जब एक देश हथियार खरीदता है, तो पड़ोसी देश भी अपनी सेना मजबूत करने लगते हैं। इसे हथियारों की दौड़ कहा जाता है। नई तकनीक और आधुनिक हथियार भी एक प्रमुख कारण बनकर उभरा है। पिछले कुछ समय से ड्रोन, साइबर सुरक्षा, मिसाइल रक्षा प्रणाली, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित हथियार, अंतरिक्ष रक्षा आदि पर भारी निवेश हो रहा है, जैसा कि आधुनिक युद्ध अब केवल सैनिकों से नहीं, तकनीक से भी लड़ा जाता है। आज आतंकवाद और आंतरिक सुरक्षा खतरों जैसे घुसपैठ, नशीले पदार्थों की तस्करी आदि के कारण भी दुनिया के विभिन्न देशों ने अपने सैन्य खर्च में बढ़ोत्तरी की है।वैश्विक शक्ति बनने की महत्वाकांक्षा ने भी सैन्य खर्च में बढ़ोत्तरी को जन्म दिया है।सच तो यह है कि आज के समय में चीन, अमेरिका और रूस जैसे शक्तिशाली देश अपनी सैन्य शक्ति दिखाकर विश्व राजनीति में अपना प्रभाव बढ़ाना चाहते हैं। इतना ही नहीं, आज हथियार उद्योग कई देशों की अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा है। रक्षा सौदों से रोजगार, निर्यात और तकनीकी विकास भी जुड़ा होता है। कहना ग़लत नहीं होगा कि वर्तमान समय में सैन्य खर्च बढ़ना केवल युद्ध की तैयारी नहीं, बल्कि सुरक्षा, शक्ति संतुलन, तकनीकी बढ़त और राजनीतिक प्रभाव का भी संकेत है। लेकिन अत्यधिक सैन्य खर्च से शिक्षा, स्वास्थ्य और विकास क्षेत्रों पर दबाव भी बढ़ सकता है। इस क्रम में हाल ही में एक प्रतिष्ठित न्यूज एजेंसी के हवाले से यह खबरें आईं हैं कि भारत का रक्षा खर्च 8.9% बढ़ा, और भारत 5वां सबसे अधिक सैन्य खर्च वाला देश बन गया है। दरअसल, हाल ही में आई सिपरी की रिपोर्ट के अनुसार यह जानकारी सामने आई है कि वैश्विक सैन्य खर्च 2,887 अरब डॉलर पार कर चुका है और भारत दुनिया का पांचवां सबसे बड़ा सैन्य खर्च करने वाला देश बन गया है। रिपोर्ट के आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2025 में भारत का सैन्य खर्च 8.9 प्रतिशत बढ़कर 92.1 अरब डॉलर हो गया। गौरतलब है कि स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (सिपरी) की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, 2025 में वैश्विक सैन्य खर्च 2,887 अरब डॉलर तक पहुंच गया।बड़ी बात यह है कि यह लगातार 11वां साल है, जब वैश्विक सैन्य खर्च में वृद्धि दर्ज की गई है। पाठकों को बताता चलूं कि सबसे ज्यादा खर्च करने वाले पांच देशों में अमेरिका, चीन, रूस, जर्मनी और भारत शामिल हैं, जिनका वैश्विक खर्च में कुल योगदान 58 प्रतिशत है। सरल शब्दों में कहें तो सेना पर सर्वाधिक खर्च करने वाले देशों में अमेरिका, चीन, रूस और जर्मनी आज दुनिया में सबसे आगे पहुंच चुके हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार अमेरिका, यूरोप, चीन, रूस और जर्मनी का सैन्य खर्च क्रमशः 954,864,336,190 तथा 114 अरब डॉलर हो गया है। कहना ग़लत नहीं होगा कि इससे वैश्विक जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) पर भार में बढ़ोत्तरी हुई है। जानकारी अनुसार दुनियाभर में सैन्य खर्च के चलते वैश्विक जीडीपी पर भार 2024 में 2.4% था, जो 2025 में बढ़कर 2.5% हो गया है। दुनियाभर में सरकारों का सेना पर औसत खर्च 2024 में 7% था, जो 2025 में घटकर 6.9% हो गया है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि ईरान-इजरायल का खर्च घटा है। पाठकों को बताता चलूं कि इजरायल का सैन्य खर्च 4.9 फीसदी घटकर 48.3 अरब डॉलर रहा, वहीं दूसरी ओर ईरान का खर्च लगातार दूसरे साल घटा, तथा वर्ष 2025 में यह 7.4 अरब डॉलर रह गया। आंकड़े बताते हैं कि नाटो का सैन्य खर्च 14 फीसदी बढ़कर कुल 864 अरब डॉलर हो गया, वहीं पर स्पेन ने सैन्य खर्च 50 फीसदी बढ़ाया है, और कुल बजट 40.2 अरब डॉलर हो गया। इधर, मध्य-पूर्व में सेना पर 218 अरब डॉलर खर्च हुए, वर्ष 2024 से 0.1% कम। हाल फिलहाल, यहां पाठकों को बताता चलूं कि भारत के रक्षा खर्च में वृद्धि की एक बड़ी वजह पिछले मई में भारत-पाकिस्तान के बीच संघर्ष बताया गया है, जिसमें लड़ाकू विमानों, ड्रोन्स व मिसाइलों का इस्तेमाल हुआ। इसी के चलते पाकिस्तान का सैन्य खर्च भी 11 प्रतिशत बढ़कर 11.9 अरब डॉलर हो गया। दरअसल, पाकिस्तान ने चीन से नए हथियार भी खरीदे। गौरतलब है कि इससे वैश्विक स्तर पर सैन्य खर्च का बोझ (जीडीपी के अनुपात में) 2.5 प्रतिशत तक पहुंच गया, जो कि साल 2009 के बाद सबसे अधिक है। मतलब यह है कि प्रति व्यक्ति औसतन 352 डॉलर सैन्य खर्च किया गया। रिपोर्ट बताती है कि अमेरिका का सैन्य खर्च 7.5% घटकर 954 अरब डॉलर रहा, जिसका कारण यूक्रेन को नई वित्तीय सहायता का न मिलना बताया गया। इसके विपरीत यूरोप में 14 प्रतिशत और एशिया व ओशिनिया क्षेत्र में 8.1 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। इतना ही नहीं, चीन दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा सैन्य खर्च करने वाला देश है। दरअसल , चीन ने साल 2025 में अपना रक्षा बजट 7.4 प्रतिशत बढ़ाकर 336 अरब डॉलर कर दिया। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि यह लगातार 31 वां वर्ष है जब चीन ने अपने देश का रक्षा खर्च बढ़ाया है। रिपोर्ट के अनुसार वैश्विक स्तर पर युद्ध, भू-राजनीतिक तनाव व सुरक्षा चिंताओं के चलते देशों ने हथियारों व रक्षा तैयारियों पर खर्च बढ़ाया है। बहरहाल, यहां यह कहना ग़लत नहीं होगा कि किसी भी देश द्वारा अत्यधिक सैन्य खर्च के फायदे और नुकसान दोनों ही होते हैं। वास्तव में, यह किसी देश की सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और सामाजिक विकास पर सीधा प्रभाव डालता है।अत्यधिक सैन्य खर्च के फायदे यह हैं कि इससे किसी देश विशेष की जहां एक ओर राष्ट्रीय सुरक्षा मजबूत होती है, वहीं दूसरी ओर इससे रोजगार के अवसर भी बढ़ते हैं। सरल शब्दों में कहें तो सेना, रक्षा उद्योग, हथियार निर्माण, अनुसंधान और तकनीकी क्षेत्रों में नौकरियां पैदा होती हैं।अत्यधिक सैन्य खर्च से किसी देश कातकनीकी विकास होता है। वास्तव में रक्षा अनुसंधान से नई-नई तकनीकें विकसित होती हैं, जिनका उपयोग बाद में आम जनता के लिए भी होता है (जैसे इंटरनेट, जीपीएस आदि)। सैन्य खर्च में बढ़ोत्तरी से उस देश विशेष का अंतरराष्ट्रीय प्रभाव बढ़ता है। कहना ग़लत नहीं होगा कि आज मजबूत सैन्य शक्ति वाला देश वैश्विक राजनीति में अधिक प्रभावशाली माना जाता है। इतना ही नहीं एक फायदा यह भी है कि इससे(अत्यधिक सैन्य खर्च से) सेना युद्ध के अलावा बाढ़, भूकंप, महामारी जैसी आपदाओं में भी मदद करती है। वहीं दूसरी ओर अत्यधिक सैन्य खर्च की बात करें तो इसके नुकसान भी कम नहीं हैं। मसलन, इससे शिक्षा और स्वास्थ्य पर व्यापक असर पड़ता है। सरल शब्दों में कहें तो ज्यादा पैसा सेना पर खर्च होने से शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और विकास योजनाओं के लिए कम धन बचता है और उस देश विशेष पर आर्थिक दबाव बढ़ता है। यदि कोई देश अत्यधिक सैन्य बजट खर्च करता है तो इससे सरकारी घाटा, कर्ज और महंगाई बढ़ सकती है। इतना ही नहीं, दुनिया में एक दूसरे की देखा-देखी में हथियारों की होड़ बढ़ती है, व तनाव व युद्ध का कारण बनता है।सामाजिक असंतुलन का भी जन्म होता है, जैसा कि यदि जनता गरीबी, बेरोजगारी से जूझ रही हो और सरकार हथियारों पर अधिक खर्च करे, तो असंतोष पैदा हो सकता है। अतः अंत में निष्कर्ष के तौर पर यही कहूंगा कि आज के समय में यह बात ठीक है किसी भी देश द्वारा अपने देश की संप्रभुता व सुरक्षा को बनाए रखने के लिए सैन्य खर्च बहुत ही जरूरी व आवश्यक है, लेकिन अत्यधिक सैन्य खर्च संतुलित नीति नहीं माना जाता है। अतः किसी भी देश को यह चाहिए कि वह सुरक्षा के साथ-साथ शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और विकास पर भी बराबर ध्यान दे, ताकि वह देश प्रगति व उन्नयन के पथ की ओर अग्रसर हो सके। (-सुनील कुमार महला, फ्रीलांस राइटर, कॉलमिस्ट व युवा साहित्यकार, पिथौरागढ़, उत्तराखंड।) ईएमएस / 29 अप्रैल 26