लेख
14-Mar-2026
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भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर सरकार लगातार मजबूती और तेज विकास के बड़े-बड़े दावे करती है। लेकिन हाल के आर्थिक संकेतक एक अलग ही तस्वीर प्रस्तुत कर रहे हैं। भारतीय शेयर बाजार में लगातार गिरावट बनी हुई है। बैंकों में धन कम जमा हो रहा है। लोग बैंकों से पैसे निकाल कर सोने-चांदी में निवेश कर रहे हैं। निर्यात में लगातार गिरावट, विदेशी मुद्रा प्रवाह में कमी, शेयर बाजार की तेज गिरावट और बढ़ती महंगाई ने आर्थिक स्थिति को लेकर गंभीर चिंताएं पैदा कर दी हैं। पिछले तीन महीनों में भारतीय शेयर बाजार के प्रमुख सूचकांक बीएसई का सेंसेक्स और निफ्टी 50 में लगभग 10,000 अंकों की गिरावट दर्ज हुई है। इससे निवेशकों में घबराहट का माहौल बना है। विदेशी निवेशक शेयर बजार से बाहर निकल गये हैं। वित्तीय संस्थाओं को शेयर बाजार की गिरावट से भारी नुकसान हुआ है। देश के प्रमुख बैंक, बीमा कंपनियां और म्यूचुअल फंड विशेषकर भारतीय जीवन बीमा निगम का बहुत बड़ा निवेश शेयर बाजार और कॉर्पोरेट क्षेत्र में है। बाजार गिरने से इन संस्थाओं को भारी नुकसान हुआ है। जिससे वित्तीय स्थिति पर दबाव बढ़ना स्वाभाविक है। इस बीच कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की कीमतों की वृद्धि ने भारतीय अर्थव्यवस्था पर अतिरिक्त बोझ डाल दिया है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है। इसलिए वैश्विक कीमतों में बढ़ोतरी से महंगाई और चालू खाते के घाटे से भारतीय अर्थव्यवस्था दिन-प्रतिदिन चिंता को बढ़ा रही है। निर्यात व्यापार में गिरावट और प्रवासी भारतीयों से आने वाली विदेशी मुद्रा में कमी ने भी स्थिति को और भी चुनौतीपूर्ण बना दिया है। यदि यही स्थिति जारी रही तो रोजगार के अवसरों पर भी गंभीर असर पड़ सकता है। बेरोजगारी तथा महंगाई दोनों बढ़ सकती हैं। जिसका सबसे ज्यादा असर भारत की जीडीपी पर होगा। इन परिस्थितियों को देखते हुए भारत सरकार द्वारा आपातकालीन आर्थिक प्रबंधन के लिए एक लाख करोड़ रुपये का फंड तैयार करने की घोषणा की गई है। जो इस बात का संकेत देती हैं, भारत सरकार और वित्तीय संस्थाओं को संभावित आर्थिक संकट का अहसास हो चुका है। सबसे चिंताजनक पहलू यह है, यदि वित्तीय संस्थाओं और बैंकों का नुकसान शेयर बाजार की गिरावट से बढ़ता है तो इसका प्रभाव आम जमाकर्ताओं तक भी पहुंच सकता है। अर्थ- विशेषज्ञों के अनुसार आर्थिक संकट केवल वित्तीय आंकड़ों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक स्थिरता को भी प्रभावित करता है। ऐसे समय में भारत सरकार को पारदर्शी आर्थिक नीति, निवेश को प्रोत्साहन, निर्यात में वृद्धि और रोजगार सृजन के लिए गंभीर दूरगामी प्रयास आवश्यक हैं। वास्तविक स्थिति के विपरीत दावों और घोषणाओं से अर्थव्यवस्था मजबूत नहीं होती है। इसके लिए सरकार को ठोस और विश्वसनीय नीतिगत स्तर पर आर्थिक निर्णय लेने होंगे। सरकार को उद्योगों और रोजगार को बढ़ाने, आम जनता का विश्वास बैंकों और वित्तीय संस्थाओं पर बना रहे। अर्थ व्यवस्था को लेकर सरकारी अधिकारियों की जबावदेही तय करने के साथ विपक्षी दलों को वर्तमान स्थिति में विश्वास में लेना होगा। यदि ऐसा नही हुआ तो भारत को कई अन्य मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है। सरकार और विपक्ष के बीच जिस तरह का टकराव और अविश्वास देखने को मिल रहा है, यह भारत की अर्थ-व्यवस्था को लेकर और भी चिंता बढ़ाने वाला है। एसजे/ 14 मार्च /2026