राष्ट्रीय
14-Mar-2026


नई दिल्ली(ईएमएस)। दिल्ली हाईकोर्ट ने एक भारतीय मां और पाकिस्तानी मूल के ब्रिटिश पिता के बीच चल रहे पारिवारिक विवाद में ऐतिहासिक टिप्पणी करते हुए कहा है कि बच्चों की भलाई और उनका कल्याण किसी भी विदेशी अदालत के फैसले से ऊपर है। अदालत ने स्पष्ट किया कि भले ही ब्रिटेन के एक हाईकोर्ट ने बच्चों को पिता के पास वापस भेजने का आदेश दिया हो, लेकिन भारतीय कानून की दृष्टि में नाबालिगों की खुशी और सुरक्षा सर्वोपरि है। न्यायमूर्ति नवीन चावला और न्यायमूर्ति रविन्द्र डुडेजा की पीठ ने इस आधार पर पाकिस्तान मूल के ब्रिटिश नागरिक द्वारा दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका को खारिज कर दिया। यह मामला एक ऐसे दंपति का है जिनका विवाह 2011 में सऊदी अरब में हुआ था और पंजीकरण ब्रिटेन में कराया गया था। इनके दो बेटे हैं, जिनकी उम्र वर्तमान में 12 और 8 वर्ष है। पिता का आरोप था कि पत्नी अगस्त 2023 में एक शादी में शामिल होने के बहाने बच्चों को भारत लाई थी, लेकिन उसके बाद उसने वापस आने से इनकार कर दिया और दिल्ली की एक परिवार अदालत में बच्चों की कस्टडी के लिए याचिका दायर कर दी। पिता का तर्क था कि बच्चे ब्रिटिश नागरिक हैं और यूके हाईकोर्ट उनके हक में आदेश दे चुका है, इसलिए बच्चों को तुरंत उन्हें सौंपा जाना चाहिए। हालांकि, दिल्ली हाईकोर्ट ने मामले की गहराई से जांच करने के बाद पाया कि दोनों बच्चे पिछले एक साल से दिल्ली में अपनी जैविक मां के साथ पूरी तरह सुरक्षित हैं और शहर के एक प्रतिष्ठित स्कूल में शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। अदालत ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि बच्चे यहां अपने नाना, मौसी और संयुक्त परिवार के साथ खुशी-खुशी रह रहे हैं और उन्होंने खुद यहीं रहने की इच्छा जताई है। पीठ ने कहा कि बच्चों को उनके नाना-नानी के संयुक्त परिवार के स्नेह से दूर करना उनके मानसिक विकास के लिए सही नहीं होगा। अदालत के अनुसार, दो अलग-अलग देशों के माता-पिता के बीच के विवाद में बच्चों को प्यादा नहीं बनाया जा सकता। विदेशी अदालत का आदेश बच्चों के सर्वोत्तम हितों के खिलाफ लागू नहीं किया जा सकता, खासकर तब जब वे भारत में एक स्थिर और सुरक्षित वातावरण में रह रहे हों। वीरेंद्र/ईएमएस/14मार्च2026 ------------------------------