क्षेत्रीय
15-Mar-2026
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- हाईकोर्ट ने रेंट कंट्रोल ट्रिब्यूनल और अथॉरिटी के आदेशों को चुनौती देने वाली रिट याचिका को खारिज किया बिलासपुर (ईएमएस)। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने रेंट कंट्रोल ट्रिब्यूनल और अथॉरिटी के आदेशों को चुनौती देने वाली रिट याचिका को खारिज कर दिया है। हाईकोर्ट ने कहा है कि जहां सक्षम सिविल कोर्ट में मालिकाना हक (टाइटल) का विवाद लंबित हो और वैधानिक अधिकारियों ने तथ्यों पर एकमत निष्कर्ष दर्ज किए हों, वहां रिट कोर्ट को अपने पर्यवेक्षी अधिकार क्षेत्र (सुपरविजनरी ज्यूरिस्डिक्शन)में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा, न्यायमूर्ति बिभु दत्त गुरु की खंडपीठ ने एक महिला द्वारा अपने ही पति और उनके भाइयों के खिलाफ दायर बेदखली याचिका को खारिज करने के फैसले को बरकरार रखा। कोर्ट ने कहा है कि केवल स्वामित्व होना स्वत: ही मकान मालिक और किराएदार के कानूनी संबंध को स्थापित नहीं करता है, विशेष रूप जब मामला पारिवारिक संदर्भ में हो। यह है मामला याचिकाकर्ता हलीमा बेगम ने छत्तीसगढ़ रेंट कंट्रोल एक्ट के तहत रायपुर स्थित 280 वर्ग फुट की एक दुकान से अपने पति और उनके पांच भाइयों को बेदखल करने और बकाया किराए की वसूली की मांग की थी। याचिका के मुताबिक यह संपत्ति मूल रूप से राधाबाई की थी, जिसे उन्होंने 14 फरवरी, 2000 को पंजीकृत सेल डीड के माध्यम से खरीदा था। उनका दावा था कि उनके ससुर स्वर्गीय नजीर अहमद 1977-78 से 110 रुपए प्रति माह पर किरायेदार थे। उनकी मृत्यु के बाद, उनके उत्तराधिकारियों (प्रतिवादियों) ने दुकान में अहमद किराना स्टोर्स का व्यवसाय जारी रखा। संयुक्त पारिवारिक संपत्ति से जुड़ा मामला याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि संपत्ति खरीदने के बाद प्रतिवादी कानूनन उनके किराएदार बन गए, लेकिन उन्होंने नियमित किराया नहीं दिया। जवाब में प्रतिवादियों ने कहा कि यह विवाद संयुक्त पारिवारिक संपत्ति से जुड़ा है। यह संपत्ति अहमद किराना स्टोर्स की संयुक्त पारिवारिक आय से याचिकाकर्ता के नाम पर खरीदी गई थी। उन्होंने मकान मालिक-किरायेदार के किसी भी संबंध से इनकार किया और दावा किया कि वे सह-मालिक के रूप में काबिज हैं। इसके साथ ही पिछले 15 वर्षों से किराए के भुगतान या स्वामित्व स्वीकार करने का कोई दस्तावेजी प्रमाण नहीं है। इसके साथ ही संपत्ति के मालिकाना हक को लेकर एक सिविल प्रकरण पहले से ही हाईकोर्ट में लंबित है। कोई रेंट एग्रीमेंट नहीं, पारिवारिक रिश्ते का भी महत्व दोनों पक्षों की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि रेंट कंट्रोल अथॉरिटी ने सेल डीड के आधार पर याचिकाकर्ता के स्वामित्व को तो स्वीकार किया, लेकिन यह सही पहचान की कि केवल मालिकाना हक होना स्वत: ही मकान मालिक-किरायेदार का कानूनी संबंध स्थापित नहीं करता है। इसके साथ ही किराए के भुगतान, या किसी दस्तावेजी प्रमाण जैसे रेंट एग्रीमेंट या रेंट रसीद भी उपलब्ध नहीं है जिससे साबित हो सके कि दोनों पक्षों के बीच मकान मालिक-किराएदार का संबंध है। हाईकोर्ट ने इस बात पर भी जोर दिया कि खरीद के लगभग 15 साल बाद तक याचिकाकर्ता ने न तो किराये की मांग की और न ही प्रतिवादियों को किरायेदार मानते हुए कोई नोटिस जारी किया। कोर्ट ने कहा कि मकान मालिक-किराएदार के संबंध को तय करने के लिए याचिकाकर्ता का प्रतिवादियों के साथ पारिवारिक रिश्ता भी महत्व रखता है। मनोज राज 15 मार्च 2026