वाराणसी (ईएमएस)। वैदिक विज्ञान केंद्र, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी द्वारा दिनांक 16-18 मार्च, 2026 को वैदिक विज्ञान के विविध स्वरूप विषय पर त्रिदिवसीय अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया जा रहा है। इस कार्यक्रम का द्वितीय दिवस का प्रथम तकनीकी सत्र यज्ञ विज्ञान आज 17 मार्च,2026 को प्रात: 10:30 बजे से प्रारम्भ हुआ। प्रथम सत्र कार्यक्रम के मुख्यातिथि जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के प्रो. रामनाथ झा एवं अध्यक्ष पूर्व संकायप्रमुख प्रो. श्रीकिशोर मिश्र, कला संकाय, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी रहे। इस प्रथम तकनीकी सत्र के मुख्यातिथि प्रो. रामनाथ झा, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली ने कहा कि वेद ही विज्ञान है, दर्शन शब्द ऋषियों से आया है, जबकि फिलॉसॉफी लॉजिकल अनुभूति है। भारतीय ज्ञान परमपरा के अनुसार देखकर अनुभव करना अर्थात् प्रत्यक्ष ज्ञान की बात करते है, जबकि पश्चिमी ज्ञान परम्परा के अनुसार तार्किक विश्लेषण के माध्यम शोध कार्य करते है। पदार्थ विज्ञान परमाणु को फण्डामेन्टल मानता है, जबकि न्याय भी यही मानता है। क्वांटम भौतिकी के अनुसार सब कुछ एक दूसरे से जुड़ा हुआ है यही भगवान् श्रीकृष्ण कहते है कि सभी लोग एक दूसरे जुड़े हुए है, इसको हम विभाज्य नहीं कर सकते। मनुष्य और ब्रह्माण्ड के बीच एक चक्र है। उपनिषद् का ज्ञान जर्मनी गया जहॉं पर मनुष्य और प्रकृति के बीच सम्बन्धों पर शोध पर शोध हुआ, जिसका नाम इकोलॉजी निकल कर आया। प्रथम तकनीकी सत्र के विशिष्टातिथि प्रो. उपेन्द्र कुमार त्रिपाठी, वेद विभाग, सं.वि.ध.वि. संकाय, का.हि.वि.वि., वाराणसी ने कहा कि यज्ञ विज्ञान के अन्तर्गत सम्पूर्ण सृष्टि समाहित है हमारे जीवन का मूल आधार यज्ञ है और यज्ञों का मूल आधार अग्निहोत्र है। प्रथम तकनीकी सत्र के विशिष्टवक्ता प्रो. महेन्द्र पाण्डेय, वेद-वेदांग संकायप्रमुख, सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी ने कहा कि भारतीय संस्कृति क्या है, सभ्यता क्या है को जानने के लिए यज्ञ को समझना जरूरी है। विश्वकल्याण के लिए हम क्या कर सकते है आज जगह-जगह दो या दो से अधिक देशों के बीच युद्ध चल रहा है। सृष्टि की रक्षा के लिए यज्ञ का ज्ञान बहुत जरूरी है, विश्वसृष्टि का विज्ञान ही यज्ञ है। प्रथम तकनीकी सत्र के सारस्वतातिथि प्रो. हरीश्वर दीक्षित, वेद विभाग, सं.वि.ध.वि. संकाय, का.हि.वि.वि., वाराणसी ने कहा कि वेद में विज्ञान अथवा वेद का विज्ञान चर्चा का विषय है। इन्होंने कहा कि आज हम वैश्विक संकट के दौर से गुजर रहे हैं सम्पूर्ण सृष्टि के विकास के लिए यज्ञ विज्ञान के क्षेत्र में शोध की जरूरत है। प्रथम तकनीकी सत्र के मुख्य वक्ता प्रो. रामराज उपाध्याय, पौराहित्य विभाग, श्रीलालबहादुरशास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली ने कहा कि वैदिक विज्ञान है यज्ञ। इस सत्र के अध्यक्ष पूर्व संकायप्रमुख प्रो. श्रीकिशोर मिश्र, कला संकाय, का.हि.वि.वि., वाराणसी ने सभी विद्वानों द्वारा किये हुए उद्बोधन को प्रमुखता से प्रकाश डाला। इस कार्यक्रम का द्वितीय तकनीकी सत्र के मुख्यातिथि प्रो. आशीष वाजपेयी, निदेशक, प्रबंध अध्ययन संस्थान, का.हि.वि.वि. ने कहा कि इस कार्यक्रम में देश-विदेश से आये हुए अध्यापक, अध्येयता, शोध छात्रों ने शोध पत्र का वाचन किया तथा सत्र के संयोजन एवं संचालन डॉ. पवन पाण्डेय, सस्कृत विभाग, कला संकाय ने किया। इस कार्यक्रम का द्वितीय तकनीकी सत्र यज्ञ विषय पर चर्चा की और कहा कि संघे शक्ति युगेयुगे। योग्यता के अनुसार किसको कौन सा कार्य सौंपना है मीमांसा शास्र में बताया गया है साथ ही क्रम की बात की गयी कि राज दरबार में कौन आगे बैठेगा या कौन पीछे बैठेगा। इस कार्यक्रम का द्वितीय तकनीकी सत्र के सारस्वतातिथि प्रो. माधव जनार्दन रटाटे, धर्मशास्त्र मीमांस विभाग, सं.वि.ध.वि. संकाय, का.हि.वि.वि., वाराणसी ने कहा कि धर्मशास्त्र व मीमांसा में प्रबन्धशास्त्र विषय पर चर्चा की और कहा कि संघे शक्ति युगेयुगे। योग्यता के अनुसार किसको कौन सा कार्य सौंपना है मीमांसा शास्र में बताया गया है साथ ही क्रम की बात की गयी कि राज दरबार में कौन आगे बैठेगा या कौन पीछे बैठेगा। इस कार्यक्रम का द्वितीय तकनीकी सत्र के विशिष्टातिथि डॉ. वी. रामनाथन, रसायन विभाग, आईआईटी (बीएचयू), वाराणसी ने कहा कि समस्त ज्ञान का स्रोत वेद है, जिसका गंभीरता से शोध की आवश्यकता है। इस कार्यक्रम का द्वितीय तकनीकी सत्र के अध्यक्ष प्रो. कौशलेन्द्र पाण्डेय, पूर्व संकायप्रमुख, सं.वि.ध.वि. संकाय, का.हि.वि.वि., वाराणसी ने समस्त व्याख्यानों पर वैदिक प्रकाश डाला। इसी क्रम में तृतीय तकनीकी सत्र पर्यावरण एवं जीवन दर्शन विषय पर चर्चा हुई, जिसके मुख्यातिथि प्रो. बलराम पाढ़ी, डीन ऑफ कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय, नई दिल्ली ने कहा कि माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः: अथर्ववेद के पृथ्वी सूक्त में पृथ्वी को माता और मनुष्य को पुत्र माना गया है, जो प्रकृति के प्रति सम्मान और संरक्षण की भावना जगाता है। मुख्यवक्ता प्रो. गोपबन्धु मिश्र, पूर्व कुलपति, श्रीसोमनाथ संस्कृत श्विविद्यालय, सोमनाथ, मुख्यवक्ता ने कहा कि पर्यावरण संरक्षण के निर्देश: वेदों में वृक्षारोपण को पुण्य कर्म बताया गया है, और अथर्ववेद में जल संचय व नदी प्रदूषण रोकने के संदेश हैं। कार्यक्रम के प्रारम्भ में अतिथियों का स्वागत अंगवस्त्र, मोमेंटो द्वारा प्रो0 विनय कुमार पाण्डेय, समन्वयक, वैदिक विज्ञान केन्द्र, का.हि.वि.वि. ने किया। कार्यक्रम का प्रारम्भ महामना मालवीय जी की प्रतिमा पर मार्ल्यापण एवं दीप प्रज्ज्वल से हुआ। सत्र का संचालन एवं धन्यवाद ज्ञापन डॉ. एस. श्रीराम, धर्मशास्त्र विभाग, सं.वि.ध.वि. संकाय, का.हि.वि.वि., वाराणसी ने किया। डॉ नरसिंह राम/17/03/2026