नई दिल्ली,(ईएमएस)। भारत का स्वदेशी नेविगेशन सिस्टम नाविक (नाविक) वर्तमान में गंभीर संकट में है। कुल 11 सैटेलाइट में से केवल 3 ही काम कर रहे हैं, जबकि प्रणाली के सुचारू संचालन के लिए करीब 4 सैटेलाइट की आवश्यकता होती है। इसमें से एक सैटेलाइट की उम्र 10 साल से अधिक हो चुकी है और यह कभी भी फेल हो सकता है। नाविक की स्थिति से भारतीय सेना की नेविगेशन, मिसाइल मार्गदर्शन और सटीक हमलों की क्षमता पर बड़ा खतरा है। बात दें कि 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान अमेरिका ने भारत को जीपीएस की सटीक जानकारी देने से इंकार किया था। इससे भारतीय सेना को हिमालय की ऊंची चोटियों में नेविगेशन और सटीक हमले करने में मुश्किल हुई। इसी अनुभव से प्रेरित होकर भारत ने अपना स्वदेशी नेविगेशन सिस्टम विकसित करने का निर्णय लिया। इसरो ने 2013 से 2018 के बीच आईआरएनएसएस (भारतीय क्षेत्रीय नौवहन उपग्रह प्रणाली) सैटेलाइट्स लांच किए, जिन्हें बाद में नाविक नाम दिया। यह भारत और उसके 1500 किमी के आसपास के क्षेत्र में पोजीशन, नेविगेशन और टाइमिंग सर्विस प्रदान करता है। जबकि अमेरिका का जीपीएस, चीन का बीडौ, यूरोप का गैलीलियो और रूस का ग्लोनास वैश्विक स्तर पर काम करते हैं। पहली पीढ़ी के 9 सैटेलाइट में से 8 अंतरिक्ष में पहुंचे। इसमें से 5 सैटेलाइट में सभी एटॉमिक क्लॉक फेल हो गए, जो सैटेलाइट का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसके कारण ये सैटेलाइट बेकार हो गए। वर्तमान में केवल 3 सैटेलाइट (आईआरएनएसएस-1बी, 1एफ, 1आई) काम कर रहे हैं। आईआरएनएसएस-1बी की उम्र 11 साल हो चुकी है और आईआरएनएसएस-1एफ का आखिरी एटॉमिक क्लॉक मार्च 2026 में फेल हो गया, जिससे अब यह केवल मैसेजिंग सर्विस दे सकता है। पहली पीढ़ी की विफलताओं से सीखकर इसरो ने एनवीएस सीरीज (दूसरी पीढ़ी) शुरू की। एनवीएस-01 मई 2023 में सफलतापूर्वक लांच हुआ, लेकिन एनवीएस-02 जनवरी 2025 में गलत ऑर्बिट में फंस गया और नेविगेशन सर्विस नहीं दे पा रहा। कुल 5 एनवीएस सैटेलाइट की जरूरत है, लेकिन केवल एक ही ठीक काम कर रहा है। बाकी सैटेलाइट की लॉन्चिंग में देरी है। अंतरराष्ट्रीय तुलना अमेरिका का जीपीएस 30 सैटेलाइट के साथ चलता है, जबकि आवश्यकता सिर्फ 24 की है। चीन का बीडौ 35 सैटेलाइट से काम करता है। इसके विपरीत, भारत का नाविक जो कम से कम 4 सैटेलाइट पर चलना चाहिए, केवल 3 पर निर्भर है। यह स्थिति राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा उत्पन्न करती है। युद्ध की स्थिति में सेना को विदेशी जीपीएस पर निर्भर रहना पड़ेगा, जो जोखिम भरा है। खतरे और प्रभाव सेना की नेविगेशन और मिसाइल मार्गदर्शन प्रभावित होगा। युद्ध में सटीक हमले करने में समस्या आएगी। जहाज, विमान और जमीनी सैनिकों की लोकेशन गलत हो सकती है। पूरी तरह फेल होने पर भारत को विदेशी सिस्टम पर निर्भर होना पड़ेगा, जो राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा है। इसरो जल्द एनवीएस-03 और बाकी सैटेलाइट लांच करने की कोशिश कर रहा है। फिलहाल नाविक की स्थिति चिंताजनक है। यह केवल तकनीकी समस्या नहीं, बल्कि भारत की रक्षा क्षमता का संकट है। सरकार और इसरो को इस तुरंत सुलझाना होगा, अन्यथा युद्ध के समय बड़ा नुकसान हो सकता है। आशीष/ईएमएस 18 मार्च 2026