लेख
19-Mar-2026
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दुनियां में जब जब अत्याचार बढ़ा है,तब तब भगवान ने अपने भक्तों के लिए धरती में जन्म लिया है-1076 वीं झूलेलाल जयंती इसका प्रतीक झूलेलाल की1076वीं जयंती व पवित्र इस्लामिक त्योहार ईद- उल-फितर क़ा संयोग न केवल भारत की विविधता में एकता की परंपरा को दर्शाता है,बल्कि वैश्विक स्तरपर सांस्कृतिक सह- अस्तित्व,सहिष्णुता और भाईचारे का संदेश भी देता है -एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं की गोंदिया महाराष्ट्र गोंदिया - वैश्विक स्तरपर भारत सहित पूरे विश्व में वर्ष 2026 का मार्च महीना धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक समरसता का एक अनूठा उदाहरण प्रस्तुत कर रहा है। एक ओर सिंधी समाज के आराध्य देव झूलेलाल की 1076वीं जयंती का भव्य आयोजन हो रहा है,वहीं दूसरी ओर पवित्र इस्लामिक त्योहार ईद-उल- फितर भी लगभग उसी समय मनाए जाने की संभावना है। यह संयोग न केवल भारत की विविधता में एकता की परंपरा को दर्शाता है,बल्कि वैश्विक स्तरपर सांस्कृतिक सह-अस्तित्व, सहिष्णुता और भाईचारे का संदेश भी देता है।सिंधी समाज के लिए चेटीचंड केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि उनकी सांस्कृतिक पहचान,ऐतिहासिक विरासत और सामाजिक एकता का प्रतीक है। यह दिन झूलेलाल साहिब के अवतरण दिवस के रूप में मनाया जाता है, जिन्हें जल के देवता और सत्य एवं न्याय के संरक्षक के रूप में पूजा जाता है।मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह बताना चाहता हूं कि विश्वभर में फैले सिंधी समुदाय चाहे वे भारत में हों या अमेरिका, दुबई, यूके, अफ्रीका या एशिया के अन्य देशों में इस दिन को अत्यंत श्रद्धा,उल्लास और भव्यता के साथ मनाते हैं।वर्ष 2026 में यह उत्सव और भी विशेष बन गया है क्योंकि इसे सात दिवसीय चेटीचंड पखवाड़ा महोत्सव के रूप में 15 से 20 मार्च तक व्यापक स्तर पर आयोजित किया जा रहा है। विभिन्न झूलेलाल जयंती समारोह समितियों, पंचायतों, सामाजिक संगठनों,सिंधी विद्यालयों तथा व्यापारिक और धार्मिक संस्थाओं के सहयोग से यह आयोजन एक वैश्विक सांस्कृतिक उत्सव का रूप ले चुका है। इस दौरान आयोजित होने वाले कार्यक्रम न केवल धार्मिक भावनाओं को अभिव्यक्त करते हैं,बल्कि समाजसेवा,स्वास्थ्य जागरूकता सांस्कृतिक संरक्षण और युवा सहभागिता को भी प्रोत्साहित करते हैं।इस सप्ताह के दौरान प्रभात फेरियों से दिन की शुरुआत होती है, जिसमें श्रद्धालु भजन-कीर्तन करते हुए झूलेलाल साहिब की महिमा का गुणगान करते हैं। रक्तदान शिविरों का आयोजन समाज के प्रति जिम्मेदारी और मानवता की सेवा का संदेश देता है। चित्रकला प्रतियोगिताएं बच्चों और युवाओं की रचनात्मकता को मंच प्रदान करती हैं, वहीं योग शिविर स्वास्थ्य और संतुलित जीवनशैली को बढ़ावा देते हैं। व्यापार मेलों और आनंद मेलों के माध्यम से स्थानीय व्यापार को प्रोत्साहन मिलता है और सामाजिक मेलजोल बढ़ता है।महिलाओं की स्कूटर रैली और रंगोली कार्निवल जैसे आयोजन महिलाओं की सक्रिय भागीदारी और सशक्तिकरण का प्रतीक हैं। छप्पन भोग जैसे धार्मिक प्रसाद और फूड फेस्टिवल इस उत्सव को स्वाद और परंपरा का अनूठा संगम बना देते हैं। 19 मार्च को भव्य आतिशबाजी और सांस्कृतिक कार्यक्रम इस उत्सव को चरम पर पहुंचाते हैं, जहां संगीत, नृत्य और भक्ति का अद्भुत समागम देखने को मिलता है। साथियों बात अगर हम 20 मार्च 2026 के महत्व को समझने की करें तो यह दिन इस उत्सव का मुख्य दिन होगा,जब विश्वभर में विशाल शोभायात्राएं निकाली जाएंगी।इन जुलूसों में झूलेलाल साहिब की सजीव झांकियां, पारंपरिक वेशभूषा में सजे श्रद्धालु भक्ति संगीत और नृत्य की झलकियां देखने को मिलेंगी।मैराथन स्कूटर रैली, आम भंडारे और सामूहिक भोज जैसे कार्यक्रम इस दिन को और अधिक विशेष बनाते हैं। यह केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सामाजिक एकता और सामुदायिक सहयोग का उत्सव है।इसी समय, इस्लाम धर्म के अनुयायियों के लिए पवित्र रमजान माह के समापन पर मनाया जाने वाला ईद-उल- फितर भी 20 या 21 मार्च को पड़ने की संभावना है,जो चांद के दीदार पर निर्भर करता है। यह त्योहार अल्लाह के प्रति आभार, आत्मसंयम, दान और करुणा का प्रतीक है। रमजान के पूरे महीने रोजा रखने के बाद ईद का दिन खुशी, संतोष और आध्यात्मिक संतुलन का संदेश लेकर आता है। ईद के दिन विशेष नमाज अदा की जाती है, फितरा(दान) दिया जाता है और लोग एक-दूसरे को गले लगाकर ईद मुबारक कहते हैं। सेवइयां और अन्य मिठाइयों का वितरण इस पर्व की पहचान है, जो इस बात को दर्शाता है कि खुशी तब और अधिक बढ़ जाती है जब उसे दूसरों के साथ साझा किया जाए। यह त्योहार सामाजिक समरसता, परस्पर सम्मान और भाईचारे को सटीक रूप से मजबूत करता है। साथियों बात अगर हम जब चेटीचंड और ईद-उल- फितर जैसे दो महत्वपूर्ण पर्व एक ही समय पर आते हैं, तो यह भारत की गंगा-जमुनी तहजीब का जीवंत उदाहरण बन जाता है। यहां विभिन्न धर्मों के लोग एक-दूसरे के त्योहारों में भाग लेते हैं,शुभकामनाएं देते हैं और आपसी प्रेम को बढ़ाते हैं। यह परंपरा केवल भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि विश्वभर में बसे भारतीय और सिंधी समुदाय भी इसे अपनाते हैं, जिससे वैश्विक स्तर पर सांस्कृतिक सौहार्द को बढ़ावा मिलता है।इस अवसर की महत्ता को देखते हुए भारत के कई राज्यों मध्यप्रदेश, गुजरात, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में सार्वजनिक या क्षेत्रीय अवकाश घोषित किया गया है। कुछ स्थानों पर चैत्र शुक्लादि, गुड़ी पड़वा, उगादी और चेटीचंड को एक ही श्रेणी में रखते हुए 19 मार्च 2026 को भी अवकाश घोषित किया गया है। यह दर्शाता है कि भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था भी विविध धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं का सम्मान करती है और उन्हें प्रोत्साहित करती है।यह अवकाश केवल एक छुट्टी नहीं, बल्कि लोगों को अपने धार्मिक और सांस्कृतिक कर्तव्यों को निभाने, परिवार और समाज के साथ समय बिताने और परंपराओं को आगे बढ़ाने का अवसर प्रदान करता है। यह सामाजिक एकता और सांस्कृतिक संरक्षण की दिशा में एक बहुत ही महत्वपूर्ण कदम है। साथियों बात अगर हम इस झूलेलाल जयंती महोत्सव चेट्रीचंड्र की करें तो, चेट्री चंड्र सिंधियों द्वारा मनाये जाने वाला महत्पूर्ण त्यौहार है। हर साल इसे चैत्र शुक्ल पक्ष के दुसरे दिन मनाया जाता है।इस बार ये 20 मार्च 2026, को मनाया जाएग़ा।ज्यादातर ये त्यौहार गुडी पड़वा व उगडी के दुसरे दिन पड़ता है, इसे पड़ोसी देश सहित विश्व के हर देश में में रहने वाले सिन्धी भी मनाते है। इस दिन चाँद कई दिनों बाद पूरा नजर आता है, सभी लोग जल देव की आराधना करते है। चेट्रीचंड्र त्यौहार सिन्धी समाज द्वारा अपने इष्टदेव झुलेलाल जी की याद में मनाया जाता है। इस दिन सिन्धी समाज जल देव व झुलेलाल जी की पूजा अर्चना करता है,सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किये जाते है, जूलूस निकाले जाते है। इस दिन प्रसाद के तौर पर उबले काले चने व मीठा भात श्रद्धा पूर्वक सबको दिया जाता है। साथियों बात अगर हम झूलेलाल जयंती महोत्सव चेट्रीचंड्र मनाने के कारणों की करें तो दुनियां में जब जब अत्याचार बढ़ा है, तब तब भगवान ने अपने भक्तों के लिए धरती में जन्म लिया है। युगों से ये बात चली आ रही है, भारत देश में कई भगवान, साधू संत ने जन्म लिया और दुनियां को सही गलत में फर्क समझाया है। सभी समाज धर्म के भगवान पाप को ख़त्म करने के लिए इस धरती पर आये- राम, कृष्ण, अल्लाह येशु ऐसे ही कुछ नाम है। ऐसे ही एक और भगवान इस धरती पर आये, जिन्हें झुलेलाल नाम से जाना जाता है। इन्हें सिन्धी समाज का इष्टदेव कहा जाता है। ये हिन्दू जाति के भगवान वरुण का अवतार है, जिनका जन्म 10 वीं शताब्दी के आस पास हुआ था। कुछ लोग इन्हें सूफी संत भी बोला करते है, जिन्हें मुस्लिम भी काफी पूजते थे। कुछ लोग इन्हें जल देव का अवतार मानते थे। सिन्धु घाटी की सबसे पहली व पुरानी सभ्यता मोहनजोदड़ो है,यही सिंध में ही झुलेलाल जी का जन्म हुआ था।उनके जन्म को आज भी सिन्धी समाज व पड़ोसी मुल्क के कुछ हिस्सों में लोग झुलेलाल जयंती या चेट्री चंड्र नाम से मनाते है। इस दिन ने सिन्धी समाज का नया वर्ष शुरू होता है, जिसे वे बड़ी धूमधाम से मनाते है। साथियों बात कर हम सिंधी समाज के इष्टदेव झूलेलाल के जन्मयाने अवतरण की करें तो, सिंधी समाज पर हो रहे अत्याचार की पुकार सुन जल देवता से आकाशवाणी के 2 दिन बाद चैत्र माह की शुक्ल पक्ष में नासरपुर (पाकिस्तान की सिन्धु घाटी) के देवकी व ताराचंद के यहाँ एक बेटे ने जन्म लिया, जिसका नाम उदयचंद रखा गया। हिंदी में उदय का मतलब उगना होता है। भविष्य में ये छोटा बच्चा हिन्दू सिन्धी समाज का रक्षक बना, जिसने मिरक शाह जैसे शैतान का अंत किया अपने नाम को चरितार्थ करते हुए उदयचंद जी ने सिंध के हिंदुओ के जीवन के अँधेरे को खत्म कर उजयाला फैला दिया। पहले उन्हें भगवान का रूप नहीं समझा गया, लेकिन अपने जन्म के बाद ही वे चमत्कार करने लगे। जन्म के बाद जब उनके माता पिता ने उनके मुख के अंदर पूरी सिन्धु नदी को देखा, जिसमें पलो नाम की एक मछली भी तैर रही थी, तब वे हैरान रह गए,इसलिए झुलेलाल जी को पले वारो भी कहा जाता है। बहुत से सिन्धी हिन्दू उन पर विश्वास करते थे, और उनको भगवान का रूप मानते थे, इसलिए कुछ लोग उन्हें अमरलाल भी कहते थे।झुलेलाल जी को उदेरोलाल भी कहते है, संस्कृत में इसका मतलब है कि जो पानी के करीब रहता है या पानी में तैरता है। बाल्यावस्था में उदयचंद को झुला बहुत पसंद था, वे उसी पर आराम करते थे, इसी के बाद उनका नाम झुलेलाल पड़ गया,उनकी माता देवकी उन्हें प्यार से झुल्लण बोलती थी, उनकी माता का देहांत छोटी उम्र में ही हो गया था, जिसके बाद उनका पालन पोषण सौतेली माँ ने ही किया। बता दें एक अन्याई राजा द्वारा हिंदुओ पर जुल्म करना शुरू कर दिया था, सभी हिंदुओ को बोला गया, कि उन्हें इस्लाम अपनाना होगा, नहीं तो उन्हें मार डाला जायेगा, ऐसे में सिंध के सभी हिन्दू बहुत घबरा गए, तब सभी हिंदुओ को सिन्धु के नदी के पास इक्कठे होने के लिए बुलावा भेजा गया हज़ारों की संख्या में लोग वहां इकट्टा हुए, सबने मिलकर जल देवता दरियाशाह की उपासना और प्रार्थना की, कि इस विपदा में वे उनकी मदद करें। सभी ने लगातर 40 दिनों तक तप किया, तब भगवान वरुण ने खुश होकर उन्हें आकाशवाणी के द्वारा बताया, कि वे नासरपुर में देवकी व ताराचंद के यहाँ जन्म लेंगें, वही बालक इनका रक्षक बनेगा। साथियों बात अगर हम वैश्विक स्तरपर इस उत्सव को समझने की करें तो सिंधी समुदाय ने अपनी सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखते हुए जिस प्रकार से चेटीचंड को एक अंतरराष्ट्रीय उत्सव का रूप दिया है, वह अद्वितीय है। यह समुदाय जहां भी गया, वहां अपनी परंपराओं, भाषा और संस्कृति को जीवित रखा और स्थानीय समाज के साथ समन्वय स्थापित किया। झूलेलाल जयंती इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जो आज केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि वैश्विक सांस्कृतिक उत्सव बन चुका है। इसके साथ ही ईद-उल-फितर का सार्वभौमिक संदेश करुणा, दान और भाईचारा-मानवता के लिए प्रेरणादायक है।यह हमें सिखाता है कि धर्म का मूल उद्देश्य मानव कल्याण, सामाजिक न्याय और प्रेम को बढ़ावा देना है। जब ये दोनों पर्व एक साथ मनाए जाते हैं, तो यह संदेश और भी प्रभावी हो जाता है कि विभिन्न आस्थाएं होते हुए भी हम एक साझा मानवता से जुड़े हुए हैं।आज के समय में,जब विश्व कई सामाजिक धार्मिक और राजनीतिक चुनौतियों का सामना कर रहा है, ऐसे अवसर हमें एकता, सहिष्णुता और आपसी सम्मान की ओर प्रेरित करते हैं।चेटीचंड और ईद-उल- फितर का यह संगम हमें यह याद दिलाता है कि हमारी विविधता ही हमारी सबसे बड़ी ताकत है और इसे संजोकर रखना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है। अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि वर्ष 2026 का यह समय केवल त्योहारों का उत्सव नहीं,बल्कि मानवता, संस्कृति और आध्यात्मिकता का महापर्व है। यह हमें सिखाता है कि चाहे हम किसी भी धर्म, भाषा या संस्कृति से जुड़े हों, हमारा मूल उद्देश्य प्रेम, शांति और सद्भाव को बढ़ावा देना होना चाहिए। साईं झूलेलाल साहिब की कृपा और ईद-उल-फितर के पावन संदेश के साथ, यह आशा की जा सकती है ईएमएस/19 मार्च2026