लेख
20-Mar-2026
...


बच्चों पर सोशल मीडिया के प्रभाव पर राज्यसभा में गंभीर चिंता व्यक्त की गई है । सांसद मिलिंद देवड़ा ने अपने वक्तव्य में बताया कि राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो के अनुसार, 2022 में भारत में लगभग 13,000 विद्यार्थियों ने आत्महत्या की, जो 2013 की तुलना में लगभग दोगुनी संख्या है। यही नहीं आज भारत में कुल आत्महत्याओं में लगभग 10 प्रतिशत हिस्सेदारी विद्यार्थियों की है। याद रहे 4 फरवरी को गाजियाबाद में 12, 14 और 16 वर्ष की तीन बहनों ने आत्महत्या कर ली। बताया गया कि यह घटना ऑनलाइन खेलों की लत से जुड़ी थी। आपको पता है कि इंटरनैट के जमाने में हर चीज मोबाइल फोन पर उपलब्ध होने के कारण सोशल मीडिया का महत्व बहुत बढ़ गया है और लोग बड़े पैमाने पर इसका इस्तेमाल कर रहे हैं। इससे जहां उपयोगी जानकारी मिलती है वहीं इस पर उपलब्ध अनुचित और अश्लील सामग्री बच्चों के लिए हानिकारक भी सिद्ध हो रही है।स्कूल हो या घर, हर जगह बच्चे मोबाइल का इस्तेमाल करते रहते हैं। सोशल मीडिया का अत्यधिक इस्तेमाल बच्चों की मानसिक स्थिति पर बुरा असर डाल रहा है और बच्चों में नींद की कमी भी देखी गई है। यह बच्चों में डिप्रैशन, चिंता और तनाव उत्पन्न करने का कारण भी बन रहा है। भारत में सोशल मीडिया प्लेटफार्म के उपयोगकर्ताओं में लगभग एक-तिहाई किशोर हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका में 2010 के बाद किशोरों में अवसाद और आत्महत्या के मामलों में तेज वृद्धि देखी गई, ठीक उसी समय जब एक कंपनी फेसबुक ने युवाओं को आक्रामक रूप से अपने मंच की ओर आकर्षित करना शुरू किया। सोशल मीडिया प्लेटफार्मों पर अधिक समय बिताने के कारण बच्चों की दिनचर्या प्रभावित हो रही है तथा माता-पिता के साथ उनकी दूरी एवं स्वभाव में हिंसक प्रवृत्ति बढ़ने के साथ-साथ एकाग्रता में कमी आ रही है। सोशल मीडिया की लत से बच्चों को बचाने की खातिर आस्ट्रेलिया, इंगलैंड, मलेशिया, स्पेन, नार्वे, जर्मनी, इटली व चीन तथा चंद अन्य देशों ने भी बच्चों द्वारा सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लागू कर दिए हैं। इसी सिलसिले में फ्रांस सरकार ने भी 15 वर्ष से कम आयु के बच्चों को सोशल मीडिया से दूर रखने की कवायद शुरू कर दी है। देश की नैशनल असैम्बली ने इससे संबंधित बिल को स्वीकृति दे दी है। इसे देश में 1 सितम्बर, 2026 से शुरू होने वाले आगामी शिक्षा सत्र से लागू कर दिया जाएगा। आंकड़े बताते हैं कि भारत के लगभग 27 प्रतिशत किशोरों में सोशल मीडिया प्लेटफार्म की लत के लक्षण दिखते हैं। इसके साथ-साथ पढ़ाई में गिरावट, चिंता और आत्मविश्वास की कमी भी देखी जा रही है। उन्होंने सदन में कहा कि एक सर्वेक्षण के अनुसार महानगरों में लगभग 33 प्रतिशत बच्चे साइबर उत्पीड़न का सामना करते हैं। राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार, किशोरों से जुड़े हिंसक अपराधों की हिस्सेदारी 2016 में 32 प्रतिशत थी, जो 2022 तक बढ़कर लगभग 50 फीसदी के करीब पहुंच गई। आपको बता दें कि फ्रांस ने 15 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए सोशल मीडिया के उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया है और विद्यालयों में मोबाइल फोन पर भी रोक लगाई है। ऑस्ट्रेलिया द्वारा 16 साल से कम उम्र के बच्चों पर सोशल मीडिया बैन लगाने के कड़े फैसला लिया गया ऑस्ट्रेलिया ने इसे 16 वर्ष से कम आयु तक सीमित किया है। हाल ही में इंडोनेशिया ने भी किशोरों के लिए सोशल मीडिया पर रोक लगाई है और ऐसा करने वाला वह एशिया का पहला देश बन गया है। स्पेन और जर्मनी भी इसी दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं।फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों का कहना है कि हमारे बच्चों के दिमाग बिकाऊ नहीं हैं। बच्चों की मानसिक और भावनात्मक सेहत को उन कम्पनियों के भरोसे पर नहीं छोड़ा जा सकता जिनका उद्देश्य सिर्फ लाभ कमाना है। वहीं स्वीडन के कोरोलिंस्का इंस्टीट्यूट ने ऑरेगन हेल्थ एंड साइंस यूनिवर्सिटी के साथ एक अध्ययन किया गया कि बच्चे कितने समय तक अलग-अलग डिजिटल एक्टिविटी करते हैं. स्टडी में भाग लेने वाले बच्चों ने एवरेज 2.3 घंटे टीवी या ऑनलाइन वीडियो देखे, 1.4 घंटे तक सोशल मीडिया यूज किया और 1.5 घंटे तक वीडियो गेम्स खेलें. इन से एकाग्रता बुरी तरह से प्रभावित है। भारत में पहले से ही डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण ढांचा मौजूद है, जिसमें 18 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए अभिभावकों की सत्यापित सहमति जैसे प्रावधान हैं। लेकिन हमें इससे आगे बढ़कर सोशल मीडिया कंपनियों को और अधिक जवाबदेह बनाना होगा। बता दें कि पिछले कुछ समय से भारत में नाबालिगों द्वारा सोशल मीडिया पर अश्लील और हिंसा को बढ़ावा देने वाली सामग्री देख कर बलात्कार जैसी वारदातें करने के मामले लगातार सामने आ रहे हैं 23 अक्तूबर, 2025 को जोधपुर (राजस्थान) में 3 वर्षीय बच्ची से बलात्कार करने के आरोप में पुलिस ने एक किशोर को गिरफ्तार किया। आरोपी के मोबाइल की जांच करने से पता चला कि उसने वारदात करने से पहले 15-20 अश्लील वीडियो देखे थे। 6 फरवरी, 2026 को बदायूं (उत्तर प्रदेश) के दातागंज में 8 और 14 साल की उम्र के 2 लड़कों को मोबाइल फोन पर अश्लील वीडियो देखने के बाद एक 6 साल की बच्ची से सामूहिक बलात्कार करने के आरोप में पुलिस ने गिरफ्तार किया।13 फरवरी, 2026 को रीवा (मध्य प्रदेश) में कुरकुरे दिलवाने के बहाने अपनी 6 वर्षीय बहन से बलात्कार करने के आरोप में एक 14 वर्षीय नाबालिग को पुलिस ने हिरासत में लिया।7 मार्च, 2026 को हाथरस (उत्तर प्रदेश) में जंगल में चारा लेने गई चौथी क्लास की छात्रा को मोबाइल फोन पर अश्लील सामग्री देखने के आदी 2 लड़के बेर देने अपने साथ ले गए और उससे बलात्कार कर डाला। दोनों लड़कों को पुलिस ने पकड़ लिया है।इस तरह की घटनाओं को देखते हुए 6 मार्च, 2026 को आंध्र प्रदेश और कर्नाटक की सरकारों ने बच्चों के लिए सोशल मीडिया के उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया है और ऐसा कदम उठाने वाले ये देश के पहले 2 राज्य बन गए हैं। आंध्र व कर्नाटक सरकारों द्वारा उक्त प्रतिबंध लगाने से बच्चों के चारित्रिक पतन को किसी सीमा तक रोकने में सहायता मिलेगी। सरकार की ओरसे करवाए गए एक अध्ययन में पाया गया कि 10-15 साल के 96 प्रतिशत बच्चे सोशल मीडिया का इस्तेमाल करते थे और उनमें से 10 में से सात हानिकारक कंटेंट के संपर्क में आए थे. इसमें महिलाओं के प्रति नफरत और हिंसक सामग्री के साथ-साथ खाने की बीमारियों और आत्महत्या को बढ़ावा देने वाला कंटेंट भी शामिल था. अब तक 10 सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को बैन लागू करने का निर्देश दिया गया है, जिसमें फेसबुक, इंस्टाग्राम, स्नैपचैट, थ्रेड्स, टिकटॉक, ट्विच, एक्स, यूट्यूब, किक और रेडिट शामिल हैं. ऐसे में बच्चों की सेहत को ध्यान में रखते हुए यह कदम बहुत ही सराहनीय है.अतः सभी राज्यों में इस तरह के कानून को तुरंत सख्तीपूर्वक लागू करने और उस पर अमल सुनिश्चित करवाने की जरूरत है, ताकि बच्चों को सोशल मीडिया के दुष्प्रभावों से बचाया जा सके। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं पिछले 38 वर्ष से लेखन और पत्रकारिता से जुड़े हैं) ईएमएस / 20 मार्च 26