लेख
20-Mar-2026
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(आज 21 मार्च है—विश्व वानिकी दिवस) सुबह की पहली किरण के साथ जब खिड़की खुलती है, तो वह ताजी हवा अब महसूस नहीं होती जो कभी बचपन की यादों का हिस्सा थी। कारण साफ है, हमारी खिड़कियों के बाहर अब पेड़ों की कतारें नहीं, बल्कि कंक्रीट की ऊँची और बेजान दीवारें खड़ी हैं। पुराने समय में घर के बड़े-बुजुर्ग कहते थे कि एक पेड़ लगाना सौ यज्ञ करने के बराबर है। तब पेड़ सिर्फ लकड़ी का बेजान ढांचा नहीं, बल्कि परिवार का एक जीता-जाता सदस्य हुआ करते थे। नीम की दातुन से लेकर पीपल की शीतल छांव तक, हमारा पूरा जीवन इन वनों की गोद में बीता है। लेकिन आज की तस्वीर डराने वाली है। हमने विकास की अंधी दौड़ में उन कुदरती फेफड़ों को काट दिया है जो हमें मुफ्त में ऑक्सीजन देते थे। शहर अब धीरे-धीरे तंदूर बनते जा रहे हैं। मार्च के महीने में ही मई जैसी तपिश का अहसास होने लगा है। यह प्रकृति की सिसकी है, जिसे हम अपनी सुख-सुविधाओं के शोर में सुन नहीं पा रहे। जब कोई जंगल कटता है, तो केवल पेड़ नहीं गिरते, बल्कि हजारों परिंदों के पुस्तैनी आशियाने भी उजड़ जाते हैं। वह गौरैया जो कभी हमारे आंगन में फुदकती थी, अब कहीं खो गई है क्योंकि उसे घोंसला बनाने के लिए अब डालियाँ नहीं मिलतीं। अखबारों में जब हम ग्लोबल वार्मिंग जैसे भारी शब्द पढ़ते हैं, तो लगता है कि यह कोई विदेशी समस्या है। पर सच तो यह है कि यह संकट हमारे अपने दरवाजे पर दस्तक दे रहा है। पहाड़ों पर कम होती बर्फ और मैदानों में बढ़ता पारा इसी का नतीजा है। हमने अपनी विलासिता के लिए नदियों के उद्गम सुखा दिए, क्योंकि वहां के घने जंगल अब रिसॉर्ट और चौड़ी सड़कों में तब्दील हो चुके हैं। हम मंगल ग्रह पर जीवन की संभावनाएं तलाश रहे हैं, लेकिन जिस धरती ने हमें गोद में खिलाया, उसके हरे आंचल को तार-तार करने में हमने कोई कसर नहीं छोड़ी। विचित्र विडंबना देखिए, आज हमें शुद्ध हवा के लिए ऑक्सीजन पार्लर जाने की जरूरत पड़ रही है। जो चीज कुदरत ने हमें उपहार में दी थी, उसे अब हम रुपयों में खरीद रहे हैं। क्या हमने कभी ठंडे दिमाग से सोचा है कि हम अपनी आने वाली पीढ़ी को विरासत में क्या देकर जाएंगे? क्या हमारे बच्चे जंगलों को सिर्फ मोबाइल की स्क्रीन या किताबों के पन्नों पर देखेंगे? क्या वे कभी जान पाएंगे कि मिट्टी की सोंधी खुशबू और पत्तों की सरसराहट का सुकून क्या होता है? 21 मार्च का यह दिन हमसे कोई लंबी गोष्ठियां नहीं मांगता, बल्कि एक छोटा सा मानवीय संकल्प मांगता है। हमें समझना होगा कि पौधारोपण केवल फोटो खिंचवाने और सोशल मीडिया पर डालने का जरिया नहीं है। एक नन्हा पौधा लगाना बहुत आसान है, लेकिन उसे एक विशाल पेड़ बनाने तक पालना ही असली जिम्मेदारी है। हमारे पूर्वजों ने जो पेड़ लगाए थे, उनका फल और ठंडी छाया हम आज भी भोग रहे हैं। तो क्या हमारा यह फर्ज नहीं बनता कि हम भी आने वाली नस्लों के लिए कुछ हरियाली बोकर जाएं? शहरों में अगर जगह की कमी है, तो बालकनी में पौधे लगाएं, गमलों में हरियाली सजाएं, लेकिन कुदरत से नाता न तोड़ें। गांवों में जो बचे-कुचे वन हैं, उनकी रक्षा करना हमारा नैतिक धर्म होना चाहिए। याद रखिये, जब अंतिम पेड़ काट दिया जाएगा और अंतिम नदी जहरीली हो जाएगी, तब हमें अहसास होगा कि हम नोट खाकर जिंदा नहीं रह सकते। यह पैसा, यह बड़ी गाड़ियाँ और यह आलीशान बंगले किसी काम के नहीं रहेंगे अगर हमारे पास सांस लेने के लिए शुद्ध हवा ही नहीं होगी। प्रकृति हमें चेतावनी दे रही है, बस हमें उसे सुनने की जरूरत है। आज विश्व वानिकी दिवस पर, आइए हम अपनी जड़ों की ओर लौटने का प्रयास करें। केवल एक दिन पेड़ बचाने की रस्म अदायगी न करें, बल्कि अपनी जीवनशैली में वनों को फिर से वही सम्मान दें। हर जन्मदिन, हर सालगिरह या किसी भी खुशी के मौके पर एक यादगार वृक्ष जरूर लगाएं। कुदरत ने हमेशा हमें दिया ही है, अब समय है कि हम उसे कुछ लौटाना शुरू करें। वनों की रक्षा करना केवल सरकार का काम नहीं, बल्कि हम सबका साझा फर्ज है। यह धरती हमारी माँ है, और माँ का आँचल हरा-भरा रखना हर संतान की जिम्मेदारी है। याद रखिए, अगर वन हैं, तो ही हमारा कल सुरक्षित है। वनों को बचाना असल में खुद के अस्तित्व को बचाना है। अब भी वक्त है, थोड़ा रुकिए, सोचिए और जाग जाइए। वरना इतिहास हमें उस स्वार्थी पीढ़ी के रूप में याद रखेगा जिसने अपनी ही संतान की सांसों का सौदा कर लिया था। आइए, आज इस धरती को फिर से हरा-भरा बनाने का एक सच्चा वादा करें। क्योंकि जब तक इस धरती पर हरा रंग है, तब तक ही मारे जीवन में खुशहाली का रंग बना रहेगा। (लेखक पत्रकार हैं) ईएमएस/ 20 मार्च 26