लेख
20-Mar-2026
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बिहार की राजनीति एक बार फिर नए मोड़ पर खड़ी है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार राज्यसभा सीट फतह कर चुके हैं अब ऐसे में बिहार की राजनीति किस ओर करबट ले रही है साफ साफ दिख रहा है । भाजपा की कही बात सिद्व होने जा रही है कि भाजपा का मुख्यमंत्री होना चाहिए। अब स्वाभाविक रूप से यह सवाल उठता है कि राज्य की बागडोर अब किसके हाथों में सौंपी जाएगी। यह केवल नेतृत्व परिवर्तन का प्रश्न नहीं, बल्कि शासन की निरंतरता, विकास की गति और राजनीतिक संतुलन का भी विषय है। वहीं क्या पर्ची निकाली जायेगी जैसा कि भाजपा नेतृत्व पहले भी कई राज्यों में विधायकों में से किसी एक की पर्ची निकालकर राजतिलक कर चुका है। हालांकि गठबंधन के बाद भाजपा के लिए आसान नहीं रहेगा। अब अगर नीतीश कुमार की पार्टी की बात करें तो सबसे पहले, जेडीयू के भीतर नेतृत्व की तलाश तेज होगी। पार्टी में कई चेहरे हैं, लेकिन अनुभव, स्वीकार्यता और प्रशासनिक समझ के आधार पर ही अंतिम निर्णय होगा। साथ ही, सहयोगी दलों की भूमिका भी अहम हो जाएगी, क्योंकि बिहार की सरकार गठबंधन की राजनीति पर टिकी है। ऐसे में सहमति से नेता का चयन करना एक चुनौतीपूर्ण प्रक्रिया हो सकती है। दूसरी ओर, विपक्ष भी इस मौके को भुनाने की कोशिश करेगा। तेजस्वी के नेतृत्व में विपक्ष सरकार पर दबाव बनाने और अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने का प्रयास करेगा। यदि सत्तारूढ़ गठबंधन में किसी प्रकार की असहमति या नेतृत्व को लेकर भ्रम की स्थिति बनती है, तो विपक्ष इसे जनता के बीच एक मुद्दा बना सकता है। नीतीश कुमार के नेतृत्व में बिहार ने सुशासन, सड़क, शिक्षा और कानून-व्यवस्था के क्षेत्रों में कई बदलाव देखे हैं। ऐसे में जो भी नया नेता सामने आएगा, उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती इन उपलब्धियों को बनाए रखने और आगे बढ़ाने की होगी। साथ ही, उसे जनता के विश्वास को भी जीतना होगा, जो किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की सबसे बड़ी पूंजी होती है। यह कहा जा सकता है कि नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने के बाद बिहार का दायित्व केवल किसी एक व्यक्ति पर नहीं, बल्कि पूरे नेतृत्व तंत्र पर होगा। एक मजबूत, समन्वित और दूरदर्शी नेतृत्व ही राज्य को स्थिरता और विकास के पथ पर बनाए रख सकता है। बिहार विधानसभा की सीटों पर बात करें तो कुल सीटें: 243 है जिसमें बहुमत का आंकड़ा 122 है। दलवार सीट जिसमें भाजपा- 89, जेडी(यू) -85, एनडीए कुल - 174, राजद - 25, कांग्रेस -6, वाम दल (सीपीआई(एमएल), सीपीआई(एम)) - 3, महागठबंधन कुल- 34,एलजेपी (आरवी)- 19, एआईएमआईएम - 5, हैम(एस) - 5, आरएलएम- 4 सहित अन्य 2 हैं। नीतीश कुमार के केंद्र में मंत्री बनने को लेकर अभी तक कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। हालांकि, हाल के राजनीतिक घटनाक्रमों—खासकर उनके राज्यसभा जाने की चर्चाओं—के बाद यह अटकलें जरूर तेज हुई हैं कि वे केंद्र की राजनीति में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। अगर वे राज्यसभा सदस्य बनते हैं, तो सैद्धांतिक रूप से केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल होना संभव हो जाता है। खैर यह तो भविष्य के गर्त में है कि बिहार का मुख्यमंत्री कौन होगा? भाजपा से अगर कोई आता है तो यह समय सही है क्योंकि बिहार एक संभावनाओं और चुनौतियों का प्रदेश है। भारत के पूर्वी हिस्से में स्थित बिहार एक ऐसा प्रदेश है, जिसकी पहचान इतिहास, संस्कृति और संघर्षों के अनूठे संगम के रूप में होती है। यह वही धरती है, जहाँ प्राचीन काल में ज्ञान और सभ्यता के केंद्र विकसित हुए—चाहे वह नालंदा विश्वविद्यालय हो या विक्रमशिला विश्वविद्यालय। लेकिन आधुनिक समय में बिहार को अक्सर पिछड़ेपन और विकास की चुनौतियों के संदर्भ में देखा जाता है। बिहार की सबसे बड़ी ताकत उसकी विशाल युवा आबादी है। यह जनसंख्या यदि सही दिशा में मार्गदर्शित हो, तो प्रदेश की तस्वीर बदल सकती है। कृषि यहाँ की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, लेकिन उद्योगों का अभाव और रोजगार के सीमित अवसर युवाओं को पलायन के लिए मजबूर करते हैं। यही कारण है कि बिहार के श्रमिक देश के विभिन्न हिस्सों में अपनी मेहनत का लोहा मनवाते हैं।राजनीतिक दृष्टि से भी बिहार हमेशा चर्चा में रहा है। नीतीश कुमार जैसे नेताओं ने सुशासन और विकास के मुद्दों को केंद्र में लाने की कोशिश की है, लेकिन राजनीतिक अस्थिरता और गठबंधन की मजबूरियाँ अक्सर नीतियों की निरंतरता में बाधा बनती हैं। शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे बुनियादी क्षेत्रों में सुधार के प्रयास हुए हैं, परंतु अभी भी लंबा रास्ता तय करना बाकी है। सामाजिक दृष्टिकोण से बिहार में बदलाव की एक नई लहर दिखाई दे रही है। महिलाओं की शिक्षा और सहभागिता बढ़ी है, पंचायत स्तर पर उनकी भागीदारी ने समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाया है। वहीं, आधारभूत संरचना—सड़क, बिजली और डिजिटल कनेक्टिविटी—में भी उल्लेखनीय सुधार देखने को मिला है।फिर भी, यह स्वीकार करना होगा कि बिहार के सामने चुनौतियाँ कम नहीं हैं। भ्रष्टाचार, कानून-व्यवस्था की स्थिति, और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की कमी ऐसे मुद्दे हैं, जिन पर गंभीरता से काम करने की आवश्यकता है। विकास की रफ्तार को तेज करने के लिए सरकार और समाज दोनों को मिलकर प्रयास करना होगा। बिहार एक विरोधाभासों का प्रदेश है—जहाँ अपार संभावनाएँ हैं, लेकिन उन्हें साकार करने के लिए ठोस इच्छाशक्ति और दीर्घकालिक दृष्टि की जरूरत है। यदि सही नीतियाँ और जनसहयोग मिल जाए, तो वह दिन दूर नहीं जब बिहार फिर से अपने गौरवशाली अतीत की तरह देश के विकास का अग्रदूत बन सकेगा। कहने का आशय है यह है कि ऐसी सरकार का प्रतिनिधित्व कोई करता है जिसकी केंद्र भी सरकार हो और राज्य में भी हो तो विकास की संभावनायें अधिक प्रबल हो जाती है। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार है, समाचार पत्र व पत्रिकाओं में समसमायिक विषयों पर चिंतक, राजनीतिक विचारक है।) ईएमएस/20/03/2026