नई दिल्ली (ईएमएस)। देशभर में आजकल नवरात्रि पर्व की धूम है। नवरात्रि ऐसे समय पर आती है जब मौसम बदल रहा होता है और इसका सीधा असर हमारे शरीर पर पड़ता है। नवरात्रि के दौरान व्रत रखना सिर्फ धार्मिक आस्था का हिस्सा नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरी आयुर्वेदिक सोच भी छिपी होती है। आमतौर पर लोग इसे पूजा-पाठ और श्रद्धा से जोड़कर देखते हैं, लेकिन अगर इसे आयुर्वेद के नजरिए से समझें तो यह शरीर को अंदर से रीसेट करने का एक प्राकृतिक तरीका है। आयुर्वेद के अनुसार इस दौरान शरीर में वात और पित्त दोष असंतुलित हो सकते हैं, जिससे पाचन तंत्र कमजोर पड़ता है और बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। ऐसे में व्रत रखने और हल्का, सात्विक भोजन करने से शरीर को संतुलन में लाने में मदद मिलती है। नवरात्रि के दौरान लोग फल, कुट्टू, सिंघाड़ा, दही और साबूदाना जैसे हल्के आहार का सेवन करते हैं, जो पचने में आसान होते हैं और शरीर पर अतिरिक्त दबाव नहीं डालते। रोजमर्रा के भारी, तले-भुने और मसालेदार भोजन से पाचन तंत्र पर जो दबाव बनता है, वह व्रत के दौरान कम हो जाता है। इससे शरीर को खुद को ठीक करने और ऊर्जा संतुलित करने का समय मिलता है। आयुर्वेद में पाचन शक्ति यानी ‘अग्नि’ को स्वास्थ्य का आधार माना गया है। जब यह अग्नि मजबूत होती है, तो शरीर स्वस्थ रहता है। व्रत के दौरान यह अग्नि फिर से सक्रिय होती है और शरीर में जमा विषैले तत्व बाहर निकलने लगते हैं, जिससे व्यक्ति खुद को हल्का और ऊर्जावान महसूस करता है। नवरात्रि का व्रत केवल शारीरिक ही नहीं, बल्कि मानसिक रूप से भी लाभकारी होता है। इस दौरान लोग ध्यान, पूजा और संयम का पालन करते हैं, जिससे मानसिक शांति मिलती है। आज की तेज रफ्तार जिंदगी में यह एक तरह का ‘मेंटल डिटॉक्स’ साबित होता है, जहां व्यक्ति खुद को धीमा करके अपने भीतर संतुलन स्थापित करता है। इसके अलावा, नवरात्रि में खाए जाने वाले ज्यादातर खाद्य पदार्थ सात्विक होते हैं। ये न सिर्फ पाचन के लिए आसान होते हैं बल्कि शरीर को जरूरी पोषण भी प्रदान करते हैं। सात्विक आहार शरीर को हल्का बनाए रखने के साथ-साथ इम्युनिटी को भी मजबूत करता है, जिससे मौसमी बीमारियों से बचाव में मदद मिलती है। सुदामा/ईएमएस 21 मार्च 2026