लेख
21-Mar-2026
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विश्व जल दिवस 22 मार्च पर विशेष ) जल जीवन का आधार है। शास्त्रों में सलिल, तोदक, नितंब आदि द्वारा इसका वर्णन किया गया है। जल के साधारण गुण को बतलाते हुए लिखा है कि जल श्रम का नाश करने वाला, बल कारक, तृप्ति कारक, हृदय को प्रिय लगने वाला, अव्यक्त रसयुक्त, नित्य हितकारी, शीतल, लघु, स्वच्छ रस का कारण रूप, अमृत के समान जीवन दायक है। यह मूर्छा विनाशक, वमन, विबंध, निद्रा और अजीर्ण को नष्ट करता है। यह प्राणियों का जीवन रूप है और संपूर्ण जगत जल से भरा हुआ है । रोगों में निषेध होने पर भी सर्वथा उसका ख्याल नहीं करना चाहिए । हारित संहिता में कहा गया है कि तृष्णा अत्यंत भयंकर है क्योंकि तत्काल प्राणों को नष्ट कर देती है । इसलिए तृष्णा से पीड़ित को जलपान कराना चाहिए । जिससे प्राणि जिंदा रहे अन्यथा तृष्णा से मुंह बंद हो जाता है और वह प्राणों का नाश करने वाला है । जलपान का त्याग कभी भी नहीं करना चाहिए तथा ध्यान रखना चाहिए कि अधिक जल पीने से अन्न की पाचन क्रिया भली प्रकार नहीं होती और जल के न पीने से भी पाचन क्रिया में गड़बड़ी रहती है । अतः मनुष्य को आगे बढ़ाने के लिए थोड़ा-थोड़ा जल बारंबार पीना चाहिए । हां अरुचि प्रतिश्याय मंदाग्नि रोग मुक्त प्रसाद उदर रोग कुश्ती नेत्र रोग धरा ब्राह्मण और मधुमेह में अल्प जलपान हितकारक कहा गया है । भारत के कुल क्षेत्रफल का लगभग एक-चौथाई भाग जल अपरदन से प्रभावित है। देश में सिर्फ जल अपरदन द्वारा प्रतिवर्ष लगभग 6100 टन ऊपरी मिट्टी का कटाव होता है जिसमें पोषक तत्वों की मात्रा की अनुमानित कीमत 1200 करोड़ रूपये से भी ज्यादा की होती है। जल अपरदन से प्रभावित कृषि भूमि का संरक्षण एवं पुनरूत्थान घास की प्रजातियों जैसे दूब , अंजान तथा मुंज के रोपण से किया जा सकता है। उक्त घास की प्रजातियाँ आमतौर से बहुवर्षीय एवं कठोर प्रवृत्ति की होती हैं। इनकी जड़े मिट्टी के कड़ों को बाँधकर मृदा अपरदन को रोकने में सहायक होती हैं। घासों के निरन्तर उगने से मृदा में जीवांश पदार्थ की वृद्धि होती है जिससे मृदा संरचना में सुधार के साथ-साथ उसकी उपजाऊ क्षमता में भी वृद्धि होती है।जल के अभिगमन द्वारा मृदा का हृस जल अपरदन कहलाता है। उच्च व मध्यम ढाल वाली भूमि में मृदा हृस का मुख्य कारण जल अपरदन होता है। जब अत्यधिक वर्षा के कारण उत्पन्न जल बहाव के द्वारा मृदा को बहा कर दूर ले जाता है तो जल अपरदन होता है। जल अपरदन: जल के द्वारा मृदा का ह्रास जल अपरदन कहलाता है। जल अपरदन को प्रभावित करने वाले कारक : नदी या प्रवाही जल-अपरदन के कारकों में नदी सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है। हिमानी या हिमनद-हिमानियाँ या हिमनद हिमाच्छादित या उच्च पर्वतीय क्षेत्रों में पाये जाते हैं।वायु या पवन-वायु का कार्य प्रायः मरुस्थलों में होता है जहाँ यह वनस्पति तथा अन्य किसी भौतिक बाधा के अभाव में निर्बाध रूप से बहती है।बहता हुआ जल उन मुख्य कारकों में से एक है, जो मृदा कणों को बहा ले जाते हैं। जल द्वारा मृदा का अपरदन वर्षा की बूंदों, लहरों अथवा बर्फ के माध्यम से होता है। 35 किमी/घंटा के वेग से मृदा से टकराती हैं। बड़े आकार की बूंद एवं हवा के झोंके मृदा की सतह से और भी अधिक वेग से टकराते हैं।नदी का सर्वप्रमुख कार्य भूपटल का अपरदन करना है। नदियाँ सदैव अपने मार्ग के समीप के चट्टानों को घिसकर तथा काटकर उनका परिवहन करती हैं। नदी का अपरदन कार्य नदी के ढाल तथा वेग एवं उसमें स्थित नदी के अवसाद भार पर आधारित होता है।जब मिट्टी की क्षैतिज परते तेज हवा या भारी वर्षा द्वारा उड़ाकर या बहाकर ले जायी जाती है तो इस प्रकार का अपरदन परत अपरदन कहलाता है। परत अपरदन मुख्य रूप से वनस्पतिविहीन क्षेत्रों के अलावा जलोढ़ मिट्टी वाले क्षेत्रों मे होता है। ढालयुक्त भूमि पर जलीय अपरदन द्वारा प्रायः लम्बी तथा सँकरी नलियां निर्मित हो जाती है। (यह लेखक के व्य‎‎‎क्तिगत ‎विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अ‎निवार्य नहीं है) .../ 21 मार्च /2026